मंत्री प्रतिमा बागरी जाति विवाद: हाईकोर्ट के आदेश के बाद गांवों में बजी डुगडुगी!
समझें क्या है पूरा मामला
- नगरीय विकास राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के एससी प्रमाण-पत्र पर विवाद गहराया है।
- राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने गांवों से साक्ष्य मांगे हैं।
- सतना जिले के वसुधा गांव में डुगडुगी बजाकर सूचना दी गई।
- मंत्री को 6 जुलाई को समिति के सामने पेश होना है।
- कांग्रेस नेता की याचिका पर हाईकोर्ट के आदेश से जांच शुरू हुई।
नगरीय विकास राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के एससी प्रमाण-पत्र पर विवाद गहराया है। राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने गांवों से साक्ष्य मांगे हैं। सतना जिले के वसुधा गांव में डुगडुगी बजाकर सूचना दी गई। मंत्री को 6 जुलाई को समिति के सामने पेश होना है। कांग्रेस नेता की याचिका पर हाईकोर्ट के आदेश से जांच शुरू हुई।
गांवों में डुगडुगी से सूचना
सतना जिले के नागौद तहसील में शुक्रवार को अनोखा नजारा दिखा। ग्राम वसुधा में डुगडुगी बजाकर सार्वजनिक सूचना दी गई। प्रशासन ने लोगों से एससी (SC – Scheduled Caste) प्रमाण-पत्र से जुड़े साक्ष्य मांगे हैं। यह प्रक्रिया राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति के निर्देश पर हुई।
शनिवार को यही प्रक्रिया दो और गांवों में दोहराई जाएगी। हरदुआ और मझोल गांव में भी डुगडुगी बजेगी। प्रशासन चाहता है कि जिनके पास दस्तावेज हों, वे समिति को दें। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी कराई गई है।
राजस्व निरीक्षक वृत्त डाम्हा को खास जिम्मेदारी दी गई है। उन्हें तीनों गांवों में सूचना का प्रकाशन कराना है। इसके बाद उन्हें पंचनामा रिपोर्ट भी सौंपनी होगी। यह रिपोर्ट समिति की जांच में अहम मानी जा रही है।
मंत्री को नोटिस, 6 जुलाई पेशी
राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी को औपचारिक नोटिस भेजा है। उन्हें 6 जुलाई 2026 को पेश होना है। यह पेशी अनुसूचित जाति विकास आयुक्त कार्यालय में होगी। वहां उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा।
समिति ने सतना कलेक्टर को भी विशेष निर्देश दिए हैं। कलेक्टर को नोटिस की तामील सुनिश्चित करनी है। इश्तहार की प्रतियां कई जगह चस्पा की गई हैं। इनमें तहसील कार्यालय नागौद और जनपद पंचायत कार्यालय शामिल हैं। संबंधित ग्राम पंचायतों के नोटिस बोर्ड पर भी सूचना लगाई गई है।
कांग्रेस नेता की हाईकोर्ट याचिका
यह पूरा विवाद एक याचिका से शुरू हुआ था। कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने हाईकोर्ट का रुख किया था। उन्होंने प्रतिमा बागरी की जाति को चुनौती दी थी। याचिका में गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
याचिका के अनुसार बागरी समुदाय क्षेत्र में एससी सूची में शामिल नहीं है। दावा किया गया कि प्रतिमा बागरी वास्तव में राजपूत या ठाकुर समुदाय से हैं। इसी आधार पर उनके प्रमाण-पत्र को अवैध बताया गया है।
गौरतलब है कि बागरी ने इसी प्रमाण-पत्र के दम पर चुनाव लड़ा था। उन्होंने सतना जिले की आरक्षित रैगांव सीट से जीत दर्ज की। बाद में उन्हें राज्य सरकार में मंत्री पद भी मिला। यही उपलब्धि अब विवाद की जड़ बन गई है।
जाति छानबीन की प्रक्रिया कैसे चलती है
जाति प्रमाण पत्र विवादों में यह प्रक्रिया आम है। शिकायत मिलने पर राज्य स्तरीय समिति जांच शुरू करती है। समिति दोनों पक्षों को साक्ष्य पेश करने का मौका देती है। इसमें दस्तावेज, गवाह और सामुदायिक जानकारी शामिल होती है।
गांव स्तर पर डुगडुगी बजाना इसी प्रक्रिया का पुराना तरीका है। इससे दूर-दराज के लोगों तक भी सूचना पहुंच जाती है। प्रशासन इसे पारदर्शी प्रक्रिया मानता है। हर कदम की वीडियोग्राफी और रिकॉर्ड रखा जाता है।
समिति की रिपोर्ट के बाद ही अंतिम फैसला हो पाएगा। यह फैसला हाईकोर्ट को भी भेजा जाएगा। तभी साफ होगा कि प्रमाण-पत्र वैध है या नहीं। तब तक मंत्री पद पर कोई असर नहीं बताया गया है।
हाईकोर्ट के निर्देश पर जांच तेज
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने छानबीन समिति को जांच कर रिपोर्ट देने को कहा। इसी आदेश के बाद समिति सक्रिय हुई। समिति ने सभी पक्षों को साक्ष्य देने का मौका देने की प्रक्रिया शुरू की।
शिकायतकर्ता, मंत्री प्रतिमा बागरी और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस भेजे गए हैं। गांवों में डुगडुगी भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। स्थानीय लोग चाहें तो जाति से जुड़े साक्ष्य समिति को दे सकते हैं।
अब सबकी नजरें 6 जुलाई की पेशी पर टिकी हैं। उस दिन समिति के सामने अहम दस्तावेज पेश किए जाएंगे। इस मामले का असर मध्यप्रदेश की सियासत पर भी पड़ सकता है। खासकर अनुसूचित जाति के आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर बहस तेज हो सकती है।
आगे क्या हो सकता है
अगर समिति की रिपोर्ट मंत्री के खिलाफ आती है, तो मामला और बड़ा हो सकता है। ऐसे मामलों में विधानसभा सदस्यता तक पर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि अभी यह सिर्फ जांच का चरण है। किसी भी पक्ष के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
रैगांव सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। ऐसे में इस विवाद का सीधा असर सीट की राजनीति पर भी पड़ सकता है। स्थानीय लोग भी इस मामले पर करीबी नजर रखे हुए हैं। आने वाले दिनों में और जानकारी सामने आने की उम्मीद है।
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