बीजेपी सरकार का 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण केस और 100 फीसदी वेतन में अलग-अलग स्टैंड

Sanjay Gupta | Sept 21, 2026, 14:27 IST
एमपी में 15 माह के लिए आई कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के समय के दो बड़े फैसले वर्तमान में बीजेपी की मोहन सरकार के लिए उलझन बढ़ा रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि दोनों ही मामलों में सरकार के स्टैंड अलग-अलग हैं।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सामने आ गया। इस विवाद से जुड़े 13 फीसदी होल्ड पदों को लेकर भी खूब चर्चा हुई। यह फैसला कमलनाथ सरकार के समय लिया गया था।



इसी दौरान एक और फैसला हुआ था, जिसमें प्रोबेशन अवधि को दो साल से बढ़ाकर चार साल कर दिया गया था। इसके तहत ईएसबी से चयनित कर्मचारियों को पहले 70 फीसदी, फिर 80, 90 और चौथे साल में पूरा 100 फीसदी वेतन देने का नियम बनाया गया था।



आज यही दोनों फैसले मोहन सरकार के लिए युवाओं के बीच बड़े मुद्दे बन गए हैं। खास बात यह है कि दोनों मामलों में सरकार का रुख अलग-अलग नजर आ रहा है।



27 फीसदी ओबीसी आरक्षण

कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया था। इसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने 14 फीसदी से ज्यादा आरक्षण पर रोक लगा दी। इसी बीच कमलनाथ सरकार चली गई।



भर्ती के रिजल्ट अटक रहे थे, इसलिए तत्कालीन शिवराज सरकार ने सितंबर 2022 में 87-13 फीसदी का फॉर्मूला लागू किया। इसके तहत 14 फीसदी ओबीसी आरक्षण के साथ 87 फीसदी पदों का रिजल्ट जारी किया जाने लगा, जबकि बाकी 13 फीसदी पदों को होल्ड कर दिया गया।



सरकार ने तय किया था कि अगर फैसला ओबीसी आरक्षण के पक्ष में आता है तो ये पद ओबीसी वर्ग को दिए जाएंगे और अगर फैसला इसके खिलाफ आता है तो ये पद अनारक्षित वर्ग में चले जाएंगे। तब से हजारों पदों पर चयन और नियुक्तियां अटकी हुई हैं। इस मामले को करीब चार साल हो चुके हैं।



इस मामले में मप्र सरकार का स्टैंड

इस मामले में मोहन सरकार का कहना है कि कोर्ट का फैसला आने के बाद ही 13 फीसदी होल्ड पदों को अनहोल्ड किया जाएगा। सरकार कोर्ट में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण लागू करने के पक्ष में अपना पक्ष रख चुकी है। सरकार का तर्क है कि मध्य प्रदेश में ओबीसी आबादी 52 फीसदी है और संबंधित कमेटी की सिफारिश के आधार पर आरक्षण लागू किया जाना चाहिए।



वहीं जानकारों का कहना है कि यह मामला अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। अगर फैसला ओबीसी आरक्षण के पक्ष में नहीं आता है तो सरकार आगे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है, जिससे 13 फीसदी पदों पर फैसला फिर लंबा खिंच सकता है।



दूसरी तरफ अगर फैसला अनारक्षित वर्ग के पक्ष में नहीं आता है तो उस पक्ष से भी सुप्रीम कोर्ट जाने की संभावना है। ऐसे में इस मामले का जल्द समाधान होना मुश्किल नजर आ रहा है।



पांच अगस्त से फैसला रिजर्व

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसमें फाइनल सुनवाई हाईकोर्ट जबलपुर में हुई। सुनवाई पांच अगस्त को पूरी हो चुकी है। इसके बाद से ही बेंच ने आदेश सुनकर रिजर्व रखा हुआ है। इस बात को 48 दिन हो चुके हैं और अभी फैसला कब आएगा इस पर स्थिति साफ नहीं है।



बात 100 फीसदी वेतन की, इसमें यह हुई राजनीति

कमलनाथ सरकार ने ईएसबी (एमपी कर्मचारी चयन मंडल) से चयनित तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए 70, 80, 90 और 100 फीसदी वेतन का फार्मूला लागू किया था। इसके तहत प्रोबेशन अवधि चार साल की रखी गई।



नियम के मुताबिक, पहले साल कर्मचारियों को तय वेतन का 70 फीसदी, दूसरे साल 80 फीसदी, तीसरे साल 90 फीसदी और चौथे साल से पूरा 100 फीसदी वेतन मिलना था।



2023 के विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कर्मचारियों को 100 फीसदी वेतन लागू करने का भरोसा दिया था। छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह का वादा किया गया था।



बीजेपी की सरकार बनने के बाद मध्य प्रदेश में यह व्यवस्था लागू नहीं हुई, जबकि छत्तीसगढ़ में साल 2023 में 100 फीसदी वेतन लागू कर दिया गया। हालांकि, छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले समय का एरियर नहीं दिया।



हाईकोर्ट का आदेश सरकार नहीं मान रही

जहां 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण मामले में सरकार का कहना है कि कोर्ट के फैसले के बाद ही इसे लागू किया जाएगा और 13 फीसदी होल्ड पदों को अनहोल्ड किया जाएगा। वहीं दूसरी तरफ 100 फीसदी वेतन के मामले में हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई।



यानी इस मामले में सरकार हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दे रही है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जब पीएससी से भर्ती होने वाले कर्मचारियों को 100 फीसदी वेतन दिया जा रहा है तो ईएसबी से चयनित कर्मचारियों के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है।



कोर्ट का तर्क था कि जब दोनों जगह चयन प्रक्रिया और शैक्षणिक योग्यता मेरिट के आधार पर है तो वेतन में अंतर नहीं होना चाहिए। कर्मचारियों से जब पूरा काम लिया जा रहा है तो उन्हें पूरा वेतन भी मिलना चाहिए।



सरकार का आर्थिक बोझ का तर्क

मध्य प्रदेश सरकार ने एमपी हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सरकार का तर्क है कि साल 2019 से अब तक नियुक्त कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि के वेतन और मूल वेतन के बीच का अंतर एरियर के रूप में देना संभव नहीं है। सरकार का कहना है कि राज्य की राशि जनकल्याणकारी योजनाओं में भी खर्च होती है। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है और फिलहाल कर्मचारियों को 100 फीसदी वेतन मिलने में समय लग सकता है।



सरकार का दूसरा तर्क 1966 के सेवा नियमों को लेकर है। सरकार का कहना है कि नियुक्ति की शुरुआत में कर्मचारी को प्रशिक्षण और उसकी क्षमता को देखते हुए स्टाइपेंड व्यवस्था रखी गई है। यह चरणबद्ध भुगतान व्यवस्था सही है।



सरकार का कहना है कि वेतन व्यवस्था वित्त और मध्यप्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग ने मिलकर तय की है और पूरी प्रक्रिया के परीक्षण के बाद इसे लागू किया गया था। साथ ही सरकार का तर्क है कि प्रोबेशन अवधि में वेतन की शर्तें तय करना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।



सरकार नई भर्तियों का हवाला भी दे रही है। उसका कहना है कि प्रदेश में बड़े स्तर पर भर्ती प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में वेतन बढ़ाने से आर्थिक बोझ बढ़ेगा, जिसका असर आने वाली नियुक्तियों और भर्ती प्रक्रिया पर पड़ सकता है।



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