मध्यप्रदेश जल निगम में 183 करोड़ की फर्जी बैंक गारंटी का खेल, बैंक ने चेताया फिर भी फर्म को मिले 500 करोड़ के काम
इतना ही नहीं, फर्म को 150 करोड़ रुपए का भुगतान भी हो गया। हैरानी की बात यह है कि बैंक की चेतावनी वाला पत्र जल निगम के रिकॉर्ड से ही गायब है। अब सवाल उठ रहा है कि करोड़ों की फर्जी गारंटी पर इतना बड़ा खेल चलता रहा और जिम्मेदार अधिकारियों को भनक तक नहीं लगी? या फिर चेतावनी को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया? इस पूरे मामले की जांच सीबीआई, ईडी और सेबी कर रहे हैं।
चेतावनी वाला पत्र आखिर कहां गायब हो गया?
बैंक ने साफ बता दिया था कि उसने गारंटी जारी नहीं की। फिर भी ठेकेदार को करोड़ों के सरकारी काम मिल गए। भुगतान भी होता रहा। अब सवाल यह है कि बैंक की चेतावनी वाला पत्र आखिर कहां गायब हो गया? मध्यप्रदेश जल निगम में करीब 183 करोड़ रुपए की फर्जी बैंक गारंटी के मामले में नया खुलासा हुआ है। इस मामले में बैंक का जून 2023 का एक पत्र सामने आया है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जल निगम के रिकॉर्ड में इस पत्र का कोई पता नहीं है।
2023 में ही बैंक ने बता दिया था सच
मामला गांवों में पानी पहुंचाने वाली समूह जल योजनाओं से जुड़ा है। इन योजनाओं के ठेके लेने के लिए मेसर्स तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड (TGL) ने बैंक गारंटी जमा कराई थी। कोलकाता स्थित पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की शाखा ने जून 2023 में मध्यप्रदेश जल निगम के कार्यकारी निदेशक को पत्र लिखा था। इसमें बैंक ने साफ बताया था कि उसने टीजीएल के नाम पर 16.20 करोड़ और 19.60 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी जारी नहीं की है।
इसके बावजूद बैंक का यह पत्र जल निगम के रिकॉर्ड में नहीं मिला। फर्म की ओर से जमा गारंटी को 31 जनवरी 2025 तक वैध बताया गया था। यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब बैंक ने गारंटी जारी करने से इनकार कर दिया था, तो ठेकेदार के काम पर रोक क्यों नहीं लगी?
फर्जी गारंटी के सहारे 500 करोड़ के काम
मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि फर्म को सरकारी काम मिलते रहे। टीजीएल ने वर्ष 2023 से 2025 के बीच करीब 500 करोड़ रुपए की परियोजनाओं पर काम शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, फर्म को करीब 150 करोड़ रुपए का भुगतान भी हो गया।
आखिर बिना असली बैंक गारंटी के इतनी बड़ी रकम का भुगतान कैसे हो गया? बैंक के पत्र की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुंची? अब जांच में इन सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं।
बैंक के ईमेल से खेला गया पूरा खेल
जांच में सामने आया कि जल निगम ने फर्म की बैंक गारंटी की पुष्टि करने के लिए पीएनबी से संपर्क किया था। लेकिन फर्म से जुड़े लोगों ने बैंक की ईमेल पहचान में हेरफेर करके धोखाधड़ी की। इसे Email Phishing कहा जाता है।
इस तरीके में असली ईमेल पते से मिलता-जुलता फर्जी पता तैयार किया जाता है। इसके बाद उसी पहचान से संदेश भेजकर सामने वाले को भरोसा दिलाया जाता है कि जानकारी बैंक से आई है।
इस मामले में भी जल निगम को बैंक गारंटी सही होने की जानकारी दी गई। इसी के आधार पर फर्म के काम आगे बढ़ते रहे। जांच में बैंक की आधिकारिक ईमेल आईडी तक अनधिकृत पहुंच और हैकिंग की बात भी सामने आई है।
बैंक का नाम, मुहर और हस्ताक्षर तक नकली
जांच में फर्जीवाड़े (fake bank guarantee) का एक और गंभीर पहलू सामने आया है। धोखाधड़ी करने वाले गिरोह ने बैंक के नाम और लोगो का इस्तेमाल किया। बैंक की आधिकारिक मुहरें और कर्मचारियों के हस्ताक्षर भी नकली तैयार किए गए।
इसके बाद कागजों पर फर्जी Bank Guarantee बनाई गई। नियमों के अनुसार ऐसी गारंटियों का सत्यापन स्ट्रक्चर्ड फाइनेंशियल मैसेजिंग सिस्टम (SFMS) के माध्यम से होना चाहिए था। लेकिन जांच में सामने आया कि संबंधित फर्जी गारंटियां इस प्रणाली से प्रोसेस ही नहीं हुई थीं।
यानी कागजों पर बैंक गारंटी मौजूद थी, लेकिन बैंक के आधिकारिक सिस्टम में उसका रिकॉर्ड नहीं था।
सीबीआई जांच में सामने आया गायब पत्र
सीबीआई की पूछताछ के बाद कोलकाता स्थित पीएनबी शाखा ने जून 2023 में जल निगम को भेजे गए पत्र की प्रति निकाली। इसके बाद जल निगम में उस पत्र की तलाश की गई। लेकिन किसी भी संबंधित फाइल में उसका रिकॉर्ड नहीं मिला।
यह खुलासा इसलिए गंभीर है, क्योंकि पत्र में बैंक ने दो गारंटियों को जारी करने से स्पष्ट इनकार किया था। अब सवाल है कि बैंक की ओर से भेजा गया पत्र विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज क्यों नहीं हुआ? क्या यह केवल दस्तावेजों के रखरखाव में लापरवाही थी या किसी ने जानबूझकर जानकारी दबाई?
हालांकि जांच पूरी होने से पहले किसी अधिकारी की भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
एसबीआई और बैंक ऑफ बड़ौदा की गारंटी भी फर्जी
फर्जी बैंक गारंटी का मामला केवल पंजाब नेशनल बैंक तक सीमित नहीं रहा। पश्चिम बंगाल की स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) शाखा और बैंक ऑफ बड़ौदा के नाम पर भी फर्जी गारंटी दिए जाने का खुलासा हुआ।
तीर्थ गोपीकॉन के अलावा एमपी बावरिया नाम की फर्म भी मल्टी विलेज स्कीम के तहत काम कर रही थी। 24 मार्च 2025 को एसबीआई ने जल निगम को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि संबंधित बैंक गारंटी उसकी ओर से जारी नहीं की गई थी।
बैंक ऑफ बड़ौदा ने भी ऐसी गारंटी जारी करने से इनकार किया। एसबीआई ने अपने पत्र में बताया कि धोखाधड़ी करने वाले गिरोह ने बैंक की पहचान, मुहरों और कर्मचारियों के नकली हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया था।
इसके बाद जल निगम ने संबंधित फर्मों की अन्य बैंक गारंटियों की जांच कराई। जांच में वे भी फर्जी पाई गईं।
अप्रैल 2025 में खुली पोल, जून में फर्म का ठेका खत्म
जून 2023 में पीएनबी के पहले पत्र के बाद भी मामला लंबे समय तक सामने नहीं आया। वर्ष 2025 में फर्जी बैंक गारंटी का खुलासा होने पर 25 अप्रैल को पीएनबी ने दोबारा जानकारी दी।
बैंक ने स्पष्ट किया कि तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड की सभी संबंधित बैंक गारंटियां फर्जी हैं। इसके बाद जून 2025 में जल निगम ने टीजीएल का ठेका समाप्त कर दिया। फर्म ने चार तरह की बैंक गारंटी दी थीं। इनमें परफॉर्मेंस गारंटी, एडिशनल परफॉर्मेंस गारंटी, मोबिलाइजेशन एडवांस गारंटी और रिटेंशन गारंटी शामिल थीं।
ये गारंटियां सरकारी काम पूरा करने, अग्रिम भुगतान और ठेके की शर्तों से जुड़ी वित्तीय सुरक्षा के लिए ली जाती हैं।
सीबीआई के साथ ईडी और सेबी की भी जांच
करीब 183 करोड़ रुपए की फर्जी बैंक गारंटी का मामला अब कई जांच एजेंसियों तक पहुंच चुका है। सीबीआई के अलावा प्रवर्तन निदेशालय (ED) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) भी मामले की जांच से जुड़े हैं।
मामले में फर्म से जुड़े लोग जेल में हैं। बैंक कर्मचारियों की भूमिका भी कार्रवाई के दायरे में है। जांच एजेंसियां फर्जी दस्तावेजों, बैंकिंग प्रक्रिया में गड़बड़ी और वित्तीय लेनदेन से जुड़े पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं।
घोटाले के बाद बदले नियम, अब ई-बैंक गारंटी जरूरी
इतने बड़े फर्जीवाड़े के बाद जल निगम ने बैंक गारंटी से जुड़ी व्यवस्था में बदलाव किए हैं। अब विभाग में कागज पर दी जाने वाली बैंक गारंटियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। इनकी जगह E-Bank Guarantee प्रणाली लागू की गई है। इसके जरिए बैंकों से सीधे SFMS के माध्यम से गारंटी का सत्यापन किया जा सकेगा।
जनवरी 2025 से पहले आवंटित ठेकों के लिए भी पुरानी कागजी गारंटियों को इलेक्ट्रॉनिक गारंटी में बदलना अनिवार्य किया गया है। इसके अलावा टीजीएल से रकम की वसूली की कार्रवाई शुरू करने के लिए इंदौर कलेक्टर को पत्र लिखा गया है।
जल निगम के एमडी बोले- पत्र का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला
मध्यप्रदेश जल निगम के प्रबंध निदेशक वीएस चौधरी कोलसानी ने भी बैंक के जून 2023 वाले पत्र को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। उनके मुताबिक जिस पत्र की बात सामने आई है, उसका जल निगम में कोई रिकॉर्ड नहीं था। सीबीआई भी इस मामले की जांच कर चुकी है। उन्होंने बताया कि फर्म ने ईमेल में गड़बड़ी करके पूरा षड्यंत्र रचा था। जल निगम सभी जांच एजेंसियों को पूरा सहयोग कर रहा है।
दो साल तक क्यों नहीं पकड़ा गया फर्जीवाड़ा?
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल सरकारी निगरानी और बैंक गारंटी के सत्यापन की व्यवस्था पर उठता है। बैंक ने जून 2023 में ही गारंटी जारी करने से इनकार किया था। इसके बाद भी फर्म ने करीब 500 करोड़ रुपए के काम शुरू कर दिए। उसे लगभग 150 करोड़ रुपए का भुगतान भी हो गया।
सवाल सिर्फ फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का भी है, जिसमें करोड़ों रुपए की सरकारी परियोजनाओं की वित्तीय सुरक्षा की जांच समय रहते नहीं हो सकी। अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि बैंक का पत्र जल निगम के रिकॉर्ड से क्यों गायब था, फर्जी ईमेल के आधार पर सत्यापन कैसे स्वीकार हुआ और इतनी बड़ी वित्तीय गड़बड़ी लंबे समय तक पकड़ में क्यों नहीं आई।