एमपी में आज भी बोझ हैं बेटियां! बच्चों को त्यागने और भ्रूण हत्या के मामले में मध्यप्रदेश नंबर एक पर
देश में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे बड़े-बड़े नारे दिए जा रहे हैं। सरकारें दावा करती हैं कि समाज बदल रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की साल 2024 की ताजा रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश की एक डरावनी तस्वीर पेश की है।
इस रिपोर्ट से पता चलता है कि एमपी में आज भी कई घरों में बेटियों को बोझ समझा जाता है। लिंग आधारित भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बच्चों की हत्या से लेकर उन्हें लावारिस नवजातछोड़ने के मामलों में प्रदेश की स्थिति बेहद खराब है।
बच्चों की हत्या में एमपी देश में दूसरे नंबर पर
NCRB की रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 में मध्य प्रदेश में बच्चों की हत्या के कुल 125 मामले दर्ज किए गए थे। पूरे देश की बात करें तो उत्तर प्रदेश (205 मामले) के बाद मध्य प्रदेश इस मामले में दूसरे स्थान पर है।
सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि इन 125 बच्चों में से 81 लड़कियां थीं। इनमें से 16 बच्चियों की हत्या तो उनके साथ दुष्कर्म जैसी घिनौनी वारदात को अंजाम देने के बाद की गई थी। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि समाज में मासूम बेटियों के प्रति कितनी नफरत और असुरक्षा भरी हुई है।
बच्चों को लावारिस छोड़ने में एमपी का रिकॉर्ड
हैरानी की बात यह है कि बच्चों को लावारिस छोड़ देने या उन्हें त्यागने के मामले में प्रदेश पिछले 6 सालों से लगातार देश में नंबर वन बना हुआ है।
- वर्ष 2024 के आंकड़े: प्रदेश में 146 ऐसे मामले सामने आए थे जहां बच्चों को त्याग दिया गया था।
- हालात: नवजात बच्चियों को झाड़ियों, कचरे के ढेर, अस्पतालों, सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर मरने के लिए छोड़ दिया गया था।
- वजह: कई मामलों में जन्म के तुरंत बाद ही बच्चों को लावारिस हालत में फेंक दिया गया था। ये समाज की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
भ्रूण हत्या के मामले घटे पर अब भी सबसे ज्यादा
मध्य प्रदेश में भ्रूण हत्या के मामलों में पहले के मुकाबले कमी आई है। इसके बावजूद एमपी इस मामले में पूरे देश में नंबर एक पर है।
| साल | भ्रूण हत्या के मामले |
| 2023 | 56 मामले |
| 2024 | 27 मामले |
बेटियों के प्रति नफरत की असली वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक अपराध नहीं है। बल्कि यह हमारे समाज की बीमार मानसिकता का नतीजा है। शहरों से लेकर गांवों तक बेटियों के प्रति नकारात्मक नजरिया आज भी बना हुआ है। इसके पीछे कुछ मुख्य कारण हैं:
बेटे की चाह : वंश चलाने के नाम पर आज भी कई परिवारों में केवल बेटे की डिमांड की जाती है।
दहेज की चिंता : बेटियों की शादी और उनमें होने वाले खर्च के डर से उन्हें बोझ समझा जाता है।
आर्थिक दबाव : गरीब परिवारों में बेटियों के पालन-पोषण और शिक्षा को एक अतिरिक्त भार माना जाता है।
पितृसत्तात्मक सोच: समाज में पुरुषों को महिलाओं से ऊपर रखने की पुरानी और गलत सोच।
केवल कानून काफी नहीं है
सरकार ने भ्रूण परीक्षण पर रोक लगाई है। साथ ही सख्त कानून भी बनाए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ कानून से बात नहीं बनेगी। जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी, तब तक ये आंकड़े कम नहीं होंगे।
FAQ
- मध्य प्रदेश में बच्चों की हत्या के कितने मामले सामने आए हैं?
NCRB 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में बच्चों की हत्या के 125 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 81 लड़कियां थीं। यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश के बाद देश में सबसे ज्यादा है। - क्या एमपी में भ्रूण हत्या के मामलों में कोई सुधार हुआ है?
हां, साल 2023 के मुकाबले 2024 में भ्रूण हत्या के मामलों में कमी आई है। 2023 में जहाँ 56 मामले थे, वहीं 2024 में यह घटकर 27 रह गए हैं। हालांकि, कमी के बावजूद एमपी इस मामले में देश में पहले नंबर पर बना हुआ है। - बच्चों को त्यागने के मामले में मध्य प्रदेश की क्या स्थिति है?
मध्य प्रदेश पिछले 6 सालों से लगातार बच्चों को त्यागने (Abandoning) के मामले में देश में पहले स्थान पर है। साल 2024 में ऐसे 146 मामले सामने आए हैं, जिनमें नवजात बच्चों को सड़कों या झाड़ियों में लावारिस छोड़ दिया गया।
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