हाईकोर्ट की EOW को फटकार, एक साल के बच्चे को ही बना दिया भ्रष्टाचार का आरोपी

Aman Vaishnav | Mar 19, 2026, 15:57 IST
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने आर्थिक अपराध शाखा की कार्यप्रणाली पर कड़ा ऐतराज जताया है। EOW ने उसे आरोपी बना दिया, जिसका अपराध या कमाई से कोई लेना-देना ही नहीं था। पूरा मामला जानने के लिए खबर आखिरी तक पढ़िए।

क्या कोई एक साल का बच्चा भ्रष्टाचार कर सकता है? मध्य प्रदेश में एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया है। जांच एजेंसी EOW ने अपनी रिपोर्ट में एक मासूम को अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर दिया।



क्या है पूरा मामला?

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की कामकाजी शैली पर कड़ी नाराजगी जताई है। यह मामला छतरपुर के कृष्ण प्रताप सिंह चंदेल से जुड़ा है, जिन्हें EOW ने आय से अधिक संपत्ति के आरोप में आरोपी बना दिया था। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि जांच एजेंसी ने उस वक्त को चेक पीरियड में शामिल किया, जब याचिकाकर्ता सिर्फ एक साल का बच्चा था।



उसका अपराध या कमाई से कोई लेना-देना ही नहीं था। जज विवेक अग्रवाल और रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की बेंच ने इस कार्रवाई को पूरी तरह से तर्कहीन बताया और एजेंसी को फटकार भी लगाई है।



सबसे बड़ी गलती चेक पीरियड

मामले में सबसे बड़ी गलती चेक पीरियड यानी जांच के लिए तय की गई समय सीमा को लेकर है। EOW ने इस केस में 1997 से लेकर 2021 तक की अवधि को आधार माना है। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि कृष्ण प्रताप का जन्म 1996 में हुआ था, यानी जब EOW 1997 से उनकी अवैध संपत्ति की जांच कर रही है, तब वह सिर्फ एक साल के थे।



इसके अलावा याचिकाकर्ता को सरकारी नौकरी 2023 में मिली थी। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जिस व्यक्ति ने 1997 से 2021 के बीच सरकारी सेवा ही नहीं की उस पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं कैसे लागू हो सकती हैं।



क्या है इस विवाद की जड़?

इस विवाद की शुरुआत याचिकाकर्ता के भाई के खिलाफ दर्ज एक एफआईआर से हुई थी। उनके भाई एक समिति में प्रबंधक थे और उन पर आय से अधिक संपत्ति जमा करने का आरोप लगा था। जब जांच शुरू हुई तो EOW ने अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया था। परिवार के बाकी सदस्य जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल थे, उन्हें भी इस मामले में घसीट लिया था।



सबसे हैरान करने वाली बात ये थी कि इस जांच रिपोर्ट को आधार बनाकर विभाग ने याचिकाकर्ता को उनकी सरकारी नौकरी से निकाल दिया था। याचिका में कहा गया कि उस समय याचिकाकर्ता नाबालिग थे। किसी भी लाभ के पद पर नहीं थे इसलिए उनकी संपत्तियों को आय से अधिक मानना गलत था।



सात दिनों के अंदर मांगा जवाब

हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और EOW के DG और उनके विधिक सलाहकार को नोटिस भेजा है। कोर्ट ने सवाल उठाया है कि ऐसा कौन सा कानूनी नियम है जिसके तहत उस व्यक्ति को आरोपी बनाया गया, जो जांच के दौरान नाबालिग था और सेवा में था भी नहीं। कोर्ट ने कहा है कि सात दिनों के अंदर इस पर पूरा जवाब दिया जाए। जांच की वैधानिकता साबित नहीं होती तो पूरी कार्यवाही रद्द की जा सकती है।



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