सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष प्रताप करोसिया की सुविधाएं वापस लेने... दो अधिकारियों ने लिखी चिट्ठी
मध्यप्रदेश राज्य सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष प्रताप करोसिया को लेकर आयोग की सचिव बबीता मरकाम ने ही पत्र लिख दिया है। संचालनालय मध्यप्रदेश नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के लैटरपेड पर यह पत्र प्रताप करोसिया को ही लिखा गया है।
इसमें साल 2008 के नियमों का हवाला देकर मरकाम ने लिखा कि आपकी नियुक्ति 15 अप्रैल 2023 को हुई थी। नियम के तहत तीन साल या शासन द्वारा मनोनयन वापस लेने तक यह वैध रहती है।
यह समय पूरा हो गया है इसलिए राज्य शासन के नियमानुसार आपको दी गई सभी सुविधाएं समाप्त हो जाती है।
करोसिया ने हाईकोर्ट से लिया स्टे
करोसिया ने इस पत्र के आने के बाद इसे नियमविरुद्ध बताते हुए इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें मध्यप्रदेश शासन नगरीय प्रशासन विभाग के साथ ही आयुक्त नगरीय प्रशासन व बबीता मरकाम को भी पक्षकार बनाया गया है। हाईकोर्ट ने मरकाम की इस चिट्ठी पर स्टे दे दिया है। साथ ही सभी पक्षकारों से जवाब मांगा है।
करोसिया ने की कार्रवाई की मांग
करोसिया ने इस संबंध में सीएम मोहन यादव को भी पत्र लिखा है और मामले की जानकारी दी है। इसमें उनकी नियुक्ति के पत्र का भी हवाला दिया गया है।
शासन द्वारा जारी 15 अप्रैल 2023 के नियुक्ति पत्र में साफ लिखा है कि करोसिया की नियुक्ति पद ग्रहण करने की तिथि से अगले आदेश तक रहेगी।
यह नियुक्ति शासन की अनुशंसा पर राज्यपाल द्वारा होती है। वहीं कैबिनेट मंत्री स्तर की नियुक्ति को लेकर बिना शासन की मंजूरी के पत्र लिखा गया। इसे लेकर करोसिया ने अपर आयुक्त शिशिर गेमावत और सहायक संचालक व सचिव बबिता मरकाम को निलंबित करने की मांग की है।
जिस आदेश का हवाला दिया वह तो निरस्त हो चुका
बबीता मरकाम ने साल 2008 के राज्य शासन के आदेश का हवाला दिया है। इसके तहत नियुक्ति तीन साल तक या शासन द्वारा नियुक्ति रद्द करने तक, जो पहले हो जाए, रहती है। इस संबंध में शासन ने ही अन्य आदेश दिए हुए हैं कि मनोनयन वापस लेने तक यह नियुक्ति मान्य रहेगी।
यानी मध्य प्रदेश शासन को ही नियुक्ति बनाए रखने या सुविधाएं खत्म करने का अधिकार है। ऐसे में अपर आयुक्त गेमावत और सहायक संचालक मरकाम द्वारा यह चिट्ठी अपने स्तर पर ही करोसिया को जारी कर दी गई।
अधिकारियों को सबक मिले
करोसिया ने सीएम को लिखा कि इनके द्वारा राज्य शासन के विरुद्ध कदम उठाया गया है। ऐसे में सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि इस तरह से अवैधानिक फैसले लेने पर उन्हें सबक मिल सके।
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