MP हाईकोर्ट का फैसला: निजी मंदिरों में सरकार नहीं कर सकती हस्तक्षेप, सीएस को दिए निर्देश

Jitendra Shrivastava | May 19, 2026, 23:51 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. MP हाईकोर्ट ने कहा, निजी मंदिरों में सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती। मंदिर की भूमि देवता के नाम दर्ज हो। इसको लेकर मुख्य सचिव को निर्देश दिए गए हैं।

ऐसे समझें पूरा मामला...

  • निजी मंदिर में सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
  • मंदिर भूमि देवता के नाम पर दर्ज होगी।
  • कलेक्टर निजी मंदिर के प्रबंधक नहीं बन सकते।
  • सरकारी कर्मचारी धार्मिक समिति में नहीं होंगे।
  • तीन महीने में मंदिर की प्रकृति तय की जाए।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि निजी मंदिरों (Private Temples) में सरकार की कोई भूमिका नहीं है। मंदिर की भूमि देवता के नाम दर्ज होनी चाहिए। जस्टिस दीपक खोत की बेंच ने मुख्य सचिव को सभी जिला कलेक्टरों को दिशा-निर्देश जारी करने के आदेश दिए हैं।



हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आदेश दिया है। जस्टिस दीपक खोत की बेंच ने स्पष्ट किया कि निजी मंदिरों (Private Temples) में सरकार की कोई भूमिका नहीं है।



मंदिर से जुड़ी भूमि के राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर या पुजारी को प्रबंधक या ट्रस्टी के रूप में दर्ज करने की जरूरत नहीं है। ऐसी संपत्ति सीधे देवता के नाम पर दर्ज होनी चाहिए। यह फैसला धार्मिक संपत्ति और प्रशासनिक अधिकारों के बीच की सीमा रेखा को स्पष्ट करता है।



पुजारी की याचिका पर हुई सुनवाई

यह आदेश डूंडा सिवनी गांव के एक शिव मंदिर के सर्वराकर (Sarvarakar- मंदिर प्रबंधक व संरक्षक) की याचिका पर आया है। याचिका में लोक न्यास रजिस्ट्रार द्वारा मंदिर प्रबंधन के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित करने के आदेश को चुनौती दी गई थी।



पुजारी ने कोर्ट को बताया कि उनका परिवार पिछली चार पीढ़ियों से इस मंदिर की सेवा कर रहा है। वर्ष 1913 में स्वर्गीय भवानी पटेल ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। रखरखाव और पूजा-अर्चना के लिए लगभग 14 एकड़ भूमि भी छोड़ी गई थी।



सरकारी हस्तक्षेप पर कोर्ट की आपत्ति

अदालत ने सरकार की ओर से मंदिर में प्रबंधन समिति थोपने की कोशिश पर कड़ी आपत्ति जताई। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि समिति में दो सदस्य सरकारी कर्मचारी हैं।



सरकारी कर्मचारी धार्मिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते। साथ ही बिना यह जांचे कि मंदिर निजी है या सार्वजनिक, सरकार ने प्रबंधन योजना थोपी। हाईकोर्ट ने इसे कानूनी रूप से अनुचित माना।



देवता हैं संपत्ति के असली स्वामी

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले 'स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति' का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंदिर में स्थापित देवता (Deity) ही संपत्ति के वास्तविक और कानूनी स्वामी होते हैं।



कानून के अनुसार देवता को एक विधिक इकाई (Legal Entity) माना जाता है। उनकी ओर से 'नेक्स्ट फ्रेंड' (Next Friend) कार्य करता है। पुजारी केवल पूजा-अर्चना और संपत्ति की देखरेख के लिए नियुक्त होता है।



कलेक्टर नहीं बन सकते प्रबंधक

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की। किसी भी कलेक्टर को सभी मंदिरों का स्वतः प्रबंधक नहीं माना जा सकता। यह तभी संभव है जब वह मंदिर सरकारी नियंत्रण में हो।



यदि किसी निजी मकान या निजी संपत्ति में देवता स्थापित हैं, तो उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह आदेश देशभर के निजी मंदिरों की स्वायत्तता के लिए एक मजबूत कानूनी आधार बनाता है।



मुख्य सचिव को निर्देश जारी

मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट (High Court Order) ने राज्य के मुख्य सचिव को महत्वपूर्ण निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप सभी जिला कलेक्टरों को दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।



विवाद की स्थिति में मंदिर की प्रकृति- सार्वजनिक या निजी- की विधिसम्मत जांच की जाए। इसके बाद ही किसी प्रकार की प्रबंधन योजना लागू की जा सकती है। यह निर्देश पूरे मध्यप्रदेश के सभी जिलों पर लागू होगा।



तीन महीने में निर्णय का आदेश

हाईकोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए विवाद की जांच तीन महीने के भीतर पूरी की जाए। यह तय किया जाए कि संबंधित शिव मंदिर (Shiv Temple) निजी श्रेणी में आता है या नहीं।



इस आदेश से पुजारी परिवार को बड़ी राहत मिली है। साथ ही यह फैसला अन्य निजी मंदिरों के पुजारियों और प्रबंधकों के लिए भी महत्वपूर्ण नजीर बन गया है।



फैसले का व्यापक महत्व

यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom) और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करता है। निजी मंदिरों में सरकारी दखलंदाजी को कानूनी रूप से रोकने का यह एक मजबूत आदेश है।



पुजारी समुदाय और धार्मिक न्यास (Religious Trust) के लिए यह बड़ी राहत की खबर है। इस फैसले से स्पष्ट होता है कि संविधान में धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट सीमाएं हैं। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का यह आदेश देशभर में मिसाल बन सकता है।



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