दूसरे राज्य का आरक्षण सर्टिफिकेट : ग्वालियर और इंदौर हाईकोर्ट के अलग-अलग फैसले
News In Short
- विवाहित महिलाओं के दूसरे राज्य के आरक्षण सर्टिफिकेट पर विवाद बढ़ गया है।
- ग्वालियर और इंदौर हाईकोर्ट के अलग फैसले लिए हैं।
- ग्वालियर बेंच ने लाभ देने से इनकार किया है।
- इंदौर बेंच ने शर्तों के साथ लाभ देने की बात कही है।
- मामला शिक्षक भर्ती और विवाहित महिलाओं से जुड़ा है।
News In Detail
मध्यप्रदेश या अन्य किसी भी राज्य में आरक्षण का लाभ तभी मिलता है, जब वह उस राज्य का मूल निवासी हो। लेकिन मुद्दा विवाहित महिलाओं के लिए उठता रहा है। जब वे किसी राज्य से दूसरे राज्य में विवाहित होकर जाती हैं, तो क्या आरक्षण का लाभ मिलेगा?
यह मुद्दा साल 2021 में मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षक भर्ती में उठा था। इस पर इंदौर हाईकोर्ट ने 12 जनवरी 2026 को फैसला सुनाया था। वहीं एक मुद्दा अभी ग्वालियर हाईकोर्ट में उठा, जिस पर बीते सप्ताह फैसला आया।
ग्वालियर हाईकोर्ट ने यह दिया फैसला
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने कहा कि किसी अन्य राज्य से जारी ओबीसी प्रमाण पत्र के आधार पर एमपी में आरक्षण का लाभ नहीं लिया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह के बाद महिला को पति की जाति के आधार पर आरक्षण का अधिकार नहीं मिलता।
शिक्षक भर्ती से जुड़ा मामला
यह मामला अर्चना दांगी का है, जो मूल रूप से यूपी (जालौन) की निवासी हैं। उन्होंने साल 2018 की उच्च माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा पास की थी, लेकिन दस्तावेज सत्यापन के दौरान उनका चयन निरस्त कर दिया गया, क्योंकि ओबीसी प्रमाण पत्र उत्तर प्रदेश से जारी हुआ था।
इसमें याचिकाकर्ता की दलील थी कि दांगी जाति दोनों ही राज्यों (एमपी और यूपी) में ओबीसी में है, तो लाभ मिलना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट ने दलील खारिज कर दी। वहीं राज्य सरकार का कहना था कि जाति का निर्धारण जन्म से होता है और विवाह या निवास बदलने से यह तय नहीं होता है। इसलिए दूसरे राज्य का प्रमाण पत्र मप्र में मान्य नहीं होता।
इंदौर हाईकोर्ट में यह उठा था मुद्दा
वहीं इंदौर हाईकोर्ट ने 12 जनवरी 2026 को इसी तरह के मामले को लेकर लगी विविध याचिकाओं पर फैसला दिया था। इसमें महिला उम्मीदवारों ने साल 2021 में याचिका दायर की थी।
इसमें तर्क था कि उच्च माध्यमिक शिक्षक भर्ती में चयन के बाद नौकरी इसलिए नहीं दी, क्योंकि उनके पास अन्य राज्य का जाति प्रमाण पत्र था।
इसमें भी तर्क यही था कि विवाह के बाद अब वह मप्र की मूल निवासी हैं, तो प्रमाण पत्र मान्य किया जाए। वहीं राज्य सरकार का तर्क था कि अन्य राज्य के प्रमाण पत्र को मान्य नहीं किया जाता है।
इंदौर हाईकोर्ट ने यह दिया था आदेश
वहीं इस मामले में इंदौर हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि शादी के बाद अन्य राज्य से मप्र में आकर स्थायी रूप से बसने वालों को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
वहीं, यह तभी संभव है, जब वह जाति दोनों ही राज्यों में आरक्षित श्रेणी में शामिल हो। साथ ही हाईकोर्ट ने शासन को आदेश दिए थे कि वह देखे कि उम्मीदवार की जाति दोनों ही राज्यों में आरक्षित कैटेगरी में है या नहीं।
जाति प्रमाण पत्र को लेकर उलझन
जाति प्रमाण पत्र को लेकर यह तथ्य स्थापित है कि जाति जन्म से होती है और यह पिता पक्ष से होती है। यानी संतान की मां किस जाति से है, इससे फर्क नहीं पड़ता, पिता की जाति क्या है, उसी आधार पर जाति प्रमाण पत्र तय होता है।
जैसे मां यदि एसटी (ST) से है और पिता सामान्य वर्ग से हैं, तो संतान का सर्टिफिकेट सामान्य वर्ग का होगा। यदि पिता ओबीसी से हैं, तो ओबीसी का बनेगा। वहीं अपने राज्य में पिछड़ी जातियों को बढ़ावा देने के लिए राज्यों में प्रावधान है कि वे मूल निवासियों को ही आरक्षण देंगे। लेकिन समस्या विवाहित महिलाओं के आरक्षण को लेकर आती है।
जब वे दूसरे राज्य में जाती हैं, तो उनके प्रमाण पत्र को लेकर विवाद शुरू होता है कि उन्हें विवाह के बाद वाले राज्य में आरक्षण दिया जाए या नहीं। जैसे मप्र में इंदौर और ग्वालियर हाईकोर्ट के अलग-अलग फैसले सामने आए हैं।
जानकारों के अनुसार, यदि ऐसे अलग-अलग फैसले आते हैं, तो मामला मुख्यालय बेंच जबलपुर में जा सकता है और वहीं से अंतिम फैसला लागू होगा।
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