प्रमोशन में आरक्षण : एक्टिंग चीफ जस्टिस की बेंच ने मेंशनिंग स्वीकार की, दोबारा शुरू होगी सुनवाई

Neel Tiwari | Jun 30, 2026, 14:41 IST
प्रमोशन केस में फिर होगी सुनवाई
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित प्रमोशन में आरक्षण मामले में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया की डिवीजनल बेंच ने मामले की मेंशनिंग स्वीकार कर ली है, जिससे अब दोबारा सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • प्रमोशन में आरक्षण मामले की दोबारा सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है।
  • एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया की डिवीजनल बेंच ने मेंशनिंग स्वीकार की है।
  • सरकार ने सीनियरिटी लिस्ट तैयार करने सहित प्रमोशन की प्रक्रिया आगे बढ़ानी शुरू की है।
  • मामले में कोई लिखित स्थगन आदेश नहीं होने को सरकार का कानूनी आधार माना जा रहा है।
  • लाखों कर्मचारियों और हजारों रिक्त पदों पर इस सुनवाई का सीधा असर पड़ेगा।

मध्य प्रदेश के सबसे चर्चित और सबसे अधिक कर्मचारियों को प्रभावित करने वाले प्रमोशन में आरक्षण मामले में अब एक बड़ा मोड़ आ गया है। 17 फरवरी 2026 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की डिवीजनल बेंच द्वारा सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद से इस मामले में कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया था।



इसी बीच मुख्य न्यायाधीश बदल गए, डिवीजनल बेंच का स्वरूप भी बदल गया और मामला लंबे समय तक लंबित रहा। अब एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया की डिवीजनल बेंच ने इस मामले की मेंशनिंग स्वीकार कर ली है।



इससे लगभग तय माना जा रहा है कि अब इस बहुचर्चित मामले की दोबारा सुनवाई शुरू होगी। प्रदेशभर के लाखों कर्मचारियों की निगाहें अब इस सुनवाई पर टिक गई हैं, क्योंकि आने वाला हर आदेश उनके भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ है।



दूसरी ओर सरकार ने तेज की प्रमोशन की तैयारी

हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू होने की संभावना के बीच राज्य सरकार ने भी प्रशासनिक स्तर पर प्रमोशन की तैयारियां तेज कर दी हैं। विभिन्न विभागों को अधिकारियों और कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची (सीनियरिटी लिस्ट) तैयार करने के निर्देश दिए जा चुके हैं।



सूत्रों के अनुसार सरकार के विधिक सलाहकारों का मत है कि वर्तमान में प्रमोशन प्रक्रिया पर कोई स्पष्ट लिखित स्थगन आदेश लागू नहीं है। इसी आधार पर सरकार यह मानकर आगे बढ़ रही है कि, यदि मध्य प्रदेश लोक सेवा (पदोन्नति) नियम, 2025 के तहत आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाए जाते हैं तो वे स्वतः अवैध नहीं माने जाएंगे।



हालांकि सरकार भी इस बात से अवगत है कि इस दौरान न्यायालय में इस विषय पर फिर से सुनवाई होना तय है। अंतिम स्थिति अदालत के निर्णय से ही स्पष्ट होगी।



पुराना मौखिक आश्वासन बना था प्रमोशन रुकने की वजह

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि भी कम दिलचस्प नहीं है। जब यह मामला तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत की डिवीजनल बेंच के समक्ष लंबित था, तब महाधिवक्ता की ओर से न्यायालय को मौखिक रूप से आश्वस्त किया गया था कि, अंतिम निर्णय आने तक विभागीय पदोन्नति समितियों (DPC) की बैठकें आयोजित नहीं की जाएंगी।



इसी मौखिक आश्वासन के बाद से प्रदेश में प्रमोशन की प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से रुक गई थी। हालांकि इस संबंध में कोई औपचारिक लिखित स्थगन आदेश पारित नहीं हुआ था। अब जबकि बेंच बदल चुकी है और मामले की दोबारा सुनवाई शुरू होने जा रही है, सरकार इसी तथ्य को कानूनी आधार मानते हुए प्रशासनिक तैयारियां आगे बढ़ा रही है।



लाखों पदों और भर्तियों का भी सवाल

यह मामला केवल कर्मचारियों की पदोन्नति तक सीमित नहीं रह गया है। वर्षों से प्रमोशन नहीं होने के कारण विभिन्न विभागों में उच्च पद रिक्त नहीं हो पा रहे हैं। परिणामस्वरूप निचले पदों पर भी नई नियुक्तियों की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।



प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक प्रमोशन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी, तब तक पदों की श्रृंखला में रिक्तियां उत्पन्न नहीं होंगी। नई भर्तियां भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाएंगी।



यही कारण है कि यह मामला केवल लाखों शासकीय कर्मचारियों का नहीं बल्कि प्रदेश के हजारों बेरोजगार युवाओं का भी मुद्दा बन चुका है, जो लंबे समय से सरकारी नौकरियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।



लंबित फैसला और अब नई सुनवाई

प्रमोशन में आरक्षण मामले को लेकर पहले भी व्यापक चर्चा इसलिए हुई थी, क्योंकि 17 फरवरी 2026 को फैसला सुरक्षित रखा गया था। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 90 दिनों की अवधि भी बीत गई थी।



इस दौरान हाईकोर्ट की विभिन्न पीठों ने सैकड़ों रिजर्व मामलों में निर्णय सुनाए, लेकिन इस बहुचर्चित मामले में फैसला सामने नहीं आया। इसके बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा का सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त होना और डिवीजनल बेंच के सदस्य न्यायमूर्ति विनय सराफ का इंदौर स्थानांतरण भी चर्चा का विषय बना। अब नई डिवीजनल बेंच के समक्ष सुनवाई शुरू होने से यह मामला फिर न्यायिक प्रक्रिया में सक्रिय हो गया है।



अब पूरे प्रदेश की नजर अगली सुनवाई पर

प्रमोशन में आरक्षण विवाद अब केवल एक कानूनी याचिका नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे, कर्मचारियों के सेवा अधिकारों और भविष्य की सरकारी भर्तियों से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण मामला बन चुका है। लाखों कर्मचारी यह जानना चाहते हैं कि, उनकी वर्षों से अटकी पदोन्नति का रास्ता कब खुलेगा।



वहीं हजारों अभ्यर्थी इस उम्मीद में हैं कि प्रमोशन होने के बाद रिक्त होने वाले पदों पर नई भर्ती का रास्ता भी खुलेगा। अब जबकि एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया की डिवीजनल बेंच ने मामले की मेंशनिंग स्वीकार कर ली है, पूरे प्रदेश की निगाहें अगली सुनवाई पर टिक गई हैं।



माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में होने वाली कार्यवाही इस लंबे विवाद की दिशा और भविष्य दोनों तय कर सकती है।



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