मध्य प्रदेश में महंगे डामर ने रोकी सड़कों की रफ्तार! करोड़ों के टेंडर अटके, अधूरे निर्माण से बढ़ी परेशानी
भोपाल से इंदौर तक निर्माण प्रभावित
प्रदेश में महंगे डामर का असर कई जिलों में दिखाई दे रहा है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, रीवा, सतना और सागर में निर्माण प्रभावित होने की रिपोर्ट हैं। नगरीय निकायों के साथ लोक निर्माण विभाग की परियोजनाएं भी प्रभावित हुई हैं। मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम के कार्यों पर भी इसका असर पड़ा है। पुराने अनुबंधों पर काम करने वाले ठेकेदार बढ़ी निर्माण लागत से परेशान हैं। जानकारी के अनुसार कई स्थानों पर निर्माण की रफ्तार धीमी कर दी गई। कुछ छोटे ठेकेदारों ने टेंडर मिलने के बावजूद काम रोक दिया है।
भोपाल में 30 करोड़ की मरम्मत प्रभावित
राजधानी भोपाल में क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत के लिए लगभग 30 करोड़ रुपए स्वीकृत हुए थे। टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद डामर की कीमतें बढ़ गईं। इससे ठेकेदारों के सामने निर्माण लागत की नई चुनौती खड़ी हो गई। ठेकेदारों ने विभागीय दरों में संशोधन की मांग उठाई। इससे स्वीकृत कार्यों की समयसीमा और भुगतान व्यवस्था प्रभावित हुई। भोपाल में अमृत 2.0 योजना के तहत सीवेज लाइन बिछाने का काम हुआ। इसके बाद सड़कों की मरम्मत भी प्रभावित हुई। पुराने भोपाल में मेट्रो निर्माण के लिए कई सड़कें खोदी गई थीं। इन सड़कों के डामरीकरण में भी देरी की रिपोर्ट सामने आई।
रायसेन से नर्मदापुरम तक काम धीमा
मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम की कई परियोजनाएं भी महंगी निर्माण सामग्री से प्रभावित हैं। रायसेन, सीहोर, बरेली और शुजालपुर से जुड़े कार्यों में देरी हो रही है। नर्मदापुरम, बाबई और सोहागपुर की परियोजनाओं में भी यही परेशानी सामने आई। अवधपुरी, भौंरी और मंडीदीप के सड़क निर्माण कार्य भी प्रभावित बताए गए हैं। ठेकेदारों ने डामर की खरीद और परिवहन खर्च बढ़ने को प्रमुख कारण बताया।
17 हजार 762 करोड़ की हाईवे परियोजनाओं पर असर
मई 2026 की रिपोर्ट में प्रदेश की 33 हाईवे परियोजनाओं का उल्लेख किया गया था। इनकी कुल लंबाई लगभग 1,085 किलोमीटर बताई गई थी। परियोजनाओं की कुल लागत 17 हजार 762 करोड़ रुपए थी। रिपोर्ट के अनुसार निर्माण की रफ्तार पर लगभग 25 प्रतिशत तक असर पड़ा था। इनमें जबलपुर आउटर रिंग रोड और इंदौर-हरदा मार्ग जैसी बड़ी परियोजनाएं शामिल थीं।
रतलाम-झाबुआ हाईवे का काम प्रभावित
रतलाम-झाबुआ स्टेट हाईवे का निर्माण भी डामर की महंगाई से प्रभावित बताया गया है। निर्माण कंपनी ने सड़क विकास निगम से अनुबंध राशि संशोधित करने की मांग की। कंपनी बढ़ी लागत के अनुसार भुगतान चाहती है। रतलाम नगर निगम की 21 सड़कों के निर्माण कार्य भी प्रभावित होने की जानकारी है। इन सड़कों का भूमिपूजन पहले ही हो चुका है। इसके बावजूद निर्माण की प्रगति और समयसीमा को लेकर परेशानी बनी हुई है।
डामर की कीमत एक लाख के पार
पिछले छह महीनों में डामर की कीमतों में भारी बढ़ोतरी बताई गई है। रतलाम के प्लांट संचालक वेंकटेश तिमन्ना ने कीमतों की जानकारी दी। उनके अनुसार पहले डामर की कीमत 45 से 55 हजार रुपए प्रति टन थी। अब अलग-अलग स्थानों पर कीमत 85 हजार से 1.02 लाख रुपए तक पहुंची है। इस बढ़ोतरी से पुराने अनुबंधों पर काम करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ी है। कच्चे तेल की कीमतें भी डामर की लागत प्रभावित करती हैं। इसके अलावा आपूर्ति और परिवहन खर्च का असर भी पड़ता है।
सरकार ने दी राहत, भुगतान पर सवाल
मध्य प्रदेश सरकार ने प्रभावित सड़क निर्माण कार्यों के लिए राहत व्यवस्था स्वीकृत की थी। मंत्रिपरिषद ने दस करोड़ रुपए से कम लागत वाले डामरीकरण कार्यों में मूल्य समायोजन मंजूर किया। एमपीआरडीसी की ईपीसी और एचएएम परियोजनाओं को भी राहत दी गई। इनमें मासिक आधार पर दर समायोजन की व्यवस्था स्वीकृत हुई थी।
यह राहत एक मई से 30 जून 2026 के बीच खरीदे गए डामर पर लागू थी। अब परियोजनाओं को मिले वास्तविक लाभ और भुगतान की स्थिति महत्वपूर्ण है। अक्टूबर तक कितने ठेकेदारों को भुगतान मिला, इसका समेकित आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
महंगे डामर के बीच गुणवत्ता की चुनौती
डामर की कीमत बढ़ने से निर्माण लागत प्रभावित होती है। हालांकि इससे निर्धारित गुणवत्ता मानकों में कोई छूट नहीं मिलती। निर्माण एजेंसियों को सामग्री की मात्रा और गुणवत्ता का ध्यान रखना होता है। सड़कों की मोटाई सहित अन्य तकनीकी मानकों का पालन भी जरूरी है। लागत बढ़ने पर सामग्री के वास्तविक उपयोग की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। नियमित गुणवत्ता परीक्षण से निर्माण कार्यों में अनियमितताओं की पहचान की जा सकती है। हालांकि मौजूदा महंगाई के कारण प्रदेशभर में घटिया निर्माण होने का समेकित प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
रीवा-मऊगंज में सामने आया था पुराना मामला
रीवा और मऊगंज में सड़क निर्माण से जुड़ा एक पुराना मामला सामने आया था। अप्रैल 2026 की रिपोर्ट में ईओडब्ल्यू की कार्रवाई का उल्लेख था। जांच एजेंसी ने 44 लोगों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया था। मामला वर्ष 2017 से 2021 के बीच कथित अनियमितताओं से जुड़ा था। इसमें घटिया डामर इस्तेमाल करने और फर्जी बिल बनाने के आरोप थे। जांच में लगभग 18.59 करोड़ रुपए के कथित अनियमित भुगतान की जानकारी सामने आई थी।
अधूरे निर्माण और भुगतान की निगरानी जरूरी
प्रदेश के नगरीय निकायों के सामने सड़क निर्माण की कई चुनौतियां हैं। केवल टेंडर जारी करना अब पर्याप्त नहीं है। विभागों को स्वीकृत बजट और वास्तविक निर्माण लागत का आकलन करना होगा। निर्धारित समयसीमा में काम पूरा कराने की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। जहां महंगाई से निर्माण धीमा हुआ है, वहां संशोधित कार्ययोजना जरूरी हो गई है। दर संशोधन और भुगतान के साथ गुणवत्ता परीक्षण भी प्रभावी रखना होगा।
प्रदेश में प्रभावित परियोजनाओं की वास्तविक संख्या का पूरा विवरण फिलहाल उपलब्ध नहीं है। लंबित भुगतान के समेकित आंकड़े भी सामने नहीं आए हैं। ऐसे में निर्माण की प्रगति और विभागीय भुगतान के रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे। गुणवत्ता जांच की रिपोर्ट से भी संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सकेगी।