बालिग पर मर्जी थोपना कानूनन गलत, मां की याचिका पर एमपी हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है।
- कोर्ट ने कहा कि बालिग बेटी अपनी मर्जी से कहीं भी रह सकती है।
- एक मां ने बेटी को वापस लाने के लिए याचिका दायर की थी।
- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मां की याचिका खारिज कर दी।
- कोर्ट ने साफ कहा कि अदालत सुपर गार्जियन नहीं बन सकती।
मां पहुंची थी हाईकोर्ट
यह मामला भोपाल और जबलपुर से जुड़ा है। एक महिला अपना घर छोड़कर चली गई थी। उसकी मां ने बेटी को वापस लाने के लिए हैबियस कॉरपस याचिका दायर की। यह याचिका एक्टिंग जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप कुमार मित्तल की बेंच में लगी।
जबलपुर पुलिस को कोर्ट ने बेटी को पेश करने का आदेश दिया था। पुलिस ने महिला को कोर्ट में पेश किया। इसके बाद जजों ने बेटी से अकेले में बात की।
बेटी ने कोर्ट में क्या कहा
जजों ने पुलिस और दोनों पक्षों को बाहर भेज दिया। इसके बाद बेटी से सीधे बात की गई। यह जानने के लिए किया गया कि वह अपनी मर्जी से यह फैसला ले रही है या नहीं।
बेटी ने कोर्ट में साफ कहा कि वह बालिग है। उसने कहा कि वह रितिक के साथ रहना चाहती है। रितिक इस याचिका में एक पक्षकार भी था। बेटी ने यह भी कहा कि यह उसका अपना फैसला है। उसने कहा कि किसी ने उस पर कोई दबाव नहीं डाला। न रितिक ने, न किसी और ने।
कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी जगह रह रहा है, तो कोर्ट दखल नहीं दे सकता। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ मां-बाप के नाखुश होने से किसी बालिग की कस्टडी किसी और को नहीं सौंपी जा सकती। चाहे वह मां-बाप ही क्यों न हों।
कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के एक फैसले का हवाला दिया। यह फैसला सोनी गैरी बनाम गैरी डगलस मामले का था। कोर्ट ने कहा कि बालिग होना हर इंसान की जिंदगी में बड़ी बात है। बालिग होते ही व्यक्ति को अपना फैसला खुद लेने का हक मिल जाता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक किसी की पसंद कायम है, अदालत पेरेंस पेट्री (parens patriae) की भूमिका नहीं निभा सकती। कोर्ट ने कहा कि बेटी को आजादी से जीने का पूरा हक है। कोर्ट किसी मां के भावुक होने या पिता के अहंकार से प्रभावित होकर सुपर गार्जियन नहीं बन सकता।
फैसले का असर
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि अब आगे कोई और आदेश देने की जरूरत नहीं है। बेटी अब कहीं भी आ-जा सकती है। न मां-बाप, न कोई और व्यक्ति उसे रोक सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका को निपटा दिया।
यह फैसला उन तमाम मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां बालिग बच्चों की पसंद को लेकर परिवार में विवाद होता है। कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि बालिग होने के बाद हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी खुद तय करने का अधिकार है।
क्या है हैबियस कॉर्पस याचिका?
हैबियस कॉर्पस (Habeas Corpus) या 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' एक शक्तिशाली कानूनी याचिका है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "व्यक्ति को सशरीर प्रस्तुत किया जाए"। यदि किसी व्यक्ति को गैर-कानूनी तरीके से पुलिस या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हिरासत में लिया जाता है, तब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में यह याचिका दायर की जाती है।
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