MP के 9 मेडिकल कॉलेजों को निजी हाथों में देने के फैसले पर सरकार का यू-टर्न, खुद ही करेगी संचालन
समझें क्या है पूरा मामला...
- सरकार अब 9 मेडिकल कॉलेजों का संचालन खुद ही करेगी।
- जिन कॉलेजों की बिल्डिंग तैयार है, वे पीपीपी मोड से बाहर रहेंगे।
- बुधनी, छतरपुर, उज्जैन और दमोह की बिल्डिंग बनकर तैयार हो चुकी है।
- मंदसौर और राजगढ़ की बिल्डिंग अभी निर्माणाधीन है।
- नीमच, श्योपुर और सिंगरौली के कॉलेज पहले से ही चल रहे हैं।
किन कॉलेजों को मिली राहत
मध्य प्रदेश के नौ सरकारी मेडिकल कॉलेजों का संचालन अब सरकार खुद करेगी। उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने यह जानकारी दी है। तैयार या निर्माणाधीन बिल्डिंग वाले कॉलेज पीपीपी मॉडल से बाहर रहेंगे। यानी इन कॉलेजों को निजी हाथों में नहीं सौंपा जाएगा। इससे पहले इन्हीं कॉलेजों को लेकर निजीकरण की चर्चा तेज थी।
बुधनी, छतरपुर, उज्जैन और दमोह के मेडिकल कॉलेजों की बिल्डिंग तैयार हो चुकी है। वहीं मंदसौर और राजगढ़ की बिल्डिंग अभी निर्माणाधीन है। इन छह कॉलेजों का संचालन सरकार खुद करेगी। नीमच, श्योपुर, सिंगरौली के कॉलेज केंद्र की योजना से पहले चल रहे हैं। इस तरह कुल नौ कॉलेज पीपीपी मोड से बाहर रहेंगे।
पहले क्या मुद्दा उठा था
इससे पहले खबर आई थी कि मध्यप्रदेश सरकार नौ कॉलेज निजी हाथों को सौंपेगी। इस सूची में कई बड़े नेताओं के इलाके भी शामिल बताए गए थे। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का पुराना विधानसभा क्षेत्र बुधनी इसमें था। सांसद वीडी शर्मा का संसदीय क्षेत्र छतरपुर भी इस सूची में था। मंत्री प्रहलाद पटेल का विधानसभा क्षेत्र दमोह भी इसमें शामिल बताया गया था। इसी वजह से यह मामला काफी चर्चा में रहा।
बोलीदाता क्यों नहीं आए
प्रदेश के 9 मेडिकल कॉलेज-कम-हॉस्पिटल और 18 स्वास्थ्य केंद्रों को पीपीपी पर चलाना है। इसके लिए लेनदेन सलाहकार यानी ट्रांजेक्शन एडवाइजर का टेंडर जारी हुआ था। वहीं, इस टेंडर में एक भी बोलीदाता सामने नहीं आया। इसी वजह से संबंधित कॉरपोरेशन ने गुरुवार को यह टेंडर निरस्त कर दिया। अब इसे दोबारा जारी करने की तैयारी है।
4000 करोड़ का पूरा गणित
इन 9 कॉलेजों पर अब तक करीब 4000 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। हर कॉलेज के भवन पर औसतन 325 करोड़ रुपए की लागत आई है। इस खर्च में केंद्र सरकार का हिस्सा 60 प्रतिशत रहा है। बाकी 40 प्रतिशत राशि राज्य सरकार ने खर्च की है।
पहले से चल रहे कॉलेजों में मशीनें और फर्नीचर पर भी खर्च हुआ है। इन सुविधाओं पर करीब 500 करोड़ रुपए का अतिरिक्त निवेश हुआ है। इतनी बड़ी रकम की वजह से यह मामला और अहम हो जाता है।
2021 का उज्जैन विवाद
साल 2021 में उज्जैन कॉलेज को पीपीपी मोड पर देने की बात उठी थी। उस समय इस फैसले का जोरदार विरोध हुआ था। विरोध के बाद सरकार ने कॉलेज को अपने नियंत्रण में ही रखा। अब एक बार फिर उज्जैन कॉलेज को पीपीपी सूची से बाहर रखा गया है। इससे पुराने विवाद की यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं।
18 सीएचसी भी सूची में
इस पूरी योजना में 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र यानी सीएचसी भी शामिल हैं। इनमें से आठ सीएचसी रीवा जिले के हैं। चार सीएचसी दमोह जिले से लिए गए हैं। बाकी छह सीएचसी दूसरे जिलों से शामिल किए गए हैं। सभी 18 सीएचसी को एक ही परियोजना के तहत रखा गया है। यह टेंडर सीधे अस्पताल चलाने के लिए नहीं है। यह टेंडर सिर्फ सलाहकार चुनने के लिए जारी किया गया था।
सलाहकार को 75 दिन का समय
नियुक्त होने वाले सलाहकार को कुल 75 दिन का समय दिया जाएगा। पहले 15 दिन में उसे शुरुआती रिपोर्ट देनी होगी। इसके अगले 45 दिन में व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करनी होगी। पूरे 75 दिन के भीतर बोली के दस्तावेज तैयार करने होंगे। यही समय सीमा सभी 18 केंद्रों पर लागू होगी। सलाहकार ही तय करेगा कि कॉलेज कैसे चलेंगे और कितना निवेश जरूरी होगा।
नए कॉलेज वीजीएफ से जुड़ेंगे
जिन प्रस्तावित कॉलेजों की बिल्डिंग अभी नहीं बनी, उनके लिए अलग रास्ता होगा। इनका निर्माण भी अभी शुरू नहीं हुआ है। ऐसे कॉलेजों के लिए सरकार नीति आयोग के तैयार टेंडर दस्तावेज लागू करेगी। जरूरत पड़ने पर वीजीएफ (Viability Gap Funding) से मदद दी जाएगी। इससे कम फायदे वाली परियोजनाएं भी व्यवहारिक बनाई जा सकेंगी। यह फंडिंग सरकार की तरफ से एक तरह की आर्थिक सहायता होती है।
मंत्री ने क्या कहा
उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने कहा कि पीपीपी मॉडल को मंजूरी मिल चुकी है। अब इस मॉडल में जरूरत के मुताबिक कुछ बदलाव किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि नीति आयोग के तैयार टेंडर दस्तावेज राज्य में लागू होंगे। उनके मुताबिक यह पूरा मॉडल वीजीएफ की गैप फंडिंग से भी जुड़ा हुआ है। मंत्री के इस बयान से साफ है कि प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है।
इस फैसले से उन छह जिलों को सबसे बड़ी राहत मिली है। इन जिलों में कॉलेज की बिल्डिंग तैयार या निर्माणाधीन है। सरकारी संचालन से मरीजों और छात्रों दोनों को फायदा मिलने की उम्मीद है। सरकारी अस्पतालों में इलाज सस्ता होने की संभावना ज्यादा रहती है। मेडिकल शिक्षा में भी फीस को लेकर छात्रों की चिंता कम हो सकती है। हालांकि नए प्रस्तावित कॉलेजों पर पीपीपी मॉडल का असर अब भी बना रहेगा।
आने वाले दिनों में ट्रांजेक्शन एडवाइजर की नियुक्ति दोबारा टेंडर से होगी। इसके बाद पीपीपी वाले कॉलेजों और सीएचसी का पूरा खाका तैयार होगा। सरकार की कोशिश है कि यह प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी हो जाए। इस फैसले पर जनता और स्वास्थ्य क्षेत्र दोनों की नजर बनी हुई है।
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