केन-बेतवा लिंक परियोजना की मंजूरी पर सवाल, अधूरा पुनर्वास बना बड़ी वजह
समझें क्या है पूरा मामला
- शर्तें अधूरी: वन विभाग की जरूरी शर्तें पूरी न होने से केन-बेतवा प्रोजेक्ट कानूनी संकट में है।
- अनुमति समाप्त: तय समयसीमा में काम न होने से 45,000 करोड़ के प्रोजेक्ट की क्लीयरेंस खत्म।
- जंगल को खतरा: दौधन बांध बनने से पन्ना टाइगर रिजर्व का 6,000 हेक्टेयर कोर क्षेत्र डूबेगा।
- नियमों का उल्लंघन: कोर जंगल में सख्त पाबंदी के बावजूद 78 मेगावाट का पावर प्लांट प्रस्तावित है।
- पुनर्वास बाकी: प्रभावित परिवारों का पूरा पुनर्वास न होने से वन विभाग को जमीन नहीं मिली।
मध्यप्रदेश में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट कानूनी विवादों में घिर गया है। फॉरेस्ट क्लीयरेंस की कई जरूरी शर्तें अब तक पूरी नहीं हुईं। प्रभावित परिवारों का पुनर्वास अधूरा है। जंगल में पावर प्लांट न बनाने की शर्त के बावजूद 78 मेगावाट प्लांट का प्रस्ताव है। सरकार का कहना है कि सारी मंजूरियां मिल चुकी हैं।
देश की पहली नदी जोड़ो योजना इन दिनों सुर्खियों में है। केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के दस्तावेजों की पड़ताल से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। फॉरेस्ट क्लीयरेंस की कई अनिवार्य शर्तों का पालन नहीं हुआ। इनमें प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की शर्त सबसे अहम है।
नियम कहते हैं कि शर्तें पूरी न होने पर दोबारा क्लीयरेंस लेना जरूरी होता है। जिला प्रशासन के आंकड़े बताते हैं कि पुनर्वास अब भी अधूरा है। सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी और नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी की सिफारिशें भी पूरी तरह लागू नहीं हुईं।
करीब 45 हजार करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट की वैधता अब सवालों के घेरे में है।
6,000 हेक्टेयर जंगल डूबेगा
बुंदेलखंड तक पानी पहुंचाने के लिए दौधन बांध बनाया जा रहा है। इससे पन्ना टाइगर रिजर्व का 6,000 हेक्टेयर से ज्यादा कोर एरिया जलमग्न होगा। इसी वजह से प्रोजेक्ट को दो चरणों में क्लीयरेंस दी गई थी।
मई 2017 में स्टेज-1 और अक्टूबर 2023 में स्टेज-2 फॉरेस्ट क्लीयरेंस मिली। दोनों में पर्यावरण संरक्षण और पुनर्वास से जुड़ी कई शर्तें रखी गईं। दस्तावेजों के मुताबिक इनका पूरा पालन नहीं हुआ।
जमीन का कागजी हस्तांतरण
पहली बड़ी शर्त थी कि जमीन वन विभाग को सौंपकर उसे आरक्षित वन घोषित किया जाए। पन्ना के पश्चिम में 6,809 हेक्टेयर गैर-वन भूमि इसमें शामिल थी। अप्रैल 2024 तक यह प्रक्रिया पूरी होनी थी।
सरकार ने गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिए। लेकिन जुलाई 2024 की समीक्षा बैठक में तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर ने बताया कि रिकॉर्ड में हस्तांतरण हुआ, मगर भौतिक कब्जा अब तक नहीं मिला। पुनर्वास अधूरा होने से लोग जमीन खाली नहीं कर पाए।
पावर प्लांट पर रोक बेअसर
फॉरेस्ट क्लीयरेंस में साफ शर्त थी कि जंगल के भीतर कोई पावर प्लांट नहीं बनेगा। इसके बावजूद केन-बेतवा प्रोजेक्ट प्राधिकरण 78 मेगावाट के प्लांट का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है।
पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर के मुताबिक प्रोजेक्ट के नक्शे में अब भी पावर प्लांट दर्ज है। जुलाई 2024 की बैठक में इस पर अलग स्टडी कराने का फैसला हुआ, जो शर्तों के खिलाफ है।
पेड़ों की गिनती भी नहीं हुई
स्टेज-1 क्लीयरेंस में प्रोजेक्ट क्षेत्र के सभी पेड़ों की नई गिनती अनिवार्य थी। पन्ना टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर बीके पटेल ने खुद माना कि यह गिनती नहीं कराई गई। इससे पर्यावरणीय नुकसान का सही आकलन नहीं हो सका।
राष्ट्रीय संस्थाओं की सिफारिशें अधूरी
शर्त-23 के तहत एनटीसीए (NTCA – National Tiger Conservation Authority), एनबीडब्ल्यूएल (NBWL – National Board for Wildlife) और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरा पालन जरूरी था। दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि सीईसी (CEC – Central Empowered Committee) की भी कई सिफारिशें अधूरी रह गईं।
पुनर्वास अब भी अधूरा
स्टेज-2 क्लीयरेंस के मुताबिक 12 महीने में सभी राजस्व गांव वन विभाग को सौंपने थे। इसके लिए पुनर्वास जरूरी था, जो समय पर पूरा नहीं हुआ। मुआवजे को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी है और कई गांवों में विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं।
छतरपुर जिले के आंकड़े बताते हैं कि कई परिवारों को अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है। अगस्त 2017 की पर्यावरणीय स्वीकृति में भी शर्त थी कि निर्माण से पहले शत-प्रतिशत पुनर्वास हो, जो अब तक अधूरा है।
मंजूरी खत्म होने का प्रावधान
स्टेज-2 क्लीयरेंस की शर्त-43 कहती है कि एक साल में शर्तें पूरी न होने पर मंजूरी अपने आप खत्म मानी जाएगी। मौजूदा हालात बताते हैं कि कई शर्तें तय समय में पूरी नहीं हो सकीं।
हिमांशु ठक्कर का कहना है कि केन नदी का पानी यमुना में मिलता है, इसलिए डाउनस्ट्रीम की जल जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन जरूरी था। उनके मुताबिक यह आकलन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
वन विभाग ने नहीं दिया जवाब
इन सभी मुद्दों पर वन विभाग से सवाल पूछे गए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। पूछा गया कि शर्तों के उल्लंघन के बावजूद प्रोजेक्ट क्यों नहीं रोका गया और यह किस आधार पर चल रहा है।
सरकार का पक्ष
नर्मदा घाटी विकास के एसीएस डॉ. राजेश राजौरा का कहना है कि भारत सरकार ने सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं। उनके मुताबिक प्रोजेक्ट की सभी मंजूरियां दी जा चुकी हैं और इसे अवैध बताना गलत है।
FAQ
- केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट क्यों विवादों में है?
फॉरेस्ट क्लीयरेंस की कई जरूरी शर्तें पूरी नहीं हुईं। पुनर्वास और जमीन हस्तांतरण अधूरा है। इससे प्रोजेक्ट की वैधता पर सवाल उठे हैं। - केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट की लागत कितनी है?
यह करीब 45,000 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट है। यह देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना है। - पन्ना टाइगर रिजर्व पर क्या असर पड़ेगा?
दौधन बांध बनने से रिजर्व का 6,000 हेक्टेयर से ज्यादा कोर एरिया डूब जाएगा। इससे वन्यजीवों पर बड़ा असर पड़ेगा।
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