अमृत 2.0 योजना : पानी के नाम पर खुदाई, शहर बेहाल... बरसात में कौन देगा जवाब?
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश में सड़कों की खुदाई के बाद धीमी मरम्मत।
- बरसात में जलभराव और दुर्घटना का खतरा बढ़ा।
- पेयजल परियोजनाओं पर 15 हजार करोड़ से अधिक खर्च।
- 36 हजार से ज्यादा जल शिकायतें दर्ज।
- केवल 61 प्रतिशत शिकायतों का समाधान।
मध्यप्रदेश के शहरों में पेयजल व्यवस्था सुधारने के नाम पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। सरकार दावा कर रही है कि अमृत-2.0 जैसी योजनाओं से लोगों के घर तक बेहतर पानी पहुंचेगा, लेकिन जमीनी तस्वीर इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। कई शहरों में सड़कें खोद दी गईं, पाइपलाइन बिछाई जा रही हैं, लेकिन मरम्मत और गुणवत्ता सुधार का काम पीछे छूट गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बरसात सिर पर खड़ी है तो इन उखड़ी सड़कों, अधूरे गड्ढों और बिखरी व्यवस्थाओं के बीच आम नागरिक आखिर कैसे निकलेंगे? शहरों में जगह-जगह खुदाई हो चुकी है, लेकिन उन्हें सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने की जिम्मेदारी लेने वाला अमला मैदान में नजर नहीं आ रहा।
15 हजार करोड़ खर्च, फिर भी 36 हजार शिकायतें
नगरीय विकास विभाग की अमृत 2.0 योजना के तहत प्रदेश में 15 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के पेयजल और सीवेज प्रोजेक्ट संचालित हैं। इसके बावजूद जनवरी से जून 2026 के बीच 16 नगर निगम क्षेत्रों से 36 हजार से अधिक पेयजल शिकायतें दर्ज हुईं।
चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से केवल 61 प्रतिशत शिकायतों का समाधान हो पाया। बाकी लोग आज भी कम दबाव, अनियमित जलापूर्ति और दूषित पानी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
प्रमुख तथ्य...
- 15 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की परियोजनाएं जारी।
- 36 हजार से अधिक पेयजल शिकायतें दर्ज।
- केवल 61 प्रतिशत शिकायतों का समाधान।
- कई परियोजनाएं अभी 60 से 85 प्रतिशत तक ही पूरी।
- बरसात से पहले हजारों स्थानों पर सड़कें खुदी हुई।
सड़कें खोदीं, लेकिन बनाने की जल्दबाजी नहीं
पेयजल परियोजनाओं के नाम पर प्रदेश के कई शहरों में सड़कों की खुदाई की गई है। कॉलोनियों, मोहल्लों और मुख्य मार्गों पर पाइपलाइन डालने के लिए सड़कें तोड़ दी गईं, लेकिन उन्हें पहले जैसी स्थिति में लाने का काम बेहद धीमा है।
राजधानी भोपाल समेत कई शहरों में नागरिक रोजाना धूल, गड्ढों और खराब रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि खुदाई के बाद खानापूर्ति कर दी जाती है, लेकिन स्थायी मरम्मत नहीं होती।
बरसात में बढ़ सकती है परेशानी
मौसम विभाग लगातार मानसून की सक्रियता के संकेत दे रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जो सड़कें अभी बदहाल हैं, वे बारिश के दौरान कैसी स्थिति में पहुंचेंगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि अधूरी मरम्मत वाले हिस्सों में जलभराव, कीचड़ और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। सबसे ज्यादा परेशानी कॉलोनियों और आंतरिक सड़कों में देखने को मिल सकती है, जहां खुदाई के बाद समुचित पुनर्निर्माण नहीं हुआ है।
अधूरी परियोजनाएं बढ़ा रहीं संकट
नगरीय निकायों के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश पेयजल परियोजनाएं अभी पूरी नहीं हुई हैं। कई शहरों में काम 60 से 85 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है।
शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन नई पाइपलाइन और जल वितरण नेटवर्क उसी गति से विकसित नहीं हो सके। नतीजा यह है कि नए इलाकों में जल संकट लगातार गहराता जा रहा है।
पुरानी पाइपलाइनें बनी मुसीबत
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश में पानी की कमी से ज्यादा समस्या उसके वितरण तंत्र में है। कई शहरों की पाइपलाइनें दशकों पुरानी हैं और लगातार लीकेज का शिकार हो रही हैं।
कई जगह पेयजल लाइनें नालों और सीवेज नेटवर्क के आसपास से गुजर रही हैं। अकेले भोपाल में 525 किलोमीटर पाइपलाइन ऐसे क्षेत्रों में चिन्हित की गई है जहां सीवेज मिश्रण का खतरा बना हुआ है।
दूषित पानी ने भी बढ़ाई चिंता
पिछले पांच महीनों में गंदे और दूषित पानी की 5,875 शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें से बड़ी संख्या में शिकायतों का समाधान होने का दावा किया गया, लेकिन सैकड़ों मामले उच्च स्तर तक पहुंचे।
यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल पानी पहुंचाने की नहीं, बल्कि सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण पानी उपलब्ध कराने की भी है। इंदौर सबसे ऊपर, भोपाल दूसरे नंबर पर 1 जनवरी से 9 जून 2026 तक दर्ज शिकायतों में इंदौर सबसे आगे रहा।
सबसे बड़ा सवाल: पुनर्निर्माण समय पर नहीं
यदि परियोजनाएं तय योजना के अनुसार चल रही हैं तो सड़कों का पुनर्निर्माण समय पर क्यों नहीं हो रहा? यदि हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं तो शिकायतों का अंबार क्यों लगा है?
यदि बरसात से पहले तैयारी पूरी है, तो शहरों में जगह-जगह खुदाई और बदहाल सड़कें अब भी क्यों दिखाई दे रही हैं? फिलहाल जनता जवाब का इंतजार कर रही है, जबकि मानसून दस्तक देने को तैयार खड़ा है।
इसको लेकर प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता विनोद शर्मा ने कहा कि "प्रदेश में पेयजल व्यवस्था बद से बदतर है। हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी लोगों को राहत नहीं मिली। पानी की लाइन के नाम पर सड़कें खोद दी गईं, लेकिन बरसात से पहले उनकी मरम्मत पर कोई गंभीरता दिखाई नहीं दे रही।"
सड़कें बनाने पर कोई ध्यान नहीं: बारोलिया
“राजधानी भोपाल की जनता सड़कों पर नहीं, गड्ढों पर चलने को मजबूर है”। कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता अभिनव बारोलिया ने कहा कि भोपाल में पेयजल परियोजनाओं के नाम पर सड़कों की खुदाई तो तेजी से की जा रही है, लेकिन उनकी मरम्मत और पुनर्निर्माण पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।
कई इलाकों में सड़कें महीनों से उखड़ी पड़ी हैं, जिससे आम नागरिकों, व्यापारियों और वाहन चालकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि बरसात सिर पर है और यदि समय रहते सड़कों को दुरुस्त नहीं किया गया तो हालात और गंभीर हो जाएंगे। सरकार एक ओर सुचारू पेयजल व्यवस्था के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर जनता धूल, कीचड़ और जाम से जूझ रही है। शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार विभाग समाधान करने के बजाय केवल आश्वासन देने में लगे हैं।
पेयजल योजना के नाम पर अव्यवस्था का तोहफा: विवेक त्रिपाठी
कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने कहा कि राजधानी भोपाल में पेयजल लाइनों के विस्तार के लिए की जा रही खुदाई के बाद सड़कों को व्यवस्थित तरीके से नहीं बनाया जा रहा है। कई क्षेत्रों में सड़कें इतनी खराब हो चुकी हैं कि लोगों का आवागमन तक प्रभावित हो रहा है।
विवेक त्रिपाठी ने कहा कि मानसून शुरू होने वाला है और यदि प्रशासन ने तत्काल कदम नहीं उठाए तो खुदी हुई सड़कें दुर्घटनाओं और जलभराव का बड़ा कारण बन सकती हैं।
सरकार को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए और केवल घोषणाओं के बजाय जमीन पर काम दिखाना चाहिए। जनता लगातार शिकायतें कर रही है, लेकिन उनका निराकरण नहीं हो रहा, जिससे लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। राजधानी की ऐसी स्थिति किसी भी जिम्मेदार प्रशासन के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।
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