MP प्लास्टिक पार्क में करोड़ों खर्च, 20 हजार नौकरी का दावा, मिली सिर्फ 274
News In Short
- मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के तामोट और ग्वालियर के बिलौआ में दो प्लास्टिक पार्क बनाए गए हैं।
- इन दोनों पार्कों पर सरकार ने मिलकर करोड़ों रुपए खर्च किए हैं।
- तामोट पार्क में 20 हजार और बिलौआ पार्क में 10 हजार रोजगार देने का दावा किया गया था।
- असलियत यह है कि तामोट में अब तक सिर्फ 274 लोगों को नौकरी मिली है।
- बिलौआ में रोजगार का आंकड़ा अभी भी शून्य है।
News In Detail
बड़े दावे, छोटे नतीजे
मध्य प्रदेश सरकार निवेश को लेकर बड़े-बड़े आयोजन करती रही है। इन्वेस्टमेंट समिट और रोड शो पर भी भारी खर्च होता रहा है। विपक्ष इन खर्चों पर सवाल उठाता रहा है। अब लोकसभा में आए ताजा आंकड़ों ने जमीनी हकीकत सामने रख दी है।
रतलाम-झाबुआ से बीजेपी (Bharatiya Janata Party) सांसद अनीता नागर सिंह चौहान ने प्लास्टिक पार्कों को लेकर सवाल पूछा था। इसके जवाब में जो जानकारी आई वह चौंकाने वाली है। प्रदेश के दोनों प्रमुख प्लास्टिक पार्कों में करोड़ों का बुनियादी ढांचा तो तैयार हो गया लेकिन रोजगार और निजी निवेश के मामले में नतीजे बेहद निराशाजनक रहे।
तामोट पार्क: 108 करोड़ खर्च, 274 नौकरियां
रायसेन जिले के तामोट में प्लास्टिक पार्क को साल 2013 में मंजूरी मिली थी। इस पूरे प्रोजेक्ट की लागत 108 करोड़ रुपए है। इसमें केंद्र सरकार ने 40 करोड़ रुपए का अनुदान दिया था।
यहां का सिविल (Civil) काम 100 फीसदी पूरा हो चुका है। साथ ही 33 भूखंड भी आवंटित हो चुके हैं। इतने बड़े खर्च के बाद भी अब तक सिर्फ 274 लोगों को ही रोजगार मिल पाया है। निजी निवेश का आंकड़ा महज 68 करोड़ 75 लाख रुपए तक ही पहुंचा है।
05 जून 2015 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज और तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस पार्क का भूमिपूजन किया था। उस वक्त दावा था कि यहां 100 से ज्यादा इकाइयां लगेंगी।
कहा गया था कि 20 हजार से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। लगभग 713 करोड़ रुपए का निजी निवेश आने की उम्मीद जताई गई थी। आज एक दशक बाद दावे और हकीकत का फासला साफ दिखता है।
बिलौआ पार्क: हालात और भी खराब
ग्वालियर के बिलौआ में बने प्लास्टिक पार्क की कहानी और भी निराशाजनक है। इस प्रोजेक्ट पर 68 करोड़ 72 लाख रुपए खर्च हुए हैं। इसमें केंद्र की 34 करोड़ 36 लाख रुपए की सहायता शामिल है।
यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) का काम भी 100 फीसदी पूरा हो चुका है। अब तक सिर्फ पांच प्लॉट ही आवंटित हुए हैं। निजी निवेश सिर्फ दो करोड़ 54 लाख रुपए तक सीमित रहा है और रोजगार का आंकड़ा अभी भी शून्य है।
साल 2016 के आसपास इस पार्क की घोषणा के वक्त दावा किया गया था कि यहां करीब 10 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। लगभग एक हजार करोड़ रुपए तक के निवेश और टर्नओवर (Turnover) की संभावनाएं जताई गई थीं। आज हालत यह है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार होने के बाद भी निजी कंपनियों ने यहां रुचि नहीं दिखाई है।
सरकारी खर्च, निजी बेरुखी
दोनों पार्कों की कहानी एक जैसी है। सरकारी पैसे से बुनियादी ढांचा तो खड़ा हो गया लेकिन निजी क्षेत्र आगे नहीं आया है। तामोट में लक्ष्य का 713 करोड़ निवेश की जगह सिर्फ 68 करोड़ 75 लाख रुपए आया है। बिलौआ में एक हजार करोड़ की जगह महज दो करोड़ 54 लाख रुपए ही आए।
यह सवाल अब जरूरी हो गया है कि सरकार ऐसे प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले जमीनी मांग और व्यावसायिक संभावनाओं का ठीक से आकलन क्यों नहीं करती है। लोकसभा में उठे इस सवाल ने मध्य प्रदेश की औद्योगिक नीति की असलियत उजागर कर दी है।
FAQ
- तामोट प्लास्टिक पार्क में कितना खर्च हुआ और कितना रोजगार मिला?
रायसेन जिले के तामोट प्लास्टिक पार्क की कुल लागत 108 करोड़ रुपए है। इसमें केंद्र सरकार ने 40 करोड़ रुपए का अनुदान दिया था। साल 2015 में भूमिपूजन के समय 20,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार देने और 713 करोड़ रुपए का निजी निवेश आने का दावा था। लेकिन लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक अब तक केवल 274 लोगों को रोजगार मिला है और निजी निवेश महज 68.75 करोड़ रुपए तक ही पहुंचा है। - बिलौआ प्लास्टिक पार्क में रोजगार की क्या स्थिति है?
ग्वालियर के बिलौआ में बने प्लास्टिक पार्क पर 68.72 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर पूरा होने के बाद भी केवल 5 प्लॉट आवंटित हुए हैं। निजी निवेश सिर्फ 2.54 करोड़ रुपए रहा है और अब तक एक भी व्यक्ति को रोजगार नहीं मिला है, यानी रोजगार का आंकड़ा शून्य है। जबकि शुरुआत में 10,000 रोजगार और 1,000 करोड़ रुपए तक के निवेश का दावा किया गया था। - मध्य प्रदेश के प्लास्टिक पार्क का मुद्दा लोकसभा में कैसे उठा?
रतलाम-झाबुआ से बीजेपी सांसद अनीता नागर सिंह चौहान ने लोकसभा में प्लास्टिक पार्कों की स्थिति पर सवाल पूछा था। इसके जवाब में सरकार की ओर से तामोट और बिलौआ दोनों पार्कों के ताजा आंकड़े पेश किए गए। इन आंकड़ों से साफ हुआ कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा फासला है।
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