मध्यप्रदेश में नहीं रुकेगा ऑनलाइन खाद वितरण, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- आदान विक्रेता संघ ने ऑनलाइन खाद वितरण व्यवस्था को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
- संघ ने इंटरनेट और तकनीकी दिक्कतों का मुद्दा उठाया था।
- सरकार ने कहा कि नई व्यवस्था कालाबाजारी रोकने के लिए जरूरी है।
- हाईकोर्ट ने इसे केंद्र सरकार का नीतिगत फैसला मानते हुए हस्तक्षेप से इनकार किया।
- इंटरनेट समस्या होने पर कलेक्टर को ऑफलाइन या हाइब्रिड व्यवस्था लागू करने का अधिकार है।
मध्य प्रदेश में खाद वितरण की ऑनलाइन व्यवस्था जारी रहेगी। जबलपुर हाईकोर्ट ने कृषि आदान विक्रेता संघ की याचिका खारिज कर दी। यह आदेश 10 मार्च 2026 को सुरक्षित रखा गया था। विस्तृत फैसला 22 जुलाई 2026 को अपलोड हुआ। कोर्ट ने माना कि ई-विकास प्रणाली किसानों के हित में बनाई गई है। इसका उद्देश्य कालाबाजारी और खाद के गलत इस्तेमाल को रोकना है।
ई-विकास व्यवस्था को क्यों दी गई चुनौती
कृषि आदान विक्रेता संघ ने 7 जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। इसी आदेश से पूरे प्रदेश में ई-विकास प्रणाली लागू हुई थी। संघ ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कमजोर रहता है। कई किसान तकनीक से परिचित नहीं हैं। इससे खाद लेने में परेशानी बढ़ रही है।
याचिका में किसानों और विक्रेताओं की ये परेशानियां बताईं
संघ ने अदालत को बताया कि किसान पहले सीधे दुकानों से खाद खरीद लेते थे। अब ई-टोकन प्रक्रिया से देरी हो रही है। कई किसान केवल यूरिया और डीएपी का चयन कर रहे हैं। दूसरे उर्वरकों की जानकारी नहीं मिल रही। विक्रेताओं के पास स्टॉक होने के बाद भी वितरण प्रभावित हो रहा है।
सरकार ने कोर्ट में क्या कहा
राज्य सरकार ने बताया कि पुरानी व्यवस्था में बड़ी खामियां थीं। खेती नहीं करने वाले लोग भी सब्सिडी वाली खाद खरीद रहे थे। कई जगह कालाबाजारी और जमाखोरी की शिकायतें मिलीं। कुछ मामलों में खाद का गैर कृषि उपयोग भी सामने आया। इसलिए नई डिजिटल व्यवस्था लागू की गई।
ई-विकास प्रणाली कैसे करती है काम
सरकार ने बताया कि अब खाद वितरण जमीन के रिकॉर्ड से जुड़ा है। किसान की भूमि एग्री स्टैक से जुड़ती है। उसी आधार पर खाद की पात्रता तय होती है। इससे वितरण का पूरा रिकॉर्ड ऑनलाइन रहता है। निगरानी भी पहले से आसान हो जाती है।
बटाईदार किसानों के लिए भी रखा गया प्रावधान
याचिका में कहा गया था कि बटाईदार किसानों को परेशानी होगी। सरकार ने इसका जवाब भी दिया। अदालत को बताया गया कि ऐसे किसान एसडीएम से सत्यापन करा सकते हैं। इसके बाद उन्हें ई-टोकन मिलेगा। उसी आधार पर खाद उपलब्ध कराई जाएगी।
हाईकोर्ट ने किन आधारों पर याचिका खारिज की
जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने कहा कि यह केंद्र सरकार का नीतिगत फैसला है। ऐसी नीतियों में अदालत का दखल सीमित रहता है। जब तक कोई नीति मनमानी या कानून के खिलाफ न हो, तब तक उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि इस योजना का मकसद किसानों का हित सुरक्षित करना है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया गया सहारा
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सरकार को नीतियां बनाने और बदलने का अधिकार है। न्यायालय नीति की जगह अपना फैसला नहीं थोप सकता। केवल असंवैधानिक या मनमानी नीति में ही हस्तक्षेप किया जा सकता है।
इंटरनेट समस्या पर कोर्ट ने क्या कहा
अदालत ने आदेश के क्लॉज 18.9 का विशेष उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत जिला कलेक्टर को अधिकार दिए गए हैं। यदि इंटरनेट या तकनीकी दिक्कत हो, तो कलेक्टर पुरानी व्यवस्था लागू कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर हाइब्रिड मोड भी अपनाया जा सकता है।
शिकायत होने पर किसानों और विक्रेताओं के पास क्या विकल्प
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि हर समस्या के लिए याचिका जरूरी नहीं है। यदि किसी जिले में वितरण में दिक्कत हो, तो कलेक्टर से संपर्क किया जा सकता है। कलेक्टर शिकायत सुनकर स्थानीय जरूरत के अनुसार फैसला ले सकते हैं। इसलिए अदालत ने अलग राहत देने से इनकार किया।
फैसला कब आया और इसका क्या असर होगा
मामले की सुनवाई 10 मार्च 2026 को पूरी हुई थी। उसी दिन फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। इसके बाद 22 जुलाई 2026 को विस्तृत आदेश अपलोड किया गया। इस फैसले से प्रदेश में ऑनलाइन खाद वितरण व्यवस्था को कानूनी मजबूती मिल गई है। अब पूरे प्रदेश में यही व्यवस्था जारी रहेगी।
इस फैसले का बड़ा संदेश
हाईकोर्ट ने माना कि पारदर्शिता बढ़ाने वाली व्यवस्था को केवल असुविधा के आधार पर नहीं रोका जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्थानीय समस्याओं के समाधान का अधिकार जिला प्रशासन के पास पहले से मौजूद है। इसलिए पूरी व्यवस्था को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।
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