MP राज्यसभा चुनाव: मोहन-हेमंत का कद और उमंग-जीतू की साख दांव पर
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने तीसरा प्रत्याशी उतारकर दांव खेला है।
- तीसरी सीट जीतने के लिए भाजपा के पास पर्याप्त बहुमत नहीं है।
- जीत से सीएम मोहन यादव और अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का दिल्ली में कद बढ़ेगा।
- कांग्रेस नेता जीतू पटवारी और उमंग सिंघार के लिए यह बड़ी राजनीतिक परीक्षा है।
- हार और जीत दोनों के अपने-अपने राजनीतिक नफा-नुकसान हैं।
तीसरे प्रत्याशी ने बदला पूरा खेल
मध्यप्रदेश में राज्यसभा (Rajya Sabha) चुनाव का रंग अचानक बदल गया है। भाजपा (Bharatiya Janata Party) ने तीसरा प्रत्याशी उतारकर सबको चौंका दिया है। यह दांव 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले एक तरह की मिनी अग्नि परीक्षा बन गया है। भाजपा के प्रदेश नेतृत्व के लिए भी यह फैसला आसान नहीं था।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तीसरी सीट जीतने के लिए भाजपा के पास बहुमत नहीं है। इसके बावजूद पार्टी ने यह जोखिम उठाया है।
BJP के लिए क्या है दांव
राजनीतिक विश्लेषक हरीश दिवेकर कहते हैं कि तीसरी सीट पर भाजपा को यदि जीत मिली तो राज्यसभा में पार्टी की ताकत बढ़ेगी। राजनीतिक तौर पर अगले ढाई साल कांग्रेस को कई मोर्चों पर हतोत्साहित करने के अवसर मिलेंगे। जनता को यह बताने का भी मौका होगा कि भाजपा की नीति-नियत से उनका वोट जीता।
साथ ही, यदि जीत मिली तो सीएम मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का दिल्ली में कद और ऊंचा होगा। यह जीत 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में बड़ा मनोबल देगी।
हारे तो BJP को क्या नुकसान
जीत न मिली तो सवाल उठना तय है। सबसे पहला सवाल यही होगा कि बहुमत न होते हुए भी तीसरी सीट पर क्यों उतरे। कांग्रेस इसे विक्टिम कार्ड की तरह इस्तेमाल करेगी। महिला सशक्तीकरण और भाजपा की रीति-नीति की बात करने वाली पार्टी की हार को विपक्ष भुनाने की कोशिश करेगा। लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ जाने वाली भाजपा की छवि बनाई जाएगी।
कांग्रेस के लिए उमंग-जीतू की परीक्षा
कांग्रेस (Indian National Congress) खेमे में यह चुनाव दो बड़े नेताओं के लिए सीधी परीक्षा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की साख इस चुनाव में दांव पर है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पटवारी के लिए अगले 10 दिन किसी चुनौती से कम नहीं हैं।
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार जिनेश जैन है कि यदि कांग्रेस जीती तो यह अपने आप में बड़ा संदेश होगा। बीस साल से विपक्ष में रहने के बावजूद मजबूती का प्रदर्शन होगा। कई मंचों पर यह गिनाया जाएगा कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ जाने वाली भाजपा का बुरा हश्र हुआ। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का प्रदेश नेतृत्व पर विश्वास बढ़ेगा और आगामी चुनावों में मदद मिलेगी।
हारे तो कांग्रेस को क्या नुकसान
बहुमत होते हुए भी हारना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका होगा। जनता के मन में सवाल उठेगा कि पार्टी अपने विधायकों को भी साथ नहीं रख पाई। निकाय चुनाव और विधानसभा चुनाव में जीत का भरोसा टूट सकता है। यह भी गिनाया जाएगा कि कांग्रेस एकजुट नहीं है और आपस में खींचतान जारी है।
राहुल गांधी की टीम दोनों नेताओं को इसी नजरिए से देख रही है। इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा के लोग कांग्रेस के खिलाफ प्रचार में इस्तेमाल कर सकते हैं।
2028 से पहले की असली तैयारी
यह राज्यसभा सीट सिर्फ एक संसदीय सीट नहीं है। यह 2028 विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों की रणनीतिक ताकत और कमजोरी को उजागर करने वाला आईना है। जो जीतेगा, उसके लिए आगे की राह आसान होगी। और जो हारेगा, उसे अपने घर को पहले संभालना होगा।
18 जून को होगा चुनाव
राज्यसभा चुनाव का पूरा शेड्यूल तय हो चुका है। नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 8 जून थी। नामांकन पत्रों की जांच आज यानी 9 जून को होगी और नाम वापसी की अंतिम तारीख 11 जून रखी गई है। मतदान 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा। उसी दिन शाम 5 बजे मतगणना भी होगी। यानी 18 जून की शाम तक तस्वीर साफ हो जाएगी।
मध्य प्रदेश विधानसभा में भाजपा विधायकों की संख्या के अनुसार दोनों सीटें पार्टी के खाते में आना लगभग तय माना जा रहा है।
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