एमपी के प्रभारी मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड, प्रदर्शन में कौन पिछड़ा, कौन निकला सबसे आगे?
सत्ता की कुर्सी मिलते ही जनता के बीच जाने का वादा अक्सर हवा हो जाता है। मध्य प्रदेश की मोहन सरकार में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। जिन मंत्रियों को जिलों का जिम्मा सौंपा गया था, वे वहां मेहमान बनकर भी नहीं पहुंचे।
क्या है पूरा मामला?
अगस्त 2024 में जब मोहन सरकार के मंत्रियों को जिलों का प्रभार सौंपा गया तो एक वादा किया गया था। मंत्री इन जिलों का दौरा करेंगे रात रुकेंगे साथ ही वहां स्थानीय स्तर पर बैठकें करेंगे।
अब डेढ़ साल बाद इसकी रिपोर्ट सामने आई है। एक प्रतिष्ठित अखबार में छपी खबर के अनुसार, कई मंत्री न तो जिले में गए और न ही बैठकें कीं। कुछ मंत्रियों ने तो 18 महीनों में अपने प्रभार वाले जिलों में दस बार भी कदम नहीं रखा है।
पार्टी इसे गंभीरता से ले सकती है।
कैलाश विजयवर्गीय धार में रात तक नहीं रुके
रिपोर्ट के मुताबिक, डिप्टी सीएम और वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने जबलपुर जैसे बड़े जिले में सिर्फ दो रातें बिताईं। एक ही बैठक की। डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने शहडोल में भी सिर्फ दो रातें बिताईं और दो बैठकें कीं।
मंत्री कैलाश विजयवर्गीय धार में रात भर नहीं रुके और सतना में भी सिर्फ एक रात रहे। राकेश सिंह ने नर्मदापुरम में अब तक कोई बैठक नहीं की। प्रहलाद पटेल भिंड में सिर्फ दो रातें रहे।
गौतम टेटवाल सबसे आगे
मध्यप्रदेश के नेताओं के दौरे और बैठकों के स्कोर के आधार पर गौतम टेटवाल ने 75 स्कोर के साथ सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। इसमें उन्होंने 50 दौरे किए हैं। वहीं 21 बैठकें कीं और 4 रातें रुके हैं। इसके बाद लखन सिंह पटेल 56 स्कोर के साथ दूसरे स्थान पर हैं।
लखन सिंह ने 34 दौरे किए थे। इनमें 6 बैठकें और 16 रातें शामिल हैं। चैतन्य काश्यप 51 स्कोर के साथ तीसरे स्थान पर हैं। इन्होंने 37 दौरे किए थे। साथ ही 2 बैठकें की और 12 रातें रुके थे।
ये 10 प्रभारी मंत्री रहे सबसे ज्यादा एक्टिव
| मंत्री का नाम | दौरे | रात रुके | बैठक | स्कोर |
| गौतम टेटवाल | 50 | 21 | 4 | 75 |
| लखन सिंह पटेल | 34 | 6 | 16 | 56 |
| चैतन्य काश्यप | 37 | 2 | 12 | 51 |
| प्रद्युम्न सिंह तोमर | 35 | 9 | 5 | 49 |
| गोविंद सिंह राजपूत | 25 | 13 | 7 | 45 |
| तुलसीराम सिलावट | 20 | 10 | 11 | 41 |
| राजेंद्र शुक्ल | 30 | 5 | 5 | 40 |
| राधा सिंह | 14 | 13 | 11 | 38 |
| राकेश सिंह | 18 | 13 | 4 | 35 |
| दिलीप जायसवाल | 14 | 11 | 8 | 33 |
सबसे Inactiveमंत्री की लिस्ट में पहले नंबर पर विश्वास सारंग का नाम आता है। उन्होंने सिर्फ सात दौरे किए थे और इन दौरों के दौरान कुल एक ही बैठक की थी। इसके अलावा वे केवल तीन रात ही रुके।
दूसरे नंबर पर मंत्री प्रतिमा बागरी हैं, जिन्होंने पांच दौरे किए। इस दौरान उन्होंने दो बैठकें कीं और चार रात रुकीं।
तीसरे नंबर पर मंत्री दिलीप अहिरवार का नाम है, जिन्होंने आठ दौरे किए। लेकिन, इस दौरान उन्होंने सिर्फ एक ही बैठक की।
ये 10 प्रभारी मंत्री सबसे ज्यादा Inactive
| मंत्री का नाम | दौरे | रात रुके | बैठक | स्कोर |
| विश्वास सारंग | 7 | 3 | 1 | 11 |
| प्रतिमा बागरी | 5 | 4 | 2 | 11 |
| दिलीप अहिरवार | 8 | 4 | 1 | 13 |
| इंदर सिंह परमार | 5 | 6 | 4 | 15 |
| नरेंद्र शिवाजी पटेल | 9 | 4 | 3 | 16 |
| धर्मेंद्र सिंह लोधी | 7 | 5 | 5 | 17 |
| विजय शाह | 11 | 4 | 3 | 18 |
| एदल सिंह कंसाना | 11 | 5 | 2 | 18 |
| नागर सिंह चौहान | 11 | 3 | 4 | 18 |
| कृष्णा गौर | 13 | 1 | 4 | 18 |
किस मंत्री के पास है कौनसे जिले का प्रभार?
बैठकें करने और रुकने से ये चार बड़े फायदे होते हैं
- कलेक्टर, एसपी, तहसीलदार वगैरह विधायकों और कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनते, तो प्रभारी मंत्री के जरिए ये बातें सीएम तक पहुंच जाती हैं और दबाव बनता है।
- रात रुकने से कार्यकर्ताओं और विधायकों से मुलाकात होती है। अनौपचारिक बातों का आदान-प्रदान होता है। इससे तीन चौथाई कार्यकर्ता संतुष्ट हो जाते हैं।
- जिले के काम प्रभारी मंत्री के जरिए हल हो जाते हैं। वहीं भोपाल के काम भी वहीं करवा देता है।
- पार्टी के कार्यकर्ताओं और अधिकारियों में एक दूसरे के साथ काम करने का भरोसा बढ़ता है।
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