एमपी में नियमितीकरण क्यों बना सरकार के गले की फांस? कचरे के बाद क्या पानी की समस्या झेलेगी जनता?
भोपाल से शुरू हुआ विरोध अब विदिशा, राजगढ़, खंडवा, शिवपुरी, भिंड और रायसेन जैसे जिलों तक पहुंच गया है। मामला सिर्फ शहरों की सफाई का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था से जुड़े उस सवाल का है, जो बार-बार सरकार के सामने खड़ा होता है। यह सवाल है कर्मचारियों के नियमितीकरण का।
सरकारें स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति से बचने के लिए संविदा, दैनिक वेतनभोगी और आउटसोर्स व्यवस्था का सहारा लेती रही हैं। लेकिन वर्षों तक इन्हीं कर्मचारियों से नियमित प्रकृति का काम लेने के बाद जब स्थायी नौकरी की मांग उठती है, तो सरकार के सामने नई मुश्किल खड़ी हो जाती है।
अब यही सवाल मध्यप्रदेश सरकार के सामने है। सफाईकर्मी नियमितीकरण और बेहतर वेतन की मांग को लेकर सड़कों पर हैं। दूसरी तरफ संविदा कर्मचारी भी चेतावनी देने लगे हैं कि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो पानी की सप्लाई तक रोकी जा सकती है।
पहले समझिए, आखिर मामला क्या है?
मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों में बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारी काम कर रहे हैं, जिन्हें नियमित सरकारी कर्मचारी का दर्जा हासिल नहीं है। इनमें दैनिक वेतनभोगी, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारी शामिल हैं। इन कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें न तो नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन मिलता है और न ही नौकरी की सुरक्षा व अन्य सुविधाएं मिलती हैं। इन्हीं मांगों को लेकर सफाईकर्मियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है। कई शहरों में कचरा उठाने और सफाई का काम प्रभावित हुआ है। त्योहार से ठीक पहले सफाई व्यवस्था ठप होने से नगरीय निकायों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
सफाईकर्मियों की चार बड़ी मांगें
- सरकारी कर्मचारी का दर्जा: नगरीय निकायों में कार्यरत सफाईकर्मियों को नियमित सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।
- अनुकंपा नियुक्ति: कर्मचारी की मृत्यु होने पर पात्र पति या पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ मिले।
- कम से कम 25 हजार रुपए वेतन: सफाईकर्मियों का न्यूनतम मासिक वेतन 25 हजार रुपए किया जाए।
- ठेका प्रथा समाप्त हो: सफाई व्यवस्था में ठेका प्रथा खत्म कर कर्मचारियों को नियमित किया जाए।
कर्मचारियों का कहना है कि जब उनसे सालभर लगातार काम लिया जा रहा है, तो रोजगार की व्यवस्था अस्थायी क्यों रखी जा रही है?
सफाईकर्मियों के आंदोलन का सबसे ज्यादा असर राजधानी भोपाल में दिखाई दे रहा है। यहां करीब 11 हजार कर्मचारी हड़ताल पर हैं। भोपाल के अलावा विदिशा, राजगढ़, खंडवा, शिवपुरी, भिंड और रायसेन में भी सफाईकर्मी हड़ताल में शामिल हैं।
सरकार की मुश्किल सिर्फ सफाईकर्मियों तक सीमित नहीं रह गई है। अब दूसरे संविदा कर्मचारी भी अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाने लगे हैं। इन कर्मचारियों की ओर से पानी की सप्लाई रोकने की चेतावनी दी जा रही है।
नियमितीकरण आखिर सरकार के गले की फांस क्यों?
इस पूरे विवाद की जड़ में एक बड़ा सवाल है। जब कर्मचारियों को दैनिक वेतन, संविदा या आउटसोर्स के आधार पर नियुक्त किया गया था, तो अब नियमितीकरण की मांग क्यों उठ रही है? सरकारी विभागों में संविदा और आउटसोर्स व्यवस्था अपनाने का उद्देश्य स्थायी नियुक्तियों से जुड़ी वित्तीय और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को सीमित रखना रहा है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब अस्थायी व्यवस्था के जरिए सालों तक स्थायी प्रकृति का काम कराया जाता है। एक तरफ सरकार को नियमित पदों, वेतन और सेवा लाभों से बढ़ने वाले वित्तीय बोझ की चिंता रहती है। दूसरी तरफ कर्मचारी सवाल उठाते हैं कि अगर काम स्थायी है, तो नौकरी अस्थायी क्यों?
यही विरोधाभास नियमितीकरण को बार-बार विवाद का विषय बना देता है। हालांकि, एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या नियुक्ति के समय इन कर्मचारियों को नियमित करने का कोई वादा किया गया था?
इस मामले को समझने के लिए द सूत्र ने आउटसोर्स संघर्ष मोर्चा के वासुदेव शर्मा से बातचीत की। वासुदेव शर्मा का आरोप है कि मौजूदा समस्या सरकार की उस नीति का नतीजा है, जिसके तहत धीरे-धीरे चतुर्थ श्रेणी के नियमित पदों को खत्म किया गया और उनकी जगह दैनिक वेतनभोगी व आउटसोर्स कर्मचारियों से काम लिया जाने लगा।
शर्मा के मुताबिक, दैनिक वेतनभोगी और आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति तथा सेवा शर्तों को लेकर स्पष्ट और एक समान व्यवस्था नहीं है। उनका दावा है कि कई दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को महज 4 से 5 हजार रुपए महीने पर काम करना पड़ता है। वहीं, आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति निजी एजेंसियों को दिए गए ठेकों के जरिए होती है। शर्मा का आरोप है कि ऐसे कई कर्मचारियों को पीएफ और दूसरी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने नियमित, संविदा और आउटसोर्स जैसी श्रेणियों को मान्यता दी है, जबकि दैनिक वेतनभोगी जैसे पुराने कर्मचारी संवर्गों को समाप्त कर दिया गया है।
5 नवंबर को बैठक हुई, लेकिन नहीं निकला समाधान
हड़ताल खत्म कराने के लिए सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच बातचीत की कोशिश भी हो चुकी है। 5 नवंबर को नगरीय प्रशासन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारी संघ के प्रतिनिधियों के बीच बैठक हुई। उम्मीद थी कि बातचीत से कोई रास्ता निकलेगा और सफाईकर्मी काम पर लौटेंगे। लेकिन बैठक बेनतीजा रही। दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी और कर्मचारियों ने हड़ताल जारी रखने का फैसला किया।
भोपाल की महापौर से नहीं मिल सका जवाब
इस मामले में द सूत्र ने भोपाल की महापौर मालती राय से भी संपर्क किया। पहली बार संपर्क करने पर उन्होंने व्यस्त होने की बात कही और कुछ देर बाद बात करने को कहा। हालांकि, दोबारा संपर्क करने पर उनसे बातचीत नहीं हो सकी। ऐसे में सफाई व्यवस्था बहाल करने और कर्मचारियों की मांगों का समाधान निकालने को लेकर नगर निगम की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आ सकी है।
अब सबसे बड़ा सवाल सरकार किसे दे प्राथमिकता?
इस आंदोलन ने सरकार के सामने सिर्फ प्रशासनिक ही नहीं, बल्कि नीतिगत सवाल भी खड़े कर दिए हैं। अगर कर्मचारियों को नियमित किया जाता है, तो सरकार पर वेतन और सेवा लाभों का स्थायी वित्तीय भार बढ़ सकता है। लेकिन अगर उनकी मांगों को नजरअंदाज किया जाता है, तो जरूरी सेवाएं प्रभावित होने और कर्मचारियों में असंतोष बढ़ने का खतरा है।