मेडिकल सिस्टम पर दाग: मरीज इंतजार में रहे, रिकॉर्ड में हो गया किडनी ट्रांसप्लांट!

Amresh Kushwaha | Aug 13, 2026, 12:01 IST
रिकॉर्ड में हो गया किडनी ट्रांसप्लांट
मध्य प्रदेश में किडनी ट्रांसप्लांट के खेल का बड़ा खुलासा हुआ है। वेटिंग लिस्ट में आगे के मरीजों को दरकिनार कर पीछे वालों को किडनी दी जा रही है। गरीब मरीजों को बीमारी या पैसों का डर दिखाकर मना कराया जाता है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मध्य प्रदेश में किडनी ट्रांसप्लांट में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है।
  • वेटिंग लिस्ट में आगे मरीजों को दरकिनार कर पीछे वालों को किडनी दी गई।
  • गरीब मरीजों को बीमारी या पैसों का डर दिखाकर मना कराया गया।
  • एक मामले में 17 मरीजों को छोड़कर 18वें को किडनी दी गई।
  • सोटो (State Organ and Tissue Transplant Organisation) के रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिली है।

विश्व अंगदान दिवस के मौके पर मध्य प्रदेश के ऑर्गन ट्रांसप्लांट सिस्टम की बड़ी पड़ताल सामने आई है। जरूरतमंद मरीज महीनों से किडनी का इंतजार करते हैं। वहीं, वेटिंग लिस्ट के मुताबिक उन्हें अंग नहीं मिल पाता। गरीब मरीजों को पैसों की कमी या बीमारी का डर दिखाकर बाहर कर दिया जाता है। रिकॉर्ड में उन्हें रिफ्यूजल यानी इनकार करने वाला दिखाया जाता है। जबकि सच यह होता है कि उनसे संपर्क ही नहीं किया जाता। इस पूरे खेल में कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।



17 मरीजों को छोड़ा, 18वें को मिली किडनी

इंदौर के केयर सीएचएल हॉस्पिटल में 23 मार्च को एक 34 वर्षीय ब्रेन डेड मरीज के परिजनों ने अंगदान किया था। अगले दिन 24 मार्च को एक किडनी और लिवर केयर सीएचएल को दिए गए थे। जबकि दूसरी किडनी इंदौर के शेल्बी हॉस्पिटल को दी गई। जिस मरीज को यह किडनी मिली, वह वेटिंग लिस्ट में 18वें नंबर पर था।



पहले नंबर के मरीज का एलोकेशन स्कोर 132 था। जबकि 18वें नंबर के मरीज का स्कोर सिर्फ 17 था। सोटो के रिकॉर्ड में उससे आगे के सभी 17 मरीजों को किडनी लेने से इनकार करने वाला बताया गया है। शेल्बी हॉस्पिटल की ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर हेमलता परमार का कहना है कि कोऑर्डिनेटर ने मरीजों से फोन पर बात की थी। जांच में यह भी सामने आया कि एक मरीज का स्कोर 17 से बढ़कर 22 कर दिया गया। वहीं एक और मरीज का स्कोर 76 से बढ़ाकर 81 कर दिया गया।



पैसों का डर दिखाकर हटाया गया पहला मरीज

जबलपुर के शिवप्रकाश (नाम परिवर्तित) की उम्र 30 साल है। वे इंदौर के चोइथराम हॉस्पिटल में रजिस्टर्ड थे। 18 फरवरी 2026 को वे 146 एलोकेशन स्कोर के साथ वेटिंग लिस्ट में पहले नंबर पर थे। इसके बावजूद कोऑर्डिनेटर ने उन्हें फोन कर खाते में चार से पांच लाख रुपए रखने को कहा।



जब शिवप्रकाश ने आयुष्मान कार्ड से इलाज की बात कही, तो कोऑर्डिनेटर ने रकम बढ़ाकर 10 लाख रुपए बता दी। दोबारा बातचीत में ट्रांसप्लांट कराने में असमर्थता जताई गई। इसके बाद सोटो को भेजी रिपोर्ट में लिखा गया कि मरीज ने कॉल रिसीव नहीं की। इसके बाद यह किडनी 117 स्कोर वाले दूसरे मरीज को आवंटित कर दी गई।



रिकॉर्ड में ट्रांसप्लांट, मरीज को आज भी इंतजार

इंदौर की दीपाली (नाम परिवर्तित) किडनी की बीमारी से जूझ रही हैं। वे केयर सीएचएल हॉस्पिटल में रजिस्टर्ड हैं। सोटो के रिकॉर्ड में उनकी आईडी पर ट्रांसप्लांट पूरा दिखाया गया है। लेकिन असल में स्वीकृत किडनी शेल्बी हॉस्पिटल में भर्ती एक 48 वर्षीय दूसरी महिला मरीज को लगाई गई।



परिवार का कहना है कि दीपाली की सर्जरी हुई ही नहीं है। इसके बावजूद रिकॉर्ड में उनका ट्रांसप्लांट दर्ज कर दिया गया। यह मामला दिखाता है कि कागजों पर कुछ और और हकीकत में कुछ और हो रहा है।



बीमारी का डर दिखाकर भी हटाए गए मरीज

मंदसौर की 60 वर्षीय सरला (नाम परिवर्तित) लंबे समय से डायलिसिस पर थीं। वे केयर सीएचएल हॉस्पिटल में रजिस्टर्ड थीं। 24 मार्च को किडनी मिलने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया। वे वेटिंग लिस्ट में तीसरे नंबर पर थीं। परिजनों के मुताबिक डॉक्टरों ने बताया कि उनकी दवा से खून पतला हो गया है। इससे सर्जरी में ब्लीडिंग का खतरा बताया गया। मौखिक रूप से उन्हें मना करवा दिया गया। इसके बाद किडनी दूसरे मरीज को दे दी गई।



चार सवाल जो खड़े करते हैं शक

पड़ताल में चार बड़े सवाल सामने आए हैं। पहला, एक साथ 17 मरीजों के रिकॉर्ड में इनकार क्यों लिखा गया। दूसरा, भर्ती मरीज को बीमारी का डर दिखाकर ऑपरेशन टाला गया। फिर रिकॉर्ड में फोन नहीं उठाने की बात लिखी गई। तीसरा, मध्य प्रदेश में यह तय करने का अधिकार सिर्फ दो लोगों के पास है कि अंग किसे मिलेगा। चौथा, तमिलनाडु में पोर्टल पर अस्पताल, मरीज की यूआईडी (Unique Identification) और वेटिंग नंबर दिखता है। लेकिन मध्य प्रदेश में ऐसी कोई पारदर्शी व्यवस्था नहीं है।



हेराफेरी के चार आसान तरीके

पड़ताल में हेराफेरी के चार आसान तरीके सामने आए हैं। पहला तरीका है वेटिंग में पहले मरीज को मेडिकली अनफिट बताना। दूसरा तरीका है मरीज से संपर्क नहीं होने का बहाना बनाना। तीसरा तरीका है सर्जरी के लिए जरूरी रकम नहीं होने की बात कहकर छोड़ना। चौथा तरीका है मरीज को बुलाकर दूसरी बीमारियों का हवाला देकर परिजनों से रिफ्यूजल ले लेना। इन सभी तरीकों से असली मरीज को लिस्ट से बाहर कर दिया जाता है।



अफसर का जवाब, जांच का भरोसा

इस मामले में स्टेट अप्रोप्रिएट अथॉरिटी और सोटो के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया ने अपना वर्जन दिया है। उनका कहना है कि डोनेशन से मिले अंग मरीज को एलोकेशन स्कोर के आधार पर ही आवंटित किए जाते हैं। उनके मुताबिक पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है। डॉ. घनघोरिया ने कहा कि अगर वेटिंग लिस्ट दरकिनार कर किसी और मरीज को अंग देने का मामला उनके संज्ञान में आता है तो जांच कराई जाएगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि अस्पताल दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी।



एमजीएम कॉलेज के पास है जिम्मेदारी

मध्य प्रदेश में डोनेशन से मिले अंग किस मरीज को मिलेंगे, यह तय करने का काम सोटो करता है। इसका दफ्तर इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज से चलता है। स्टेट अप्रोप्रिएट अथॉरिटी और डीन का पद डॉ. अरविंद घनघोरिया के पास है। यानी अंग आवंटन का पूरा अधिकार सीमित लोगों के हाथ में है। इसी वजह से पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। भास्कर मरीजों की पहचान गुप्त रख रहा है। सभी नाम बदले गए हैं। लेकिन ऑर्गन अलॉटमेंट की पूरी चैट भास्कर के पास मौजूद है।



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