मध्य प्रदेश में डॉक्टरों की बॉन्ड पोस्टिंग में गड़बड़ी, PG डॉक्टर गांव छोड़ मेडिकल कॉलेज पहुंचे
News In Short
- मध्यप्रदेश में ग्रामीण अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है।
- सरकार ने बॉन्ड के तहत पोस्टग्रेजुएट (PG) डॉक्टरों की ग्रामीण पोस्टिंग अनिवार्य की थी।
- लेकिन 81 में से 35 से ज्यादा PG डॉक्टर मेडिकल कॉलेज में पोस्ट हो गए।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) ने इसे नियमों का उल्लंघन मानते हुए आदेश जारी किया।
- ग्रामीण क्षेत्रों में 340 में से सिर्फ 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही ठीक से काम कर रहे हैं।
News In Detail
गांवों में कौन देखेगा मरीज?
मध्यप्रदेश के ग्रामीण अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बेहद गंभीर हो चुकी है। अनेक ऑटोनॉमस रेफरल यूनिट महीनों से बिना किसी विशेषज्ञ के चल रही हैं। बड़े शहरों में बेहतर सुविधाएं और तनख्वाह की चाहत में डॉक्टर गांव जाने से कतराते हैं।
इसी समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने एक बड़ा फैसला लिया। तय हुआ कि जो पीजी यानी पोस्टग्रेजुएट डॉक्टर बॉन्ड के तहत सरकारी सेवा में आएंगे, उनकी पोस्टिंग पहले चिह्नित एफएआरयू में ही होगी।
इनमें स्त्री रोग, शिशु रोग और निश्चेतना यानी एनेस्थीसिया जैसे अहम विभागों के डॉक्टर शामिल हैं।
81 में से 35 गए मेडिकल कॉलेज
लेकिन हुआ ठीक उल्टा। NHM का आदेश जारी होने के बाद कुल 81 पदों पर नई पोस्टिंग हुई। इनमें स्त्री रोग विशेषज्ञों की 35 पोस्टिंग हुई, लेकिन ये सब मेडिकल कॉलेजों में चली गईं।
एनेस्थीसिया के 23 और शिशु रोग विशेषज्ञों के 23 और डॉक्टर भी मेडिकल कॉलेज पहुंच गए। ग्रामीण क्षेत्रों को जो डॉक्टर मिलने चाहिए थे, वे शहरी मेडिकल कॉलेजों में तैनात हो गए।
NHM ने इस पर आपत्ति जताते हुए स्पष्ट कहा कि बॉन्ड के तहत आने वाले पीजी/डिप्लोमाधारक डॉक्टरों की मेडिकल कॉलेजों में पोस्टिंग नियमों के खिलाफ है।
पोस्टिंग में यूनिफाइड पॉलिसी की मांग
डायरेक्टरेट से पदस्थ होने वाले डॉक्टरों को बॉन्ड पोस्टिंग पर 65 हजार रुपए वेतन दिया जाता है। NHM इन्हीं पोस्टिंग के लिए प्रति डॉक्टर एक लाख 25 हजार रुपए अलग से देता है। यह राशि पोस्टिंग शुरू होने के साथ ही मिलने लगती है।
फाइमा (FAIMA - Federation of All India Medical Association) के नेशनल कोऑर्डिनेटर डॉ. आकाश सोनी का कहना है कि, बॉन्ड पोस्टिंग पर सरकार की एक स्पष्ट यूनिफाइड पॉलिसी होनी चाहिए। उनका तर्क है कि इस तरह अलग-अलग वेतन देने से डॉक्टरों के बीच असमानता और संशय पैदा होता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी हाल बुरा
ग्रामीण स्थिति बताती है कि हालात कितने खराब हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 340 में से सिर्फ 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही ठीक से काम कर रहे हैं।
इसी तरह एम्स भोपाल में स्मार्ट यूनिट में संविदा चिकित्सा अधिकारी के चयन को लेकर एक गड़बड़ी सामने आई है। दरअसल इस चयन में प्रक्रियागत त्रुटियां थीं। इसका सही तरीके से पालन नहीं किया गया।
इसके बाद डॉ. हिमानी यादव, जो शिशु स्वास्थ्य विभाग की उप संचालक हैं, उन्हें अपर मिशन संचालक दिशा नागवंशी ने नोटिस दिया है। वहीं अपर मुख्य सचिव ने भी इस मामले को अपनी टास्क लिस्ट में डालकर जवाब मांगा है।
ऊपर से आदेश, जमीन पर अमल नहीं
मामले की गंभीरता इससे समझी जा सकती है कि NHM का आदेश स्पष्ट था। पीडियाट्रिशियन यानी बाल रोग विशेषज्ञों को स्नातकोत्तर डॉक्टरों के तौर पर मान्यता देने के बावजूद डॉ. शिखा यादव और डॉ. सांची अग्रवाल की पोस्टिंग इंदौर एमजीएम मेडिकल कॉलेज में कर दी गई।
सिस्टम में खामी या मंशा में?
असल सवाल यह है कि क्या यह लापरवाही है या कोई जानबूझकर किया गया खेल। जब सरकार ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त पैसा खर्च कर रही है और आदेश भी जारी हैं, तो डॉक्टर गांव की बजाय मेडिकल कॉलेज में क्यों पहुंच रहे हैं? जब तक इसका जवाब नहीं मिलता, ग्रामीण मरीजों की परेशानी खत्म नहीं होगी।
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