MP के संग्रहालयों में छिपा है गजानन के अनदेखे रूपों का सच, रहस्य जानकर रह जाएंगे दंग

Kaushiki | Sept 22, 2026, 12:00 IST
MP Rare Ganesha Idols
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मध्य प्रदेश के संग्रहालयों में भगवान गणेश की 5 अत्यंत दुर्लभ मूर्तियां रखी हैं। 7वीं से 13वीं सदी के बीच बनी ये प्रतिमाएं गजानन के नर्तक, बाल और नारी रूप विनायकी को दर्शाती हैं। ये मूर्तियां भारत की प्राचीन शिल्प कला का अद्भुत नमूना हैं।

Ancient Ganesha Statues: मध्य प्रदेश की धरती अपने अंदर कई रहस्य छिपाए बैठी है। यहां के संग्रहालयों में प्राचीन कला का एक बड़ा खजाना मौजूद है। पत्थरों पर उकेरी गई ये मूर्तियां आज भी सच बोलती हैं। मान्यता है कि ये मूर्तियां 7वीं से 13वीं शताब्दी के बीच तराशी गई थीं। इनमें हमारे प्राचीन शिल्पकारों की कला का जादू साफ झलकता है।



अलग-अलग राजवंशों के दौरान इन्हें बहुत खूबसूरती से बनाया गया। इनमें गजानन का हर रूप आपको पूरी तरह हैरान कर देगा। कहीं वे शांत हैं, तो कहीं वे नाचते नजर आते हैं। कहीं वे एक छोटे बच्चे की तरह बहुत प्यारे लगते हैं।



सबसे बड़ा आश्चर्य उनकी एक स्त्री रूप की मूर्ति देखकर होता है। लोग इस दुर्लभ रूप को देखकर अपनी आंखें खुली रखते हैं। इन पांच मूर्तियों की कहानी बेहद दिलचस्प और अद्भुत है।



आइए, मध्य प्रदेश में पत्थरों में छुपे इन रहस्यों के ऐतिहासिक सफर को करीब से समझते हैं। जानते हैं कि कैसे सदियों पुरानी यह कला आज भी जीवित लगती है।



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7वीं सदी की मंदसौर मूर्ति

इस श्रृंखला की सबसे पहली मूर्ति 7वीं सदी की है।



यह प्रतिमा मंदसौर के यशोवर्मन पुरातात्विक संग्रहालय में रखी है। इस मूर्ति में गणेश जी खड़े हुए रूप में दिखाई देते हैं। उनका सिर काफी भारी और कान बहुत बड़े बनाए गए हैं। उनकी सूंड़ दाईं तरफ मुड़कर ऊपर की ओर जाती है।



इस प्रतिमा में गजानन के केवल दो हाथ दिखाए गए हैं। उनके भारी शरीर पर बहुत हल्के आभूषण सजाए गए हैं। यह मूर्ति उस दौर की सरल कला को दर्शाती है। तब गणेश जी को बहुत ही गंभीर रूप में गढ़ा जाता था।



शिल्पकार ने इस मूर्ति में बहुत ही सादगी दिखाई है। इस रूप को देखकर मन को गहरी शांति मिलती है। यह मूर्ति शुरुआती भारतीय शिल्प कला का बेहतरीन उदाहरण है।



इसमें कोई फालतू सजावट या बनावट देखने को नहीं मिलती। यह प्रतिमा अपने समय की सादगी को बयां करती है। इसे देखकर आप प्राचीन काल की सोच समझ सकते हैं।



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10वीं सदी के नर्तक गणेश

दूसरी मूर्ति 10वीं सदी की है और हिंगलाजगढ़ में मिली थी।



यह प्रतिमा अब सेंट्रल म्यूजियम इंदौर में रखी गई है। इस मूर्ति में गणेश जी को नाचते हुए दिखाया गया है। इस अद्भुत प्रतिमा में गजानन के आठ हाथ बनाए गए हैं। उनके चारों तरफ गंधर्व उनका अभिषेक करते नजर आते हैं।



पास में संगीतकार वीणा और झांझ बजाते हुए दिख रहे हैं। नीचे एक कलाकार पखावज नाम का वाद्ययंत्र बजा रहा है। उसके ठीक पास गणेश जी का चूहा भी बैठा है। गणेश जी के शरीर पर एक सांप लिपटा हुआ है।



यह नृत्य की मुद्रा मूर्ति को बहुत जीवंत बना देती है। इस प्रतिमा को देखकर लगता है जैसे पत्थर बोल रहा हो। शिल्पकार ने इसमें संगीत और कला का संगम दिखाया है।



यह मूर्ति भारतीय नृत्य परंपरा का सुंदर प्रमाण पेश करती है। इसमें गतिशीलता और आनंद की भावना साफ नजर आती है। इस कलाकृति को देखना अपने आप में एक अनोखा अनुभव है।



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11वीं सदी के युवा गजानन

तीसरी मूर्ति 11वीं सदी की है और जबलपुर से मिली थी।



इसे कलचुरी राजवंश के शिल्पकारों ने मिलकर बनाया था। यह प्रतिमा फिलहाल राज्य संग्रहालय भोपाल में रखी हुई है। इस बैठी हुई मूर्ति में गणेश जी के आठ हाथ हैं। उनके हाथों में अंकुश, सांप, टूटा दांत और मोदक हैं।



वे सुंदर आभूषणों और अपने परिचारकों से घिरे हुए हैं। साथ में कई संगीतकार भी उनके आसपास नजर आते हैं। गणेश जी का चेहरा बहुत युवा और तेज से भरा है। उनकी चौड़ी छाती उनके शक्तिशाली रूप को दर्शाती है।



यह मूर्ति गजानन के प्रभुत्व और शक्ति का प्रतीक है। शिल्पकारों ने इसमें मानवीय जीवंतता को बहुत अच्छे से उकेरा है। इस प्रतिमा की बनावट देखकर दर्शक दंग रह जाते हैं।



यह कलचुरी कालीन कला की बारीकियों को उजागर करती है। हर एक हाथ में रखी चीज का अपना विशेष महत्व है। यह मूर्ति शक्ति और भक्ति का सुंदर उदाहरण पेश करती है।



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12वीं सदी के प्यारे बाल गणेश

चौथी मूर्ति 12वीं से 13वीं सदी के काल की है।



इसे मुरैना के सुहानी इलाके में तराशा गया था। यह प्रतिमा लाल बलुआ पत्थर से बहुत प्यार से बनी है। यह सुंदर मूर्ति ग्वालियर के गुजरी महल संग्रहालय में है।



इस प्रतिमा में बाल गणेश के केवल चार हाथ हैं। उनके घुंघराले बाल और गोल-मटोल शरीर बहुत प्यारा लगता है। वे पीछे मुड़कर देखते हुए बेहद नटखट नजर आते हैं।



वे अपने हाथ में मोदक को बहुत कसकर पकड़े हैं। उनका यह रूप किसी छोटे बच्चे की तरह लगता है। यह मूर्ति भगवान के स्नेही और बाल रूप को दिखाती है। हर कोई इस मूर्ति को देखकर मुस्कुराने लगता है।



कछपाघात काल के शिल्पकारों की यह एक महान रचना है। इसमें वात्सल्य भाव की सुंदर झलक देखने को मिलती है। यह प्रतिमा बच्चों जैसी मासूमियत से भरी हुई है। इसे देखना एक बहुत ही सुखद अनुभव प्रदान करता है।



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11वीं सदी की विनायकी मूर्ति

पांचवीं मूर्ति सबसे अनोखी और पूरी दुनिया में दुर्लभ है।



यह उज्जैन के त्रिवेणी संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है। यह 11वीं सदी की मूर्ति गणेश जी का स्त्री रूप है। इस स्त्री आकृति को शास्त्रों में विनायकी कहा गया है।



इस मूर्ति में हाथी के सिर वाली देवी दिखाई गई है। उनका शरीर बहुत ही सुंदर और शालीन बनाया गया है। वे अभंग मुद्रा में बहुत ही गरिमा के साथ खड़ी हैं। उनके चार हाथों में परशु, कमल, टूटा दांत और मोदक है।



दोनों तरफ संगीतकार मृदंग और बांसुरी बजा रहे हैं। वे संगीतकार देवी विनायकी का यशगान कर रहे हैं। यह रूप नारी शक्ति और गजानन का अनोखा संगम है। ऐसी मूर्तियां पूरे भारत में बहुत कम देखने को मिलती हैं।



यह प्रतिमा प्राचीन समाज में नारी के सम्मान को दर्शाती है। शिल्प कला का यह रूप वाकई में बहुत हैरान करता है। इस मूर्ति के दर्शन करना बहुत ही सौभाग्य की बात है।



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एमपी में मूर्तियों का महत्व

मध्य प्रदेश हमेशा से कला और संस्कृति का केंद्र रहा है। यहां के राजवंशों ने कला को हमेशा बढ़ावा दिया है। परमार, कलचुरी और कछपाघात राजाओं ने इन्हें बनवाया था। इन मूर्तियों से उस दौर के धार्मिक विचारों का पता चलता है।



पत्थरों पर उकेरी गई ये आकृतियां हमारी धरोहर हैं। ये मूर्तियां बताती हैं कि प्राचीन भारत कितना उन्नत था। शिल्पकारों के पास कल्पना करने की बहुत बड़ी आजादी थी। उन्होंने भगवान को केवल एक रूप में सीमित नहीं रखा।



उन्होंने गणेश जी को नर्तक और बालक के रूप में देखा। उन्होंने गजानन को नारी रूप विनायकी में भी पूजा। यह हमारे विचारों की व्यापकता को साफ तौर पर दिखाता है।



आज ये मूर्तियां हमारे इतिहास की साक्षी बनी खड़ी हैं। इन्हें देखना बीते युग की यात्रा करने जैसा लगता है। मध्य प्रदेश के संग्रहालयों में यह अनमोल खजाना सुरक्षित है। हमें अपनी इस समृद्ध विरासत पर बहुत गर्व होना चाहिए।



कैसे करें इन मूर्तियों के दर्शन

यदि आप इन मूर्तियों को देखना चाहते हैं तो आपको भोपाल के राज्य संग्रहालय, जबलपुर आना होगा। ग्वालियर के गुजरी महल में बाल गणेश के दर्शन करें। इंदौर के सेंट्रल म्यूजियम में नर्तक गणेश मौजूद हैं। उज्जैन के त्रिवेणी संग्रहालय में विनायकी की मूर्ति है।



मंदसौर के संग्रहालय में 7वीं सदी की प्रतिमा रखी है। इन सभी संग्रहालयों में जाना बेहद आसान और सुविधाजनक है। आप ट्रेन या बस से इन शहरों तक पहुंच सकते हैं। इतिहास और कला के प्रेमियों के लिए यह बेहतरीन जगह है। यहां आकर आप भारत की प्राचीन कला को समझ सकते हैं।



अपने बच्चों को भी इस समृद्ध इतिहास के बारे में बताएं। यह यात्रा आपके लिए ज्ञानवर्धक और यादगार साबित होगी। इन संग्रहालयों में आपको कई अन्य प्राचीन चीजें भी दिखेंगी। हर मूर्ति के पास उसकी जानकारी का बोर्ड भी लगा है। आप वहां जाकर इतिहास के सुंदर पन्नों को पढ़ सकते हैं।



प्राचीन भारतीय शिल्प कला

भारतीय मूर्तिकला का इतिहास बहुत समृद्ध है। प्राचीन शिल्पकारों ने बिना आधुनिक औजारों के पत्थरों पर अद्भुत नक्काशी की। गणेश जी की ये दुर्लभ मूर्तियां उनके असाधारण कौशल का सबसे बड़ा प्रमाण हैं।



गजानन का हर रूप समाज को एक गहरा संदेश देता है। नर्तक गणेश आनंद, बाल रूप निश्चल प्रेम, शक्तिशाली रूप सुरक्षा और विनायकी रूप नारी शक्ति के सम्मान को दर्शाता है।



यह कला हमारे पूर्वजों की महानता और भारतीय धर्म-दर्शन की सुंदरता को बयां करती है, जो आज भी दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करती है।



डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। प्राचीन मूर्तियां



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