राज्यसभा : कांग्रेस के पास संख्या ज्यादा, फिर भी चिंता! भाजपा 10 वोट की तलाश में

Ramanand Tiwari | Jun 08, 2026, 23:04 IST
Photograph: (the sootr)
मध्यप्रदेश में 18 जून को राज्यसभा चुनाव है। भाजपा ने तीसरी सीट पर महेश केवट को उतारा। भाजपा को दो सीट जीतने के बाद तीसरी के लिए 10 वोट और चाहिए। कांग्रेस के 63 प्रभावी वोट, लेकिन क्रॉस वोटिंग का डर बना हुआ है।

मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव ने अचानक रोमांचक मोड़ ले लिया है। विधानसभा में कांग्रेस के पास एक सीट जीतने लायक पर्याप्त विधायक हैं, जबकि भाजपा दो सीटें आसानी से जीत सकती है। इसके बावजूद दोनों दलों में बेचैनी बढ़ गई है। वजह है भाजपा का तीसरी सीट पर दांव और कांग्रेस के सामने अपने विधायकों को एकजुट रखने की चुनौती। अब लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि वोटों की सुरक्षा और राजनीतिक मैनेजमेंट की भी बन गई है।



राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और भाजपा का गणित


कांग्रेस के लिए असली चुनौती अब वोट बचाने की

संख्या बल के हिसाब से कांग्रेस की एक सीट लगभग सुरक्षित मानी जा रही है। लेकिन भाजपा के तीसरी सीट पर प्रत्याशी उतारने के बाद कांग्रेस की चिंता बढ़ गई है। पार्टी नेतृत्व को डर है कि यदि कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग करते हैं या मतदान के दौरान कोई अप्रत्याशित स्थिति बनती है तो उसका सीधा असर राज्यसभा की तीसरी सीट के नतीजे पर पड़ सकता है।



इसी वजह से प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व लगातार विधायकों के संपर्क में है। संगठन का पूरा फोकस अब अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने पर है।



भाजपा ने क्यों चला तीसरी सीट का दांव?

भाजपा के पास तीसरी सीट जीतने लायक संख्या नहीं है। दो सीटें जीतने के बाद उसके पास 48 वोट ही बचते हैं, जबकि जीत के लिए 58 वोट जरूरी हैं। यानी पार्टी को लगभग 10 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी।



राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने तीसरी सीट पर उम्मीदवार उतारकर चुनाव को सीधा मुकाबला बनाने की कोशिश की है। इससे विपक्षी खेमे पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बढ़ता है और क्रॉस वोटिंग की संभावनाओं पर भी नजर रहती है।



महेश केवट के नामांकन से बढ़ी हलचल

भाजपा समर्थित उम्मीदवार के रूप में महेश केवट का नामांकन दाखिल होने के बाद चुनावी समीकरण अचानक चर्चा में आ गए हैं। भाजपा की सक्रियता बढ़ी है तो कांग्रेस भी पूरी तरह सतर्क मोड में आ गई है।



राजनीतिक गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा अतिरिक्त वोट जुटा पाएगी या कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहेगी।



2016 जैसा माहौल फिर क्यों याद आ रहा?

राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक पर्यवेक्षक 2016 का उदाहरण भी याद कर रहे हैं। उस समय भी भाजपा ने पर्याप्त संख्या नहीं होने के बावजूद तीसरे उम्मीदवार के रूप में विनोद गोटिया को मैदान में उतारा था।



हालांकि तब भाजपा तीसरी सीट नहीं जीत सकी थी। लेकिन उस चुनाव ने यह जरूर साबित कर दिया था कि राज्यसभा चुनाव में अंतिम नतीजा सिर्फ संख्या बल से नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन और रणनीति से भी तय होता है।



तीसरी सीट पर सबकी नजर

फिलहाल गणित कांग्रेस के पक्ष में दिखाई देता है, लेकिन भाजपा ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। कांग्रेस के लिए चुनौती अपने वोट सुरक्षित रखना है, जबकि भाजपा की पूरी कोशिश अतिरिक्त समर्थन जुटाने पर रहेगी।


यही वजह है कि इस बार राज्यसभा चुनाव की सबसे बड़ी कहानी उम्मीदवारों से ज्यादा विधायकों की एकजुटता और वोटों की निगरानी बनती नजर आ रही है।



भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह रणनीति और संगठनात्मक योजना के आधार पर निर्णय लेती है। उन्होंने कहा कि भाजपा किसी भी चुनावी प्रक्रिया में बिना तैयारी के कदम नहीं उठाती, बल्कि हर फैसला सोच-समझकर और योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है।



आशीष अग्रवाल ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली में बड़ा अंतर है। भाजपा संगठन की मजबूती और स्पष्ट रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरती है, जबकि कांग्रेस अक्सर बिना ठोस योजना के राजनीतिक कदम उठाती है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी ने राज्यसभा चुनाव को लेकर व्यापक रणनीति तैयार की है और भाजपा अपने संख्याबल, संगठनात्मक क्षमता तथा राजनीतिक प्रबंधन के दम पर राज्यसभा की तीनों सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल होगी। भाजपा नेतृत्व को अपने विधायकों के समर्थन और चुनावी गणित पर पूरा भरोसा है।



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