97 हजार आंगनवाड़ियां राशन को तरसीं, मध्य प्रदेश के सभी 7 पोषण आहार प्लांट बंद
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश में बच्चों को साल में 300 दिन पोषण आहार देना था।
- आंगनबाड़ियों में असल में सिर्फ 170 दिन आहार मिल पाया।
- प्रदेश के सभी 7 पोषण आहार प्लांट अब बंद हो चुके हैं।
- एनएफएचएस-6 सर्वे में कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ी है।
- दतिया में अतिकुपोषित बच्ची की मौत से हालात उजागर हुए।
मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में कुपोषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। बालाघाट से लेकर दतिया तक मासूम बच्चे इसकी चपेट में हैं। सरकार का दावा है कि बच्चों को पूरा पोषण आहार मिल रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहती है।
300 की जगह 170 दिन आहार
केंद्र सरकार के मिशन पोषण 2.0 के तहत नियम साफ हैं। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को साल में 300 दिन आहार मिलना चाहिए। छह साल तक के बच्चों को भी यही सुविधा मिलनी है। वहीं, मध्य प्रदेश की 97 हजार आंगनबाड़ियों में हकीकत अलग है। जुलाई तक सिर्फ करीब 170 दिन ही नियमित आहार मिल पाया। यानी तय लक्ष्य से लगभग आधा आहार ही बंट सका।
सभी 7 प्लांट बंद
प्रदेश में पोषण आहार बनाने वाले कुल 7 प्लांट थे। ये रीवा, सागर, देवास, शिवपुरी और होशंगाबाद जैसे जिलों में लगे थे। भारी घाटे के चलते सभी प्लांट अब बंद हो चुके हैं। नई व्यवस्था के लिए अब तक टेंडर तक जारी नहीं हुए। इससे आहार आपूर्ति की रफ्तार और धीमी पड़ गई है।
NFHS-6 के डराने वाले आंकड़े
एनएफएचएस-6 (National Family Health Survey-6) के ताजा आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं। देश के ज्यादातर राज्यों में कुपोषण के आंकड़े सुधरे हैं। वहीं, मध्य प्रदेश में तस्वीर उलटी है। प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अंडरवेट बच्चे 33% से बढ़कर 42% से ज्यादा हो गए। यानी हर 10 में से 4 बच्चे कम वजन के हैं। वेस्टिंग यानी सूखेपन से प्रभावित बच्चे भी 6% बढ़े हैं। अब हर चौथा बच्चा इस समस्या से जूझ रहा है। स्टंटिंग यानी कम लंबाई के मामलों में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है। फिर भी 33.3% बच्चे स्टंटिंग की चपेट में हैं।
लाड़ली बहना से बाहर महिलाएं
बैगा, भारिया और सहरिया जनजाति की महिलाओं को अलग योजना का लाभ मिलता है। 2017 से आहार अनुदान योजना के तहत परिवार की मुखिया महिला को पैसा मिलता है। पहले यह राशि 1000 रुपए थी, अब 1500 रुपए है। लाड़ली बहना योजना के नियम इसे रोकते हैं। नियम 4.4 के मुताबिक 1500 रुपए या ज्यादा पाने वाली महिला पात्र नहीं मानी जाती। इस वजह से इन जनजातियों की तीन लाख से ज्यादा महिलाएं लाड़ली बहना से बाहर हैं।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि आहार अनुदान सिर्फ पोषण के लिए मिलता है। यह परिवार की महिला मुखिया को दिया जाता है। जबकि लाड़ली बहना योजना का मकसद आर्थिक आत्मनिर्भरता देना है। उनके अनुसार हर वयस्क महिला को अलग से पात्र माना जाना चाहिए।
देश की कमजोर जनजातियां
देश में 75 समूहों को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह यानी पीवीटीजी (Particularly Vulnerable Tribal Group) घोषित किया गया है। मध्य प्रदेश में डिंडोरी, मंडला, बालाघाट, अनूपपुर और उमरिया में बैगा जनजाति रहती है। श्योपुर में सहरिया और छिंदवाड़ा के पातालकोट में भारिया जनजाति बसी है। देशभर में ऐसी आबादी करीब 45 लाख है। इनमें से सबसे ज्यादा करीब 12 लाख लोग मध्य प्रदेश में रहते हैं। यानी हर चौथा व्यक्ति मध्य प्रदेश का ही निवासी है।
दतिया में मासूम की मौत
बालाघाट के बाद अब दतिया से भी दर्दनाक मामला सामने आया है। यह जिला कुपोषण रोकने के लिए पहले सम्मानित हो चुका है। साल 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे नवाचार के लिए सराहा था। इसी जिले के सलैया पमार आदिवासी डेरा गांव में हादसा हुआ।
यहां 16 महीने की नीलू आदिवासी अतिकुपोषित थी। उल्टी-दस्त की शिकायत पर 10 अगस्त को उसे अस्पताल भर्ती कराया गया। उसका वजन सिर्फ 5.2 किलो था। इस उम्र में बच्चे का वजन करीब 10 किलो होना चाहिए। हालत सुधरने पर परिवार सोमवार को उसे घर ले आया। घर पहुंचते ही तबीयत फिर बिगड़ गई। इलाज से पहले ही बच्ची की मौत हो गई।
दस्तक अभियान के बावजूद बड़ी लापरवाही सामने आई। बच्ची की मौत के बाद भी स्वास्थ्य टीम गांव नहीं पहुंची। इसी गांव में 6 और बच्चे अतिकुपोषित हैं। बीएमओ (Block Medical Officer) डॉ. राहुल चऊदा ने टीम भेजने की बात कही है। कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने मामले की जांच का भरोसा दिया है।
गांव में अब भी हालात खराब
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसी गांव 3 अतिकुपोषित बच्चे घर पर ही मिले। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पिस्ता आदिवासी ने बड़ी वजह बताई। परिजन काम छूटने के डर से बच्चों को एनआरसी (Nutrition Rehabilitation Centre) में भर्ती नहीं कराते। समझाने पर एक परिवार ने विवाद भी किया। हैरानी की बात है कि खुद कार्यकर्ता का बच्चा भी कुपोषण के कारण एनआरसी में भर्ती है।
मंगलवार, 18 अगस्ता की दोपहर सवा 3 बजे गांव का उपस्वास्थ्य केंद्र बंद मिला। आंगनबाड़ी में कुल 70 बच्चे दर्ज हैं। इनमें से सिर्फ 20 बच्चे पोषण ट्रैकर एप पर दर्ज हैं। समग्र आईडी और आधार न होने से बाकी बच्चों को आहार नहीं मिल रहा। कार्यकर्ता ने इसकी लिखित शिकायत भी की है। गर्भवती महिलाओं का टेक होम राशन भी 5 महीने से नहीं आया।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ी है। पोषण हर बच्चे का बुनियादी हक है, जो संविधान की भावना का हिस्सा है। सरकारी योजनाओं का असल जमीन पर क्रियान्वयन जांचना जनता का अधिकार है। पोषण आहार प्लांट बंद होना और आंकड़ों में गिरावट जनहित का विषय है। आदिवासी महिलाओं का योजनाओं से बाहर होना सामाजिक न्याय से जुड़ा सवाल उठाता है।
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