स्कूल-कॉलेज में डिजिटल सर्टिफिकेट की पाबंदी, विभागों की भर्तियों में ऑफलाइन की छूट
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्यप्रदेश में सरकारी भर्तियों में ऑफलाइन जाति प्रमाण पत्र की छूट फर्जीवाड़े की जड़ बन गई है।
- स्कूल-कॉलेजों में ऑनलाइन सर्टिफिकेट जरूरी है, लेकिन भर्ती एजेंसियां ऑफलाइन सर्टिफिकेट मान रही हैं।
- सरकार ने विधानसभा में 232 फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामलों की जांच स्वीकार की है।
- एसटीएफ (Special Task Force) ने अब तक 25 अफसर-कर्मचारियों पर कार्रवाई की है।
- इनमें डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और पुलिसकर्मी तक शामिल हैं।
भर्तियों में क्यों चल रहा है ऑफलाइन का खेल?
मध्यप्रदेश में ई-डिस्ट्रिक्ट (e-district) पोर्टल और लोकसेवा केंद्रों के जरिए काफी समय से डिजिटल जाति प्रमाण पत्र जारी हो रहे हैं। स्कूल और कॉलेजों में प्रवेश, बैंक खाते और सरकारी योजनाओं के अनुदान में ऑनलाइन सर्टिफिकेट मान्य हैं। सामान्य प्रशासन विभाग यानी जीएडी (General Administration Department) ने भी सरकारी कामकाज में डिजिटल दस्तावेजों के उपयोग के निर्देश जारी किए हुए हैं।
बावजूद इसके मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मण्डल और मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग भर्ती प्रक्रिया में डिजिटल सर्टिफिकेट को अनिवार्य नहीं कर पाए हैं। यही वह खामी है जिसका फर्जीवाड़ा करने वाले गिरोह पूरा फायदा उठा रहे हैं।
ऑफलाइन सर्टिफिकेट से कैसे होता है खेल?
फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाने वाले गिरोह एसडीएम (Sub-Divisional Magistrate) और तहसील कार्यालय के नाम पर फर्जी सर्टिफिकेट तैयार करते हैं। इसके लिए कुछ हजार से लेकर एक लाख रुपए तक वसूले जाते हैं। संबंधित विभागों में भी इनकी सांठगांठ होती है, इसीलिए शुरुआत में ऑफलाइन सर्टिफिकेट का सत्यापन नहीं हो पाता। दस्तावेजों की जांच सालों तक खिंचती रहती है। पकड़े जाने पर आरोपी अपील और कोर्ट का रास्ता पकड़ लेते हैं, जिससे जांच पांच से दस साल तक अटकी रहती है।
एसटीएफ की जांच में यह तथ्य सामने आया कि भर्ती निकलते ही ऐसे गिरोह सक्रिय हो जाते हैं।
दो मामले जो बताते हैं सिस्टम की खामी
बिजली कंपनी में पदस्थ सहायक अभियंता अमित केवट को 2 नवंबर 2011 में नियुक्ति मिली थी। बिजली कंपनी 10 साल तक उनके दस्तावेजों का सत्यापन नहीं करा सकी। शिकायत के बाद जबलपुर एडीएम कार्यालय की दायरा पंजी से जांच हुई तो पता चला कि जो सर्टिफिकेट नियुक्ति के समय जमा किया गया था, वह एसडीएम कार्यालय से जारी ही नहीं हुआ था।
दूसरा मामला बिजली कंपनी के ही विनोद सिंह राजपूत का है। उन्हें 17 मई 2012 को नियुक्ति मिली थी। उन्होंने एसडीएम कार्यालय ग्वालियर से कथित रूप से जारी अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी (Other Backward Class) का जाति प्रमाण पत्र जमा किया था, जिसमें जाति किरार दर्शाई गई थी। विनोद सिंह इसी सर्टिफिकेट के सहारे 11 साल तक लेखा अधिकारी बनकर वेतन लेते रहे। जब ग्वालियर एसडीएम कार्यालय की दायरा पंजी से सत्यापन हुआ तो उस प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड ही नहीं मिला।
ये दोनों मामले बताते हैं कि ऑफलाइन सर्टिफिकेट का फर्जीवाड़ा सालों तक पकड़ में नहीं आता।
डॉक्टर-इंजीनियर तक पहुंचा मामला
फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामला सिर्फ छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। एसटीएफ की जांच में डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और पुलिसकर्मी तक सामने आए हैं। आलीराजपुर में एक ठाकुर जाति की शिक्षिका शर्मिला सोलंकी आदिवासी बनकर 11 साल तक नौकरी करती रही। ग्वालियर में 200 पुलिस जवानों को फर्जी एससी (Scheduled Caste) सर्टिफिकेट से भर्ती करने का मामला सामने आया, जिसकी हाईकोर्ट ने भी गंभीर नोटिस लिया। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अमृतलाल मीणा पर भी फर्जी एसटी (Scheduled Tribe) सर्टिफिकेट से नौकरी लेने का आरोप लगा।
232 केस जांच में, हजारों लंबित
राज्य सरकार ने विधानसभा में माना था कि सरकारी नौकरियों में फर्जीवाड़े के 232 मामलों की जांच चल रही है। इनके अलावा राज्य स्तरीय छानबीन समिति के सामने ऐसी शिकायतों का ढेर लगा हुआ है। नौकरी हासिल कर चुके हजार से ज्यादा कर्मचारियों के जाति प्रमाण पत्रों की जांच साल दर साल टलती जा रही है। हाईकोर्ट में भी इससे जुड़े करीब 17 हजार मामले लंबित हैं। जबलपुर में 1950 से अब तक के सभी सर्टिफिकेट की जांच शुरू कर दी गई है।
डिजिटल लॉकर बेअसर क्यों?
केंद्र और राज्य सरकार ने छात्रों के लिए डिजिटल लॉकर की व्यवस्था बनाई है जिसमें सभी दस्तावेज ऑनलाइन सुरक्षित रहते हैं। स्कूल, कॉलेज, बैंक और सरकारी योजनाओं में यह मान्य भी है। लेकिन विडंबना यह है कि केवल सरकारी भर्तियों में ऑफलाइन सर्टिफिकेट की छूट अब भी जारी है। अधिकारियों के सामने फर्जीवाड़े के अनगिनत मामले होने के बावजूद व्यवस्था सुस्त पड़ी है। यदि भर्ती एजेंसियां ऑनलाइन सर्टिफिकेट अनिवार्य कर दें तो रातोरात इस फर्जीवाड़े पर लगाम लग सकती है।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर उन लाखों योग्य उम्मीदवारों के हक से जुड़ी है जो सरकारी भर्तियों में मेहनत से तैयारी करते हैं और फर्जी सर्टिफिकेट धारकों के कारण उनका हक मारा जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत सरकारी नौकरी में समान अवसर का अधिकार हर नागरिक को है और अनुच्छेद 341 तथा 342 के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति को मिला आरक्षण का लाभ भी सिर्फ असली हकदारों को मिलना चाहिए। फर्जी सर्टिफिकेट से यह दोनों संवैधानिक अधिकार कुचले जा रहे हैं। भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस (Bharatiya Nyaya Sanhita) के तहत फर्जी दस्तावेज पर सात साल तक जेल का प्रावधान है। बावजूद इसके सिस्टम की खामी दूर नहीं की जा रही है। यह खबर प्रशासन को जवाबदेह बनाने और जनता को सचेत करने के लिहाज से बेहद जरूरी है।
जरूरी FAQ
मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण पत्र को लेकर सरकार के क्या नियम हैं?
मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरी, कॉलेज एडमिशन और स्कॉलरशिप के लिए ऑनलाइन डिजिटल जाति प्रमाण पत्र अनिवार्य है। इसे एमपी ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल या लोकसेवा केंद्र से बनवाया जा सकता है। सामान्य प्रशासन विभाग ने डिजिटल दस्तावेजों के उपयोग के निर्देश भी जारी किए हुए हैं। फर्जी प्रमाण पत्र बनवाने पर बीएनएस के तहत सात साल तक जेल और नौकरी रद्द करने का प्रावधान है। फिर भी भर्ती एजेंसियां ऑफलाइन सर्टिफिकेट की छूट दे रही हैं जो इस समूचे फर्जीवाड़े की जड़ है।
ऑफलाइन जाति प्रमाण पत्र से फर्जीवाड़ा कैसे होता है?
फर्जीवाड़ा करने वाले गिरोह एसडीएम और तहसील कार्यालय के नाम पर नकली जाति प्रमाण पत्र तैयार करते हैं। इसके लिए कुछ हजार से एक लाख रुपए तक वसूले जाते हैं। विभागों में सांठगांठ होने के कारण पदस्थापना के समय सत्यापन नहीं हो पाता। रजिस्टर में एंट्री न होने पर भी प्रमाणित लिखवा दिया जाता है। पकड़े जाने पर आरोपी कोर्ट का सहारा लेकर जांच को पांच से दस साल तक अटका देते हैं। इसीलिए सालों तक फर्जीवाड़ा उजागर नहीं होता।
अब तक कितने मामले पकड़े गए और क्या कार्रवाई हुई?
सरकार ने विधानसभा में 232 फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामलों की जांच स्वीकार की है। एसटीएफ ने अब तक 25 अफसर और कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज की है जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और पुलिसकर्मी शामिल हैं। ग्वालियर हाईकोर्ट ने 11 आरक्षकों के सर्टिफिकेट की 90 दिन में जांच के आदेश दिए हैं। जबलपुर में 1950 से अब तक के सभी सर्टिफिकेट की जांच शुरू हुई है। हाईकोर्ट में इससे जुड़े करीब 17 हजार मामले अब भी लंबित हैं।
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