एमपी पुलिस की जांच पर CID ने उठाए सवाल : FIR और विवेचना में हो रही गंभीर गलतियां

Sanjay Dhiman | May 03, 2026, 19:58 IST
Photograph: (the sootr)
CID ने एमपी पुलिस की जांच और FIR के तरीके पर सवाल उठाएं है। CID ने विशेष कानूनों के तहत गलत तरीके से FIR दर्ज होने पर रोक लगाने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।

News in Short

  • सीआईडी ने पुलिस को विशेष कानूनों के तहत गलत FIR दर्ज करने पर चेतावनी दी।
  • घरेलू हिंसा और माइनिंग जैसे केस में पुलिस सीधे विवेचना नहीं कर सकती है।
  • PMLA जैसे मामलों में सजा होने के बावजूद जांच का अधिकार पुलिस को नहीं है।
  • नियमों के उल्लंघन को अपराध मानकर केस दर्ज करना कानूनी रूप से पूरी तरह गलत है।
  • भोपाल-इंदौर कमिश्नर और सभी SP को कानूनी प्रक्रिया सुधारने के सख्त निर्देश दिए गए।

News in Detail

मध्य प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर खुद प्रदेश की सीआईडी (CID) ने उंगली उठाई है। हाल ही में पुलिस मुख्यालय भोपाल के अपराध अनुसंधान विभाग ने एक सर्कुलर जारी किया है। पत्र ने महकमे के भीतर हड़कंप मचा दिया है।



दरअसल, विधानसभा सत्र के दौरान कुछ ऐसे मामले सामने आए, जिनसे पुलिस की छवि पर सवाल खड़े हुए। पता चला है कि कई थानों में पुलिस अधिकारी विशेष कानूनों (Special Acts) की सही समझ नहीं रख पा रहे हैं। वे उन मामलों में भी सीधे FIR कर रहे हैं, जहां कानून उन्हें इसकी इजाजत नहीं देता।



विशेष कानून बनाम सामान्य कानून: कहां उलझ रही है पुलिस?

पुलिस मुख्यालय (PHQ) ने साफ कहा है कि हर अपराध में सीधे FIR दर्ज करना सही प्रक्रिया नहीं है। कुछ कानून ऐसे होते हैं जहां पुलिस के पास विवेचना का अधिकार ही नहीं होता। उदाहरण के तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) के केस में सजा तो 7 साल है, लेकिन इसकी जांच पुलिस नहीं करती। इसके लिए एक अलग एजेंसी बनी हुई है। पुलिस द्वारा इन मामलों में दखल देना कानूनन गलत माना गया है।



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इन बड़े कानूनों में FIR दर्ज करने से पहले रुकना होगा

सीआईडी ने कुछ खास कानूनों की लिस्ट जारी की है, जिनमें पुलिस को अपनी सीमाएं समझनी होंगी:



घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005: इसमें सीधे FIR नहीं होती, बल्कि पहले मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन जाता है।



दिव्यांग अधिकार अधिनियम, 2016: यहां पुलिस को पीड़ित को उसके कानूनी अधिकारों की जानकारी देनी होती है।



सहकारी समिति अधिनियम: बिना रजिस्ट्रार की लिखित मंजूरी के पुलिस कोई भी केस शुरू नहीं कर सकती।



GST और माइनिंग एक्ट: इनमें भी सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना सीधे एफआईआर दर्ज करना गलत है।



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क्या है 'परिवाद' और क्यों बढ़ रहा है कोर्ट का बोझ?

जब पुलिस गलत तरीके से केस दर्ज करती है, तो वह अदालत में टिक नहीं पाता। सीआईडी ने पाया कि कई बार पुलिस नियमों के उल्लंघन को ही अपराध मान लेती है। नियम और कानून में फर्क होता है। नियमों के उल्लंघन की जांच विभाग करता है, पुलिस नहीं। अगर पुलिस हर छोटे-मोटे नियम पर FIR करेगी, तो कोर्ट में केस का अंबार लग जाएगा। इसी वजह से अब फरियादियों को 'परिवाद' (Complaint Case) के जरिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।



पुलिस कमिश्नर और SP को सख्त हिदायत

भोपाल और इंदौर के पुलिस कमिश्नर सहित प्रदेश के सभी एसपी को यह निर्देश भेज दिए गए हैं। सीआईडी के विशेष पुलिस महानिरीक्षक ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में ऐसी गलतियां बर्दाश्त नहीं होंगी। पुलिसकर्मियों को ट्रेनिंग दी जाएगी कि वे भारतीय न्याय संहिता (BNS) और विशेष अधिनियमों के बीच के बारीक अंतर को समझें। इसका मुख्य उद्देश्य जनता को बेवजह की कानूनी पेचीदगियों से बचाना और असली अपराधियों पर नकेल कसना है।



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