90 दिन की सीमा पार, 831 रिजर्व फैसले सुनाए... फिर भी प्रमोशन में आरक्षण का फैसला क्यों नहीं?

Neel Tiwari | Jun 02, 2026, 14:09 IST
MP High Court Verdicts 2026
MP हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड 831 सुरक्षित मामलों में फैसले सुनाए। इसके बावजूद प्रमोशन में आरक्षण का बड़ा मामला अब भी अटका है। चीफ जस्टिस के जाने के बाद कर्मचारियों में चिंता बढ़ी है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • 17 फरवरी से 2 जून 2026 के बीच हाईकोर्ट की तीनों पीठों ने 831 रिजर्व फैसले सुनाए।
  • पूर्व चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा की डिविजनल बेंच ने 63 सुरक्षित मामलों में निर्णय दिए।
  • प्रमोशन में आरक्षण मामला 17 फरवरी 2026 से अब तक लंबित है।
  • जस्टिस विनय सराफ का इंदौर ट्रांसफर हो चुका है, जबकि संजीव सचदेवा सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए हैं।
  • 90 दिन की समयसीमा पूरी होने के बाद भी लाखों कर्मचारी फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों ने 17 फरवरी से 2 जून 2026 के बीच कुल 831 हर्ड एंड रिजर्व मामलों में फैसले सुनाए हैं। पूर्व चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा की डिविजनल बेंच ने भी 63 सुरक्षित मामलों का निपटारा किया, लेकिन प्रमोशन में आरक्षण जैसा बहुचर्चित मामला अब भी लंबित है।



90 दिन पूरे होने, बेंच बदलने और चीफ जस्टिस के सुप्रीम कोर्ट चले जाने के बाद अब कर्मचारियों के बीच हाईकोर्ट की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।



सबसे बड़ा इंतजार बना प्रमोशन में आरक्षण मामला

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर मुख्यपीठ सहित इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों के आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर सामने ला रहे हैं।



17 फरवरी 2026 से 2 जून 2026 के बीच कुल 831 ऐसे मामलों में फैसले सुनाए गए जिन्हें सुनवाई के बाद सुरक्षित रखा गया था। यानी अदालतों में रिजर्व मामलों के निपटारे की प्रक्रिया लगातार चलती रही और बड़ी संख्या में लंबित निर्णय सामने आते रहे।



इसके बावजूद प्रदेश के लाखों कर्मचारियों से जुड़े प्रमोशन में आरक्षण मामले का फैसला अब तक नहीं आ पाया है। यही वजह है कि अब यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं बल्कि प्रशासनिक और न्यायिक चर्चाओं का केंद्र बनता जा रहा है।



चीफ जस्टिस की बेंच ने 63 फैसले सुनाए

आंकड़ों के अनुसार पूर्व चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच ने भी कुल 63 ऐसे मामलों में फैसले सुनाए जिन्हें पहले सुरक्षित रखा गया था। इनमें कुछ मामले नवंबर 2025 से लंबित थे। वहीं कई ऐसे मामले भी शामिल रहे जो प्रमोशन में आरक्षण मामले के बाद सुरक्षित रखे गए थे।



इसके बावजूद कर्मचारियों को जिस फैसले का सबसे ज्यादा इंतजार है, वह सूची में कहीं दिखाई नहीं दिया। यही तथ्य अब कर्मचारियों और अधिवक्ताओं के बीच चर्चा का विषय बन गया है। लोगों का सवाल है कि जब बाद में सुरक्षित हुए कई मामलों में निर्णय आ सकते हैं तो फिर इतने व्यापक प्रभाव वाले मामले में फैसला अभी तक क्यों लंबित है।



बेंच बदल गई, हालात बदल गए, लेकिन फैसला नहीं आया

जब यह मामला सुरक्षित रखा गया था तब इसकी सुनवाई तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच ने की थी। इसके बाद न्यायमूर्ति विनय सराफ का इंदौर खंडपीठ में स्थानांतरण हो गया। अब एक और बड़ा बदलाव हो चुका है।



चीफ जस्टिस रहे संजीव सचदेवा ने सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ले ली है और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अब न्यायमूर्ति विवेक रूसिया एक्टिंग चीफ जस्टिस की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ऐसे में कर्मचारियों के बीच यह जिज्ञासा बढ़ रही है कि बेंच में आए इन बदलावों के बीच लंबित फैसले की प्रशासनिक स्थिति क्या है। इसका अंतिम निष्कर्ष कब सामने आएगा।



90 दिन की समयसीमा के बाद बढ़े प्रशासनिक सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित रखे गए मामलों में अधिकतम 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाया जाना चाहिए। प्रमोशन में आरक्षण मामले में यह अवधि 16 मई 2026 को पूरी हो चुकी है। ऐसे में अब चर्चा केवल फैसले में देरी तक सीमित नहीं है, बल्कि हाईकोर्ट की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।



कर्मचारी संगठनों और मामले पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि यदि इतने महत्वपूर्ण मामले में समयसीमा बीत जाने के बाद भी कोई स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आती, तो स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता और प्रबंधन को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं। हालांकि कोई भी पक्ष न्यायिक प्रक्रिया पर टिप्पणी करने से बच रहा है, लेकिन फैसले की स्थिति को लेकर स्पष्टता की मांग जरूर बढ़ रही है।



सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले फैसले की उम्मीद थी

कर्मचारियों और अधिवक्ताओं के बीच लंबे समय से यह उम्मीद जताई जा रही थी कि मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा के सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले इस बहुप्रतीक्षित मामले में फैसला आ सकता है। यही कारण था कि पिछले कुछ सप्ताह से अदालत की हर कॉज लिस्ट और हर आदेश सूची पर कर्मचारियों की नजर बनी हुई थी।



लेकिन चीफ जस्टिस के सुप्रीम कोर्ट में शपथ लेने तक भी यह फैसला सामने नहीं आया। इससे कर्मचारियों के बीच निराशा का माहौल जरूर बना है, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि वर्षों से अटके प्रमोशन विवाद पर अब अंतिम स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।



लाखों कर्मचारियों की उम्मीदें अब भी उसी फैसले पर टिकी हैं

प्रमोशन में आरक्षण का यह मामला केवल कानूनी महत्व का नहीं है बल्कि इसका सीधा असर सरकारी कर्मचारियों के सेवा जीवन, वरिष्ठता, पदोन्नति और प्रशासनिक ढांचे पर पड़ने वाला है। यही वजह है कि सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग दोनों के कर्मचारी इस फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।



831 रिजर्व फैसलों के बीच इस एक मामले का लंबित रह जाना कर्मचारियों के बीच लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आखिर वह दिन कब आएगा जब वर्षों से चली आ रही इस बहस पर हाईकोर्ट का अंतिम फैसला सामने होगा और लाखों कर्मचारियों की प्रतीक्षा समाप्त होगी।



FAQ

  1. मध्य प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण मामला क्या है?
    उत्तर: यह मामला MP के सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) के अधिकार और वरिष्ठता से जुड़ा है।
  2. MP हाईकोर्ट में इस मामले की वर्तमान स्थिति क्या है?
    17 फरवरी से 2 जून 2026 तक MP हाईकोर्ट की जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों ने 831 रिजर्व फैसले सुनाए, लेकिन प्रमोशन में आरक्षण मामला अब भी लंबित है।
  3. हाईकोर्ट में फैसले की 90 दिन की समयसीमा कब पूरी हुई?
    सुप्रीम कोर्ट निर्देश के अनुसार, MP में प्रमोशन में आरक्षण मामले के लिए 16 मई 2026 को 90 दिन की समयसीमा पूरी हो चुकी है।
  4. क्या पूर्व चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा ने MP में यह मामला निपटाया?
    नहीं, उनकी डिविजनल बेंच ने 63 अन्य रिजर्व मामलों का निपटारा किया, लेकिन प्रमोशन में आरक्षण मामला अब भी लंबित है।


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