ओबीसी 27% आरक्षण केस में ओबीसी वर्ग ने खड़े किया सरकार पर सवाल, कल फिर सुनवाई
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।
- सुनवाई में 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा और उसके कानूनी असर पर बहस चल रही है।
- कोर्ट के सामने ओबीसी की पहचान, आबादी और आरक्षण के आधार पर सवाल उठे हैं।
- ईडब्ल्यूएस आरक्षण और उसके लागू होने के तरीके पर भी बहस तेज हो गई है।
- मामले की सुनवाई विशेष खंडपीठ कर रही है। अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई सोमवार को फिर हुई। सुनवाई जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष खंडपीठ ने की। दोपहर 2:30 बजे शुरू हुई बहस कई अहम मुद्दों पर केंद्रित रही। ओबीसी पक्ष की दलीलें पूरी नहीं हो सकीं। अब बहस 4 अगस्त को फिर जारी रहेगी।
ओबीसी पक्ष ने सरकार की दलीलों पर उठाए सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने सुनवाई के बाद बताया कि सोमवार को ओबीसी पक्ष ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि बहस अभी जारी है। कोर्ट ने संकेत दिया है कि संभव हो तो अगली सुनवाई में यह चरण पूरा कराया जाएगा।
उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने ओबीसी की पहचान तय करने का स्पष्ट तरीका नहीं बताया। आरक्षण का प्रतिशत किन आधारों पर तय हुआ, इसका भी संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।
महाजन आयोग की रिपोर्ट का दिया गया हवाला
ओबीसी पक्ष ने कोर्ट के सामने महाजन आयोग की रिपोर्ट का उल्लेख किया। अधिवक्ता ने कहा कि वर्ष 2019 में सरकार ने यह रिपोर्ट कोर्ट में पेश की थी।
उनके अनुसार रिपोर्ट के अध्याय 4 और अध्याय 5 में विस्तार से बताया गया है कि मध्य प्रदेश की 92 ओबीसी जातियों की पहचान किन मानकों पर की गई। इसी रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट को ओबीसी पहचान की प्रक्रिया समझाई गई।
क्वांटिफायबल डेटा पर कल होगी विस्तार से बहस
सुनवाई के दौरान क्वांटिफायबल डेटा का मुद्दा भी उठा। ओबीसी पक्ष का कहना है कि इस मामले में ऐसे डेटा की जरूरत क्यों नहीं है, यह अगली सुनवाई में विस्तार से बताया जाएगा।अधिवक्ता ने कहा कि इस विषय पर कानूनी और संवैधानिक पक्ष कोर्ट के सामने रखा जाएगा। इसी बहस का अगला चरण 4 अगस्त को होगा।
आबादी के आंकड़ों का भी हुआ उल्लेख
सुनवाई के दौरान ओबीसी पक्ष ने आबादी से जुड़े आंकड़े भी रखे। उनके अनुसार मध्य प्रदेश में ओबीसी की आबादी करीब 51 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति की आबादी 15.6 प्रतिशत बताई गई। अनुसूचित जनजाति की आबादी 21.1 प्रतिशत बताई गई।
इन तीनों वर्गों को जोड़ने पर आबादी लगभग 87 प्रतिशत से अधिक बताई गई। शेष आबादी सामान्य वर्ग की बताई गई। यह आंकड़े ओबीसी पक्ष की दलीलों का हिस्सा रहे। इन आंकड़ों की सत्यता पर कोर्ट ने अभी कोई अंतिम राय नहीं दी है।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण भी बहस का बड़ा मुद्दा बना
सुनवाई में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर भी चर्चा हुई। ओबीसी पक्ष ने कहा कि सामान्य वर्ग में ईडब्ल्यूएस मानकों में आने वाली आबादी बहुत कम है।
दलील दी गई कि इतनी आबादी के लिए 10 प्रतिशत वर्टिकल आरक्षण लागू किया गया। इसी कारण कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ऊपर गया। ओबीसी पक्ष ने कहा कि यदि सीमा टूटी है तो उसका कारण ओबीसी आरक्षण नहीं है। यह पक्षकार की दलील है। इस पर कोर्ट ने अभी कोई निष्कर्ष नहीं दिया है।
इंदिरा साहनी फैसले पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान इंदिरा साहनी फैसले का भी जिक्र हुआ। ओबीसी पक्ष ने कहा कि अगली सुनवाई में यह बताया जाएगा कि उस फैसले की व्याख्या इस मामले में कैसे लागू होती है। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) से जुड़े पहलुओं पर भी कोर्ट के सामने विस्तार से बहस होगी। इस मुद्दे पर भी अभी कोर्ट ने कोई टिप्पणी नहीं की है।
अब 4 अगस्त की सुनवाई पर सबकी नजर
मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को दोपहर 2:30 बजे तय की गई है। उस दिन ओबीसी पक्ष अपनी बची हुई दलीलें पूरी करेगा। इसके बाद दूसरे पक्ष की बहस या आगे की प्रक्रिया तय हो सकती है। यह मामला राज्य की कई भर्तियों और आरक्षण व्यवस्था पर असर डाल सकता है। इसलिए इस सुनवाई पर सभी पक्षों की नजर बनी हुई है।
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