सरकारी मंदिरों में पुजारी भर्ती पर आरक्षण विवाद, सरकार को जवाब देने आखिरी मौका

Aman Vaishnav | Jul 31, 2026, 13:59 IST
एमपी पुजारी भर्ती आरक्षण विवाद
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों की भर्ती में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग को अवसर नहीं मिलने का मामला फिर उठा। एक साल से अधिक समय बाद भी सरकार जवाब पेश नहीं कर सकी।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मामला सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों की भर्ती से जुड़ा है।
  • याचिका में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग की अनदेखी का आरोप है।
  • चुनौती वर्ष 2019 की पुजारी नियुक्ति नीति को दी गई है।
  • जून 2025 से सरकार अब तक अपना जवाब दाखिल नहीं कर सकी।
  • हाई कोर्ट ने अब सरकार को जवाब देने का आखिरी मौका दिया है।

पुजारी भर्ती पर फिर पहुंचा मामला हाई कोर्ट

मध्य प्रदेश के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों की भर्ती एक बार फिर चर्चा में है। इस भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण नहीं मिलने के आरोप पर हाई कोर्ट में चल रही जनहित याचिका की सुनवाई हुई।



करीब एक साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी सरकार अपना जवाब पेश नहीं कर सकी। अब कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगली सुनवाई तक हर हाल में जवाब दाखिल किया जाए। इसके साथ ही सरकार को अंतिम अवसर दे दिया गया है।



क्या है याचिका का पूरा विवाद

यह जनहित याचिका अजाक्स भोपाल के सचिव एम.सी. अहिरवार ने दायर की है। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर और अधिवक्ता अभिलाषा लोधी पक्ष रख रहे हैं।



याचिका में कहा गया है कि सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारी नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था समान अवसर के सिद्धांत पर खरी नहीं उतरती। इससे एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के लोगों को अवसर नहीं मिल पा रहा है।



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2019 की नीति पर उठे सवाल

याचिका का केंद्र वर्ष 2019 की पुजारी नियुक्ति नीति है। धार्मिक न्यास व धर्मस्व विभाग ने 4 फरवरी 2019 को यह नीति जारी की थी।



इसी नीति के आधार पर सरकारी मंदिरों में पुजारियों की नियुक्तियां होती हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस व्यवस्था का लाभ केवल एक वर्ग तक सीमित रह गया है। दूसरे वर्गों के योग्य लोगों को अवसर नहीं मिल रहे हैं।



केवल ब्राह्मणों को मौका देने का आरोप

वहीं याचिका में आरोप लगाया गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया में केवल ब्राह्मण समुदाय को प्राथमिकता दी जाती है। इससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए रास्ते बंद हो जाते हैं।



याचिकाकर्ता का कहना है कि जाति के आधार पर अवसर सीमित करना संविधान की भावना के खिलाफ है। इसी कारण हाई कोर्ट से पूरी व्यवस्था की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है।





एक साल बाद भी सरकार का जवाब नहीं

इस मामले की पहली सुनवाई 13 जून 2025 को हुई थी। उस समय राज्य सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा था।



इसके बाद दिसंबर 2025 में फिर सुनवाई हुई। उस दिन भी मामला आगे नहीं बढ़ सका। 30 जुलाई 2026 को फिर सुनवाई हुई।



इस बार भी सरकार की ओर से जवाब पेश नहीं किया गया। लगातार देरी को देखते हुए कोर्ट ने अंतिम अवसर देने का फैसला लिया।



कोर्ट ने क्यों दिया आखिरी मौका

सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पाया कि सरकार अब तक अपना पक्ष रिकॉर्ड पर नहीं ला सकी है। ऐसे में कोर्ट ने साफ किया कि अब और देरी नहीं होगी।



सरकार को अंतिम मौका दिया गया है। अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल करना होगा। इसके बाद अदालत उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कार्रवाई कर सकती है।



किन जजों की बेंच कर रही सुनवाई

इस जनहित याचिका पर एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच सुनवाई कर रही है।



शुरुआती सुनवाई में अदालत ने राज्य सरकार सहित सभी संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था। अब भी वही निर्देश प्रभावी हैं। अदालत का जोर यह जानने पर है कि मौजूदा नीति में सभी वर्गों को समान अवसर कैसे दिए जा रहे हैं।



अब आगे क्या होगा

सरकार के जवाब के बाद अदालत दोनों पक्षों की दलीलों पर विस्तार से सुनवाई करेगी। इसके बाद यह तय होगा कि वर्ष 2019 की नीति संविधान के अनुरूप है या उसमें बदलाव की जरूरत है।



यह मामला केवल पुजारी भर्ती तक सीमित नहीं है। इसका असर भविष्य की नियुक्तियों और सरकारी मंदिरों की भर्ती प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।



यह मामला क्यों माना जा रहा है अहम

यह विवाद धार्मिक परंपरा और समान अवसर के बीच संतुलन से जुड़ा माना जा रहा है। अदालत के सामने यह सवाल भी रहेगा कि सरकारी नियंत्रण वाले संस्थानों में नियुक्ति के नियम संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं। इसलिए इस मामले के फैसले पर कई सामाजिक और कानूनी पक्षों की नजर बनी हुई है।



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