MP में 12 रुपए से कैसे मिटेगा कुपोषण? इतने कम बजट में दाल-चावल खरीदना भी मुश्किल
समझें क्या है पूरा मामला
- MP में 60 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं।
- वेस्टिंग 18.9% से बढ़कर 23.8% हुई है।
- अंडरवेट बच्चे 33% से 39.7% पहुंच गए।
- पूरक आहार के लिए सिर्फ 12 रुपए रोज खर्च हो रहे हैं।
- 3 हजार 768 करोड़ बजट के बाद भी स्थिति बदतर है।
कुपोषण की जंग जमीनी से ज्यादा जुबानी नजर आ रही है। विभाग से लेकर सरकार तक कुपोषण पर जीत के लिए बड़े- बड़े वादे तो होते हैं। लेकिन हकीकत से ये सब बहुत दूर हैं। NFHS-6 की रिपोर्ट के आंकड़े मध्य प्रदेश में कुपोषण के नाम पर हो रही रस्मअदायगी से पर्दा उठा रही है।
मध्य प्रदेश में कुपोषित बच्चों की संख्या 60 लाख से ज्यादा है। इन बच्चों को कुपोषण की गिरफ्त से निकालने के लिए आंगनबाड़ी केंद्र और पोषण अभियान 2.0 चलाए जा रहे हैं।
सरकार ने इसके लिए 3 हजार 768 करोड़ का बजट रखा है। बजट तो तगड़ा है लेकिन बच्चों के दैनिक पोषण के लिए जो राशि रखी गई है वह मंहगाई के इस दौर में मजाक ही नजर आती है।
आयोजन और विज्ञापन में कुपोषण से जंग
सरकार की कुपोषण के खिलाफ जंग विज्ञापन और आयोजनों में ही दिखती है, जबकि आंगनबाड़ी केंद्रों में कुपोषित बच्चों की हालत इसे झुठला देती है। मध्य प्रदेश में आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए बच्चों को पूरक पोषण आहार उपलब्ध कराया जाता है।
प्रदेश में दर्ज 60 लाख से ज्यादा कुपोषित बच्चों में से हर एक को 12 रुपए खर्च कर पूरक पोषण आहार दिया जाता है। इस राशि से बच्चों के लिए पोषण देने वाला आहार खरीदने का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
NFHS की रिपोर्ट बढ़ा रही चिंता
NFHS-6 (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे- 6) की ताजा रिपोर्ट पोषण आहार के नाम पर सालों से चले आ रहे मजाक पर सवाल खड़े करती है। प्रदेश में हर साल कुपोषित बच्चों के नाम पर करोड़ों रुपए का बजट जारी होता है। कई अभियान चलते हैं, लेकिन कुपोषण है कि खत्म ही नहीं होता।
सर्वे के अनुसार प्रदेश में लंबाई के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों की संख्या में बीते सालों के मुकाबले वृद्धि हुई है। साल 2019- 21 में ऐसे बच्चों की संख्या करीब 18.9 फीसदी थी जो अब 23.8 प्रतिशत पहुंच गई है। यानी पोषण की कमी से बच्चों में ऊंचाई के अनुपात में वजन घटा है।
आंकड़े उजागर कर रहे अभियान की हकीकत
सर्वे का एक और तथ्य चिंता बढ़ाने वाला है। प्रदेश में गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या 2019- 21 में 6.5 प्रतिशत थी। इसमें भी इजाफा हुआ है और अब यह संख्या बढ़कर 6.8 फीसदी यानी 4 लाख से ज्यादा है। वहीं उम्र के अनुपात में वजन कम रहने वाले बच्चों की संख्या भी बीते सालों के मुकाबले बढ़ी है।
साल 2019-21 में ऐसे बच्चों की संख्या 33 फीसदी थी जो अब 39.7 प्रतिशत के साथ करीब 24 लाख हो गई है। ये आंकड़े कुपोषण को मिटाने के लिए चल रहे कार्यक्रमों की स्थिति से पर्दा उठा रहे हैं। ये आंकड़े किसी संगठन की सर्वे रिपोर्ट के नहीं बल्कि केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के हैं।
12 रुपए में चाय-समोसा खरीदना भी मुश्किल
सरकार 12 रुपए में पोषण आहार देकर बच्चों को कुपोषण की गिरफ्त से बाहर लाने का दावा कर रही है। लेकिन इतनी कम राशि में ऐसा कर पाना नामुमकिन है। जब बाजार में चाय-समोसा भी 12 रुपए में नहीं मिलता तो पोषण आहार कैसे बच्चों तक पहुंच पा रहा है। पोषण आहार के नाम पर 12 रुपए से बच्चों को पौष्टिक आहार देना मुश्किल है।
दावों से उलट है हकीकत
बच्चों को प्रतिदिन एक पाव दूध, 100 ग्राम दाल और कुछ फल- सब्जी सहित प्रोटीन, विटामिन, खनिज जैसे दूसरे पौष्टिक आहार देने का दावा किया जा रहा है। जबकि एक पाव दूध की कीमत ही 12 से 15 रुपए है। मूंग, तुअर, मसूर, उड़द की दाल की प्रतिकिलो कीमत 120 से 180 रुपए है। इस लिहाज से 100 ग्राम दाल ही 10 से 18 रुपए में आएगी।
वहीं कोई भी फल या सब्जी भी इस बजट में खरीद पाना मुश्किल है। फिर दूसरे पौष्टिक अवयव उपलब्ध कराना संभव ही नहीं है। बाजार में बिस्किट के छोटे पैकेट की कीमत 5 रुपए से कम नहीं है। वहीं 100 ग्राम चावल, दलिया भी इससे कम कीमत में खरीदा नहीं जा सकता है। इसके अलावा एक अंडे की कीमत भी 7 से 8 रुपए है। बारह रुपए के बजट में ये सब बच्चों के पूरक पोषण आहार में शामिल करना कहीं से संभव नहीं लगता है।
असल लागत कहीं ज्यादा
पोषण आहार के मैन्यू की बात करें तो प्रतिदिन होने वाला खर्च सरकार के बजट से सात या आठ गुना या उससे ऊपर जा सकता है। यही वजह है कि आंगनबाड़ी केंद्रों से वितरित होने वाले पूरक पोषण आहार को लेकर शिकायतें आती हैं।
केंद्रों का संचालन करने वाले सरकारी फरमान के चलते कभी संख्या बढ़ाकर खर्च निकालते हैं तो कभी दूसरी जुगत लगाते हैं। पूरक पोषण आहार के नाम पर जो राशि मिल रही है उससे या तो केवल दूध, या अंड़ा, फल या दाल- दलिया- चावल या फिर अंकुरित अनाज जैसी कोई एक या दो सामग्री ही दी जा सकती है।
कहां जा रहे 3 हजार 768 करोड़
बजट तो अच्छा-खासा है, लेकिन उसे बांटने का तरीका कमजोर दिख रहा है।
मध्यप्रदेश में 60 लाख से ज्यादा कुपोषित (एमपी में कुपोषण) बच्चे हैं और उन पर करीब 3,768 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। अगर हिसाब लगाया जाए तो औसतन पैसा मौजूद है, लेकिन हकीकत में हर बच्चे के हिस्से सिर्फ करीब 12 रुपए प्रतिदिन आते हैं। इतने पैसों में सही पोषण देना मुश्किल ही नहीं, लगभग नामुमकिन है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई जगह सिर्फ आंकड़े बढ़ाकर या एक-दो चीजें देकर काम पूरा दिखा दिया जाता है। न ठीक से निगरानी होती है, न ही क्वालिटी की जांच।
उन्होंने आगे कहा कि जब तक प्रति बच्चे का रोज का खर्च 12 रुपए से बढ़ाकर 80-100 रुपए नहीं किया जाएगा, तब तक कुपोषण की समस्या का हल निकलना मुश्किल है।
FAQ
- MP में हर कुपोषित बच्चे पर रोज कितना खर्च होता है?
आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए पूरक पोषण आहार के लिए हर बच्चे को रोज सिर्फ 12 रुपए मिलते हैं। 3768 करोड़ का बजट होने के बावजूद पर डे कॉस्ट यही है। - NFHS-6 में MP के कुपोषण के क्या आंकड़े हैं?
वेस्टिंग 18.9% से बढ़कर 23.8%, गंभीर कुपोषण 6.5% से 6.8% यानी 4 लाख बच्चे, अंडरवेट 33% से 39.7% यानी 24 लाख बच्चे। - 12 रुपए में पोषण संभव क्यों नहीं?
एक पाव दूध 12-15 रुपए, 100 ग्राम दाल 10-18 रुपए, अंडा 7-8 रुपए, फल-सब्जी अलग। 12 रुपए में ये सब देना कठिन है।
ये खबरें भी पढ़ें...
बीमारू श्रेणी से बाहर एमपी, कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती, 4 विभाग मिलकर लड़ेंगे
समीक्षा बैठक में CM मोहन यादव बोले- नक्सलवाद की तरह खत्म करें कुपोषण
शिशु मृत्यू दर में एमपी नंबर दो पर, हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार, SRS रिपोर्ट में खुलासा
एमपी में सस्ते बजट में पोषण का दावा, कुपोषण से जंग में सरकारी सिस्टम फेल?