एमपी में सड़क हादसे में Gen-Z सबसे ज्यादा शिकार, घायलों को नहीं मिला मुफ्त इलाज!
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश के हाईवे युवाओं के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं।
- यहां सड़क हादसों में सबसे ज्यादा जान युवा वर्ग की जा रही है।
- सरकारी आंकड़ों में एक चौंकाने वाला सच सामने आया है।
- राज्य में 19 फीसदी घायलों को गोल्डन आवर में मुफ्त इलाज नहीं मिल पाया।
- पुलिस की देरी की वजह से 336 पीड़ित पीएम-राहत योजना के फायदे से वंचित रह गए।
एमपी के हाईवे पर हर साल हजारों लोगों की जान जाती है। इनमें एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है, जिन्हें अब Gen-Z कहा जाता है। रफ्तार का शौक इन्हें भारी पड़ रहा है।
सरकार ने पीड़ितों की मदद के लिए एक खास योजना शुरू की थी। वहीं प्रशासनिक लापरवाही के चलते इसका पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा।
गोल्डन आवर में लापरवाही
हादसे के बाद का पहला घंटा सबसे अहम माना जाता है। इसे गोल्डन आवर कहते हैं। इसी दौरान सही इलाज मिलने से कई जानें बचाई जा सकती हैं। लोकसभा में पेश हुए ताजा आंकड़े इस पर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं।
पीएम-राहत योजना के तहत मुफ्त कैशलेस इलाज तभी मिलता है, जब स्थानीय पुलिस 48 घंटे के भीतर अपनी रिपोर्ट ई-डीएआर पोर्टल पर अपलोड करे।
मध्य प्रदेश पुलिस समय पर यह रिपोर्ट अपलोड नहीं कर सकी। इस वजह से 336 मामले सीधे योजना से बाहर हो गए। यह कुल मामलों का करीब 19 फीसदी है। इन पीड़ितों को अपनी जेब से इलाज का खर्च उठाना पड़ा।
यह आंकड़ा दिखाता है कि योजना अच्छी होने के बावजूद जमीनी अमल में कमी है। एक तरफ सरकार पीड़ितों की मदद के लिए पैसा तैयार रखती है। दूसरी तरफ पुलिस महकमे की सुस्ती इस मदद के रास्ते में रोड़ा बन जाती है।
मुफ्त इलाज में एमपी दूसरे नंबर पर
इस लापरवाही के बावजूद मध्य प्रदेश सरकार का प्रदर्शन देश में बेहतर माना जा रहा है। मुफ्त इलाज देने के मामले में गुजरात पहले स्थान पर है।
वहां 7 हजार 36 लोगों को योजना का लाभ मिला। मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा, जहां 6 हजार 761 पीड़ितों को मुफ्त इलाज मिल सका।
यानी एक तरफ पुलिस की सुस्ती से सैकड़ों लोग योजना से बाहर हुए। दूसरी तरफ राज्य के स्वास्थ्य और परिवहन तंत्र ने बाकी हजारों पीड़ितों तक मदद पहुंचाई। यह आंकड़ा राज्य की क्षमता और उसकी कमी, दोनों को एक साथ सामने रखता है।
हाईवे पर युवाओं की मौतें
साल 2026 के आंकड़े और भी गंभीर तस्वीर दिखाते हैं। मध्य प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों पर इस साल अब तक कुल 1 हजार 688 मौतें दर्ज हुई हैं। इनमें 18 से 25 वर्ष के Gen-Z युवाओं की संख्या 258 है।
अगर इसमें 18 वर्ष से कम उम्र के किशोर और 25 से 29 वर्ष के युवा भी जोड़ दिए जाएं, तो यह आंकड़ा कुल मौतों का करीब 41 फीसदी हो जाता है।
यानी करीब 700 मौतें युवा वर्ग की हैं। यह आंकड़ा साफ बताता है कि हाईवे पर सबसे ज्यादा खतरा युवाओं को ही है।
राज्य सरकार के पिछले वर्षों के आंकड़े भी यही रुझान दिखाते हैं। 2022 से 2024 के बीच हर उम्र वर्ग में हादसों की संख्या ज्यादा रही।
18 से 25 वर्ष के वर्ग में 2022 में 3 हजार 43, 2023 में 3 हजार 242 और 2024 में 3 हजार 270 मौतें दर्ज हुईं। 25 से 35 वर्ष के वर्ग में यह संख्या इससे भी अधिक रही। इससे पता चलता है कि युवा और मध्य आयु वर्ग हाईवे हादसों में सबसे ज्यादा प्रभावित होता आया है।
पीएम-राहत योजना क्या है
सड़क हादसे के पीड़ितों को समय पर इलाज देने के लिए केंद्र सरकार ने पीएम-राहत योजना शुरू की। इसे 13 फरवरी 2026 को देशभर में लागू किया गया।
यह योजना मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 162 के तहत काम करती है। इसका मकसद है कि हादसे के तुरंत बाद पीड़ित को पैसों की चिंता किए बिना इलाज मिल सके।
योजना के फायदे
इस योजना के तहत किसी भी सड़क पर हुए हादसे में पीड़ित को 1.5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज मिलता है। इसमें एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग और राज्य राजमार्ग, तीनों शामिल हैं।
यह सुविधा हादसे की तारीख से 7 दिन तक वैध रहती है। इसका मकसद गोल्डन आवर में ही मरीज की जान बचाना है। यह लाभ मोटर वाहन हादसे में घायल होने वाले हर नागरिक को मिलता है, चाहे वह किसी भी राज्य का हो।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी योजनाओं की सफलता पूरी तरह पुलिस और अस्पताल प्रशासन के आपसी तालमेल पर निर्भर करती है।
अगर रिपोर्ट समय पर अपलोड नहीं होगी तो सबसे अच्छी योजना का फायदा भी पीड़ित तक नहीं पहुंच पाएगा। मध्य प्रदेश के मामले में यही कमी सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है।
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