MP लोकायुक्त को RTI छूट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, जवाब नहीं दे सकी सरकार

Amresh Kushwaha | May 20, 2026, 09:33 IST
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सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन को RTI से दी गई छूट पर कड़े सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने पूछा कि क्या यह कोई खुफिया एजेंसी है? मुख्य सचिव और महाधिवक्ता (AG) को 20 मई को खुद पेश होने के निर्देश दिए गए हैं।

शॉर्ट में समझें क्या है पूरा मामला...

  • मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन को आरटीआई (RTI) यानी सूचना के अधिकार से छूट दी गई है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस छूट पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • कोर्ट ने पूछा कि क्या लोकायुक्त कोई खुफिया या सुरक्षा संगठन है?
  • मध्य प्रदेश सरकार रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं दे सकी जो यह साबित करे।
  • कोर्ट ने मुख्य सचिव और महाधिवक्ता को 20 मई की सुनवाई में खुद पेश होने के निर्देश दिए हैं।

लोकायुक्त को RTI से छूट क्यों?

मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इस अपील पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा कि क्या यह संगठन आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 24(4) के तहत छूट पाने का हकदार है। यह धारा केवल खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को छूट देती है।



जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने सीधे पूछा कि सरकार के पास क्या आधार है।



सरकार जवाब नहीं दे सकी

सुनवाई में मध्य प्रदेश सरकार रिकॉर्ड पर कोई ठोस तथ्य पेश नहीं कर सकी। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो यह साबित करे कि लोकायुक्त संगठन किसी खुफिया या सुरक्षा एजेंसी की तरह काम करता है।



कोर्ट ने यह भी कहा कि इस स्पष्टीकरण के बिना 2011 में जारी की गई छूट संबंधी अधिसूचना आरटीआई कानून की भावना के विपरीत और कानूनी आधार पर कमजोर लगती है।



CS और AG को नोटिस, 20 मई को पेशी

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त को RTI छूट के मामले में मुख्य सचिव अनुराग जैन और महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को नोटिस जारी किया है। इस नोटिस की कॉपी प्रदेश के लॉ सेक्रेटरी को भी भेजी गई है। दोनों अधिकारियों को 20 मई की सुनवाई में खुद पेश होकर यह स्पष्ट करना है कि लोकायुक्त को RTI से छूट किस कानूनी आधार पर दी गई।



कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो 2011 की अधिसूचना रद्द की जा सकती है।



हाई कोर्ट पहले ही आदेश दे चुका है

इस मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहले भी लोकायुक्त संगठन के खिलाफ आदेश दे चुका है। हाई कोर्ट ने लोकायुक्त को 30 दिन के भीतर आरटीआई की जानकारी देने और पांच हजार रुपए जुर्माना भरने का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद यह पूरा विवाद और ज्यादा गंभीर हो गया है।



सरकारी वकीलों पर भी भड़का कोर्ट

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार के वकीलों के रवैये पर भी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि अक्सर मध्य प्रदेश से जुड़े मामलों में सरकारी वकील मौजूद नहीं रहते। इस मामले में भी बहस खत्म होने के बाद बुलाने पर वकीलों ने केस की जानकारी होने से इनकार कर दिया।



इसी वजह से कोर्ट ने सरकारी वकीलों के पैनल की समीक्षा करने को कहा है। कोर्ट चाहता है कि अदालत में प्रभावी तरीके से बहस न करने वाले वकीलों के खिलाफ फैसला लिया जाए।



RTI छूट की अधिसूचना पर उठे सवाल

2011 में जारी इस अधिसूचना से लोकायुक्त संगठन को RTI (Right to Information) के दायरे से बाहर कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यह छूट RTI कानून की मूल भावना के खिलाफ लगती है। पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए बने इस कानून का मकसद यही था कि सरकारी संस्थाएं नागरिकों को जानकारी दें। यदि खुद भ्रष्टाचार रोकने वाली संस्था ही जानकारी छिपाए, तो यह कहां तक सही है, यही सवाल अब अदालत ने उठाया है।



यह खबर क्यों जरूरी है

यह खबर इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि आरटीआई यानी सूचना का अधिकार भारतीय लोकतंत्र की नींव का एक अहम हिस्सा है। जब एक ऐसी संस्था जो भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी है, खुद RTI के दायरे से बाहर हो जाती है, तो यह जवाबदेही के सिद्धांत को कमजोर करती है।



सामाजिक और डिजिटल नैतिकता के नजरिए से भी यह जरूरी है कि नागरिक जानें कि सार्वजनिक संस्थाएं उनके सामने जवाबदेह हैं या नहीं। यह मामला देश भर के लोकायुक्त और अन्य भ्रष्टाचाररोधी संस्थाओं पर RTI की लागू होने की दिशा तय कर सकता है।



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