MP में सड़कें बनीं डेथ ट्रैप, मवेशियों के कारण एक साल में तीन गुना बढ़ीं मौतें
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश में मवेशियों से सड़क हादसे तेजी से बढ़े हैं।
- 8 महीने में 437 लोगों की जान जा चुकी है।
- भोपाल में मौतों का आंकड़ा एक साल में 3 गुना बढ़ा है।
- सुप्रीम कोर्ट कमेटी ऑन रोड सेफ्टी की बैठक हुई है।
- नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल फॉर्मूले पर भी चर्चा हुई है।
मध्य प्रदेश की सड़कों पर मवेशी अब बड़ा खतरा बन गए हैं। मवेशियों से टकराने या उन्हें बचाने की कोशिश में कई लोगों की जान जा रही है। साल 2026 के सिर्फ आठ महीनों में यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। पिछले साल के मुकाबले हादसे और मौतें दोनों तेजी से बढ़ी हैं।
437 मौतें 8 महीने में
प्रदेश में एक जनवरी से 31 अगस्त 2026 तक मवेशियों की वजह से हुए हादसों में 437 लोगों की मौत हो चुकी है। इसी दौरान 614 लोग घायल भी हुए हैं। यह आंकड़ा सिर्फ आठ महीनों का है, पूरे साल का नहीं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि साल के अंत तक यह संख्या और बढ़ सकती है।
भोपाल में मौतें 3 गुना
भोपाल शहर की स्थिति सबसे ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है। साल 2025 में पूरे 12 महीनों में भोपाल में मवेशियों की वजह से 12 लोगों की मौत हुई थी। लेकिन 2026 में सिर्फ 8 महीनों में ही यह आंकड़ा 36 तक पहुंच गया है। यानी भोपाल में मौतों का आंकड़ा एक साल में तीन गुना से ज्यादा बढ़ गया है।
घायल भी 18.1% ज्यादा
घायलों के मामले में भी तस्वीर चिंताजनक है। साल 2025 के पूरे 12 महीनों में मवेशियों की वजह से 520 लोग घायल हुए थे। जबकि 2026 में सिर्फ 8 महीने में ही घायलों की संख्या 614 पार कर गई है। यानी पिछले पूरे साल के मुकाबले 8 महीने में ही घायल संख्या 18.1 प्रतिशत ज्यादा हो गई है।
मंत्रालय में हुई बैठक
इस बढ़ते खतरे को देखते हुए सोमवार को मंत्रालय में एक अहम बैठक हुई। यह बैठक सुप्रीम कोर्ट कमेटी ऑन रोड सेफ्टी के सदस्य अध्यक्ष अभय भंडारी की अध्यक्षता में हुई। बैठक में सड़क हादसे कम करने की योजना पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों ने आंकड़ों को गंभीरता से लिया है।
दो अहम बिंदुओं पर चर्चा
बैठक में मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर चर्चा हुई। पहला बिंदु सड़कों पर घूमने वाले मवेशियों को लेकर था। दूसरा बिंदु प्रदेश में लागू होने वाले नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल फॉर्मूले पर था। इस फॉर्मूले के तहत बिना बीमा वाले वाहनों को ईंधन नहीं मिलेगा।
बिना योजना लागू करना मुश्किल
अधिकारियों का मानना है कि बिना ठोस योजना बनाए इन दोनों नियमों को लागू करना मुश्किल हो सकता है। इससे भविष्य में और बड़ी अव्यवस्था भी पैदा हो सकती है। पहले भी मवेशियों को सड़कों से हटाने के लिए समितियां बनाई जा चुकी हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर सख्ती नहीं होने से हालात नहीं सुधरे।
किन जिलों में सबसे ज्यादा मौत
राज्य के कुछ जिलों में मवेशियों से जुड़े हादसे सबसे ज्यादा हुए हैं। सतना जिला मौत के मामले में सबसे आगे है, जहां आठ महीने में 57 मौतें हुई हैं। रायसेन दूसरे नंबर पर है, जहां 46 लोगों की जान गई है। हरदा में भी 24 मौतें दर्ज हुई हैं, जबकि डिंडोरी के आदिवासी अंचल में 21 लोगों की जान गई है।
किन जिलों में आया सुधार
कुछ जिलों में हालात पिछले साल से बेहतर भी हुए हैं। सागर जिले में 2025 में 51 मौतें हुई थीं, जो अब घटकर सिर्फ 6 रह गई हैं। देवास में भी 2025 में 47 मौतें हुई थीं, जो अब घटकर 3 रह गई हैं। वहीं सीहोर जिले में मौतें कम हुई हैं, लेकिन घायलों की संख्या सबसे ज्यादा 63 दर्ज हुई है।
हादसों की बड़ी वजहें
सड़क हादसों के पीछे कई और वजहें भी सामने आई हैं। इस साल प्रदेश में तेज रफ्तार यानी ओवर स्पीडिंग के कारण 46 हजार 900 सड़क हादसे दर्ज हुए हैं। यह सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। शराब पीकर वाहन चलाने के मामलों में भी 1500 से ज्यादा गंभीर दुर्घटनाएं दर्ज हुई हैं। वहीं ड्राइविंग के दौरान मोबाइल फोन पर बात करने से 588 हादसे हुए हैं।
नो इंश्योरेंस-नो फ्यूल चुनौती
प्रदेश में नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल फॉर्मूला लागू करना आसान नहीं होगा। इसे लागू करने में कम से कम पांच बड़ी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। हजारों पेट्रोल पंपों पर एक साथ बीमा जांच होने से सर्वर धीमा पड़ सकता है। इससे पंपों पर वाहनों की लंबी कतारें लग सकती हैं।
पंप और खर्च की दिक्कत
इसके अलावा 4500 से ज्यादा पंपों पर हाई स्पीड कैमरे और नेटवर्क लगाना भी बड़ा खर्च मांगता है। यह खर्च कौन उठाएगा, अभी यह साफ नहीं है। कई वाहनों की बीमा जानकारी अपडेट नहीं होने से भी दिक्कत आ सकती है। दूरदराज के इलाकों में कमजोर इंटरनेट भी इस फॉर्मूले की राह में रुकावट बन सकता है। नियम से बचने के लिए कैन में पेट्रोल भरकर बेचने जैसी अवैध गतिविधियां भी बढ़ सकती हैं।
रायसेन में जीरो फैटैलिटी
हालांकि कुछ जिलों में हादसे रोकने की कोशिशें रंग भी ला रही हैं। रायसेन जिले में हादसे कम करने के लिए खास कार्यक्रम चलाया जा रहा है। यह प्रदेश का पहला जीरो फैटैलिटी डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रम है। अब इसका दायरा बढ़ाकर 6 से 9 जिलों तक किया जा रहा है। इससे उम्मीद है कि आने वाले महीनों में हादसों में कमी आएगी।
अभय भंडारी का वर्जन
सुप्रीम कोर्ट कमेटी ऑन रोड सेफ्टी के सदस्य अध्यक्ष अभय भंडारी ने बैठक में साफ कहा कि आंकड़े गंभीर स्थिति दिखा रहे हैं। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि मवेशियों से जुड़े हादसे रोकने के लिए ठोस योजना जल्द बनाई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले उसका पूरा असर परखना जरूरी है। जल्दबाजी में लिया गया फैसला उल्टा असर भी डाल सकता है।
आगे क्या होगा
आने वाले दिनों में सरकार इन दोनों मुद्दों पर विस्तृत योजना बना सकती है। मवेशियों को सड़कों से हटाने के लिए स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी तय की जा सकती है। नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल फॉर्मूले को चरणबद्ध तरीके से लागू करने पर भी विचार हो सकता है। फिलहाल सभी की नजर इस पर है कि सरकार कितनी जल्दी ठोस कदम उठाती है।
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