मध्यावधि 2026: ढाई साल में मोहन यादव सरकार का रिपोर्ट कार्ड क्या?
13 जून 2026 को मोहन सरकार के ढाई साल पूरे हो गए हैं। thesootr ने मध्यप्रदेश का अब तक का सबसे बड़ा जनमत सर्वे किया है। इस सर्वे में 29 हजार से ज्यादा लोगों की राय सामने आई हैं।
मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा जनमत सर्वे
ढाई साल बीत गए। मोहन यादव सरकार का आधा सफर पूरा हो चुका है। अब उल्टी गिनती शुरू है।
ठीक इसी वक्त thesootr लेकर आया है एक बड़ा सर्वे। इस सर्वे (thesootr Survey) में 230 विधानसभाओं, 51 जिलों और 10 संभागों से डेटा इकट्ठा किया गया।
हमने पूछे सिर्फ तीन सवाल
1- क्या आप अपने विधायक से संतुष्ट हैं?
2- BJP और डॉ. मोहन यादव की सरकार से संतुष्ट हैं या नहीं?
3- क्या कांग्रेस प्रदेश में active दिखती है?
विधायक को मिले 53.1% अंक
सर्वे में शामिल होने वाले 53.1% लोगों ने कहा कि वे अपने विधायक से संतुष्ट हैं। वहीं 230 में से 142 सीटों पर यानी करीब 62% सीटों पर विधायक संतुष्टि 50% या उससे ज्यादा रही।
बता दें कि यह तस्वीर पूरे प्रदेश में एक जैसी नहीं है। शहडोल संभाग में विधायक संतुष्टि 65.2% तक पहुंची। वहीं ग्वालियर में यह गिरकर सिर्फ 31.8% रही। दोनों के बीच 33 अंक से ज्यादा का फर्क है। इसका मतलब यह है कि प्रदेश का औसत किसी एक सीट की असली तस्वीर नहीं दिखाता।
सरकार पर जनता बंटी हुई है
सरकार संतुष्टि 49.1% रही। यह विधायक संतुष्टि से ठीक 4 अंक कम है। और यह 50% की रेखा से नीचे है।
113 सीटों पर सरकार को 50% से ज्यादा समर्थन मिला। लेकिन 64 सीटों पर यह 40% से भी नीचे गिर गई। यानी हर चौथी-पांचवीं सीट पर सरकार के काम को लेकर जनता नाखुश है।
यह विधायक-सरकार अंतराल इस सर्वे की सबसे बड़ी बात है। लोग अपने विधायक को तो मान लेते हैं, पर सरकार के कामकाज पर राय बंटी हुई है। सरल शब्दों में- चेहरा स्वीकार, नीतियों पर सवाल।
कांग्रेस को 48.2% ने सक्रिय माना
लगभग आधे लोगों ने माना कि कांग्रेस प्रदेश में सक्रिय दिख रही है। 105 सीटों पर यह आंकड़ा 50% से ऊपर है।
सर्वे के दौरान एक दिलचस्प बात भी सामने आई। जहां सरकार से ज्यादा नाराजगी है, वहां कांग्रेस (एमपी कांग्रेस) की सक्रियता कम दिखती है।
जहां राजनीतिक माहौल गर्म है, वहां दोनों पक्ष दिखते हैं। इसका मतलब- कांग्रेस असंतुष्ट इलाकों में उतनी मजबूत नहीं है, जितनी होनी चाहिए।
भाजपा और कांग्रेस के विधायकों की संतुष्टि लगभग बराबर
भाजपा (एमपी बीजेपी) के 164 विधायकों वाली सीटों पर विधायक संतुष्टि 52.9% रही। कांग्रेस के 64 विधायकों वाली सीटों पर 53.8%। यानी दोनों लगभग बराबर।
फर्क सरकार-संतुष्टि में है। भाजपा सीटों पर यह 50.6% है, कांग्रेस सीटों पर 45.3%। लोग दल की रेखा से ज्यादा अपने विधायक के काम पर राय बना रहे हैं।
उत्तर-मध्य में सबसे ज्यादा नाराजगी
प्रदेश का ऊंचा औसत चार बड़े संभागों की वजह से है- शहडोल, उज्जैन, इंदौर और जबलपुर। ये मिलकर कुल जवाबों का 51.1% देते हैं।
दूसरी तरफ ग्वालियर, नर्मदापुरम, सागर और चंबल में असंतोष ज्यादा है। ये संभाग मिलकर 28.7% जवाब देते हैं, लेकिन औसत को नीचे खींचते हैं। असंतोष बिखरा नहीं है- यह उत्तर-मध्य अंचल में सिमटा हुआ है।
तो क्या है इसका मतलब
तीनों आंकड़े 48 से 53% के बीच हैं। न कोई जबरदस्त लहर है न बड़ी नाराजगी। यह एक संतुलित, करीबी जनमत की तस्वीर है।
सत्ता पक्ष की बढ़त बारीक है। विधायक का चेहरा अहम रहेगा। और नतीजा करीब 111 स्विंग सीटों पर तय होगा।
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