हूटर पर सिर्फ 10 दिन की सख्ती क्यों? बाकी 355 दिन पुलिस की खामोशी पर सवाल
ऐसे समझें पूरा मामला
- 1 से 10 अगस्त तक पूरे प्रदेश में विशेष अभियान।
- अवैध हूटर, लाल-पीली बत्ती, फर्जी सरकारी स्टीकर पर कार्रवाई।
- हर जिले के एसपी को चेकिंग के निर्देश।
- 2024 और 2025 में भी ऐसे ही विशेष अभियान चल चुके हैं।
- सवाल यह कि अभियान खत्म होते ही सड़क पर फिर वही हूटर कैसे लौट आते हैं?
मध्य प्रदेश पुलिस ने एक बार फिर 1 अगस्त से 10 अगस्त तक अवैध हूटर, लाल-पीली बत्ती, फर्जी सरकारी स्टीकर और काली फिल्म लगी गाड़ियों के खिलाफ विशेष अभियान शुरू किया है। सवाल यह है कि जब यही गाड़ियां पूरे साल सड़कों पर खुलेआम दौड़ती हैं तो कार्रवाई सिर्फ 10 या 15 दिनों तक ही क्यों दिखाई देती है? क्या कानून सिर्फ विशेष अभियान के दौरान ही लागू होता है, या फिर बाकी दिनों में सिस्टम आंखें मूंद लेता है?
हर साल अभियान... फिर वही कहानी
प्रदेश पुलिस मुख्यालय ने 2024 में भी 1 मार्च से 15 मार्च तक 15 दिन का अभियान चलाया था। उस समय बड़े-बड़े दावे किए गए कि अवैध हूटर, वीआईपी स्टिकर और अमानक नंबर प्लेट पर सख्ती होगी। कई जगह चालान हुए और कुछ गाड़ियों से मौके पर हूटर भी उतरवाए गए।
इसके बाद 2025 में फिर 1 मार्च से 15 मार्च तक पूरे प्रदेश में दोबारा विशेष अभियान चला। सितंबर 2025 में भी सड़क सुरक्षा के नाम पर फिर चेकिंग कराई गई। अब 2026 में फिर वही अभियान शुरू हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल... कार्रवाई स्थायी क्यों नहीं?
अगर अवैध हूटर कानून का उल्लंघन है तो कार्रवाई पूरे साल क्यों नहीं होती? आम लोग बताते हैं कि होटलों, बाजारों, हाईवे और शहरों की सड़कों पर रोज ऐसे वाहन दिखाई देते हैं जिन पर अवैध हूटर और वीआईपी स्टिकर लगे होते हैं। कई बार पुलिस की मौजूदगी में भी ऐसे वाहन गुजर जाते हैं।
यहीं से सवाल उठता है कि क्या कार्रवाई सिर्फ विशेष अभियान तक सीमित है? क्या नियमित निगरानी की व्यवस्था कमजोर है? इस पर पुलिस विभाग को स्पष्ट जवाब देना होगा।
क्या विशेष अभियान सिर्फ सुर्खियां बटोरने के लिए?
हर साल 10 से 15 दिन की मुहिम चलती है। प्रेस नोट जारी होते हैं। तस्वीरें सामने आती हैं। चालान की संख्या बताई जाती है। लेकिन अभियान खत्म होते ही अवैध हूटर फिर सड़कों पर दिखाई देने लगते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह अभियान स्थायी समाधान है या केवल औपचारिक कार्रवाई?
जमीनी हकीकत क्या कहती है?
प्रदेश के कई शहरों में आज भी निजी गाड़ियों पर हूटर, फ्लैश लाइट, फर्जी सरकारी बोर्ड और वीआईपी स्टिकर दिखाई देते हैं। यदि नियमित रूप से प्रभावी कार्रवाई हो रही होती तो ऐसे वाहन खुलेआम सड़क पर नहीं चलते।
क्या रसूखदारों पर भी बराबर कार्रवाई होती है?
पुलिस का दावा है कि कानून सबके लिए समान है। हालांकि समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या प्रभावशाली लोगों के वाहनों पर भी उतनी ही सख्ती होती है जितनी आम लोगों पर? इस सवाल का जवाब पारदर्शी कार्रवाई के आंकड़ों और नियमित प्रवर्तन से ही मिल सकता है।
2017 में खत्म हुआ था वीआईपी कल्चर
केंद्र सरकार ने 2017 में लाल-पीली बत्ती और वीआईपी कल्चर पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद निजी वाहनों पर अवैध हूटर, फर्जी सरकारी स्टीकर और अमानक नंबर प्लेट का इस्तेमाल पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है।
अब नजर रहेगी 10 अगस्त तक
पुलिस मुख्यालय भोपाल ने सभी जिलों को निर्देश दिए हैं कि 10 अगस्त तक सघन चेकिंग कर नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई करें। अब देखने वाली बात होगी कि यह सख्ती सिर्फ अभियान तक सीमित रहती है या इसके बाद भी लगातार जारी रहती है।
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