एमपी मनरेगा में खुलासा, 1 करोड़ मजदूरों में सिर्फ 2% को मिला 100 दिन का काम
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश में मनरेगा की 100 दिन रोजगार गारंटी पूरी नहीं हो सकी।
- 2019 से 2024 के बीच सिर्फ 2% पंजीकृत मजदूरों को 100 दिन काम मिला।
- 30% से 47% मजदूरों को चार दिन तक भी काम नहीं मिला।
- कई जिलों में फर्जी जॉब कार्ड से डेढ़ करोड़ रुपए का गलत भुगतान हुआ।
- मजदूरों को तय मजदूरी से 20% से 25% तक कम भी मिली।
मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की जमीनी हकीकत सामने आई है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ताजा रिपोर्ट ने योजना की कई खामियां उजागर की हैं। यह रिपोर्ट सीधे तौर पर ग्रामीण मजदूरों की रोजी-रोटी से जुड़ी है।
रिपोर्ट पांच साल के आंकड़ों पर आधारित है। इस दौरान राज्य में एक करोड़ से ज्यादा मजदूर पंजीकृत रहे, लेकिन इनमें से बेहद कम लोगों को कानून के मुताबिक पूरा रोजगार मिल सका। यह आंकड़ा योजना की मूल भावना पर सवाल खड़े करता है।
कैग रिपोर्ट के मुख्य आंकड़े
कैग (कैग की रिपोर्ट) ने पाया कि सिर्फ 2% पंजीकृत मजदूरों को ही 100 दिन का काम मिला। वहीं 30% से 47% मजदूर चार दिन के काम को भी तरस गए।
कैग ने इसे गारंटीशुदा रोजगार देने की मंशा में कमी बताया है। यह टिप्पणी योजना के क्रियान्वयन पर सीधा सवाल है।
वहीं 31 मार्च 2024 तक मजदूरी और सामग्री लागत मिलाकर 1217 करोड़ रुपए का भुगतान लंबित था। इसमें से करीब 55 करोड़ रुपए सिर्फ मजदूरी के बकाया थे। इतनी बड़ी राशि का अटकना मजदूरों के लिए सीधा आर्थिक नुकसान है।
फर्जी भुगतान का खुलासा
बैतूल, बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, मंडला, रायसेन, सागर, उमरिया और विदिशा में गड़बड़ी मिली। इन 8 जिलों में डुप्लीकेट और फर्जी जॉब कार्ड इस्तेमाल हुए। इसके जरिए करीब 1.5 करोड़ रुपए का गलत भुगतान किया गया। कई जॉब कार्ड में त्रुटियां भी पाई गईं।
इसके अलावा कई मजदूरों को तय दर से कम मजदूरी दी गई। यह कमी 20% से 25% तक रही। यानी मेहनत करने के बावजूद मजदूरों को पूरा हक नहीं मिला।
जमीनी हकीकत क्या निकली
कैग की टीम ने कई गांवों में जाकर जमीनी जांच भी की। इसमें कागजों और हकीकत में बड़ा फर्क सामने आया।
बैतूल: तालाब की जगह खेत
चिचोली जनपद की झिरियादेह ग्राम पंचायत में तालाब निर्माण दिखाया गया था। लेकिन मौके पर टीम को धान की खेती मिली। इस काम पर 4 लाख रुपए खर्च होना बताया गया था। यानी कागजों पर तालाब था, जमीन पर फसल।
बुरहानपुर: सूखा मिला तालाब
खकनार जनपद की संदसकला ग्राम पंचायत में भी ऐसा ही मामला मिला। यहां तालाब पर 13.79 लाख रुपए खर्च दिखाए गए। लेकिन मानसून के दौरान भी तालाब सूखा हुआ मिला। इससे काम की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
मजदूरों को नुकसान कैसे
इन गड़बड़ियों का सीधा असर गांव के गरीब मजदूरों पर पड़ा। समय पर और पूरा भुगतान न मिलने से उनकी आर्थिकी कमजोर हुई। जिन कामों के पैसे खर्च हुए, वो असल में जमीन पर नजर नहीं आए। इससे सरकारी खजाने को भी नुकसान हुआ।
रोजगार गारंटी योजना का मकसद ही यही है कि गांव के लोगों को स्थानीय स्तर पर काम मिले। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यह मकसद बड़े पैमाने पर अधूरा रह गया।
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