एमपी में कागजों पर सुधर गए पांच हजार स्कूल, जमीनी हकीकत ने खोली मंत्री के दावों की पोल

Aman Vaishnav | Oct 23, 2026, 12:03 IST
एमपी के सरकारी स्कूलों में टपकती छतें और दरकी दीवारें आज भी मासूम बच्चों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनी हुई हैं।
मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों की खराब हालत को लेकर स्कूल शिक्षा विभाग के दावों पर सवाल उठ रहे हैं। विधानसभा में विभाग ने दो अलग-अलग जवाब दिए हैं। दोनों जवाबों में आंकड़े मेल नहीं खा रहे हैं। कागजों में पांच महीने के भीतर हजारों जर्जर स्कूलों की हालत सुधर गई। दूसरी तरफ कई स्कूलों की इमारतें अब भी खराब हैं। बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।

5 महीने में कैसे बदला बयान?

फरवरी 2026 के बजट सत्र में स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह (School Education Minister Rao Uday Pratap Singh) ने एक सवाल का जवाब दिया था। उन्होंने बताया था कि प्रदेश में 5 हजार 735 सरकारी स्कूल भवन जर्जर हैं। इसके अलावा 1,700 से ज्यादा स्कूलों में शौचालय भी नहीं हैं।



पांच महीने बाद जुलाई 2026 के मानसून सत्र में मंत्री का जवाब बदल गया। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में अब एक भी सरकारी स्कूल जर्जर नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि महज पांच महीने में हजारों स्कूल कैसे ठीक हो गए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि इतने कम समय में सभी जर्जर भवनों की हालत बदल गई?



बजट स्वीकृतियों की हकीकत

विभाग का कहना है कि उन्होंने नए भवनों और अतिरिक्त कमरों की मंजूरी दी है। दूसरी ओर आंकड़े बताते हैं कि स्वीकृतियां काफी कम थीं।



  • वर्ष 2026-27: क्षतिग्रस्त भवनों की जगह 840 स्कूलों में नए भवनों को मंजूरी दी गई।
  • पिछले 2 साल: 230 भवनविहीन स्कूलों के लिए नए भवनों की स्वीकृति मिली।
  • वर्ष 2025-26: 369 हाई और हायर सेकंडरी स्कूलों में 1,179 अतिरिक्त कक्षों को मंजूरी दी गई।
  • वर्ष 2026-27: 56 स्कूलों के लिए 222 अतिरिक्त कक्ष स्वीकृत किए गए।

इन सभी स्वीकृतियों को जोड़कर भी यह समझ पाना मुश्किल है कि 5 हजार 735 जर्जर भवनों की समस्या महज 5 महीने में कैसे हल हो गई।



आज भी नए भवन, शौचालय निर्माण की जरूरत

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य शिक्षा केंद्र के आधिकारिक पोर्टल में आज भी 5 हजार 770 स्कूलों में नए भवन, बड़ी मरम्मत या शौचालय निर्माण की जरूरत दर्ज है। यानी देखा जाए तो फरवरी के आंकड़े (5,735) से भी 35 स्कूल ज्यादा खराब हालत में हैं। जमीनी स्तर पर बच्चे टपकती छतों, फटी हुई दीवारों और किचन शेड के नीचे बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं।



जमीनी हकीकत के उदाहरण

  • बैतूल (रिंगढाना): यहां स्कूल परिसर का एक हिस्सा ढह चुका है। मुख्य बिल्डिंग की छत और फर्श पर गहरी दरारें आ चुकी हैं।
  • बारिश में झरने जैसी बहती छत: कई स्कूलों की दीवारों में भारी सीलन है। छत से पानी झरने की तरह बहता है। इससे बच्चों को बेहद परेशानी होती है।
  • सीहोर (खिड़ियाकुर्मी शाला): यहां स्कूल की खिड़कियां तक गायब हैं। बीआरसी मणिशंकर शर्मा के अनुसार यह भवन जर्जर घोषित है। यहां तक कि पूर्व प्राचार्य मरम्मत के लिए आए 1.50 लाख रुपए डकार गए।

विभाग का क्या कहना है?

इस पूरे विवाद पर लोक शिक्षण संचालनालय आयुक्त अभिषेक सिंह का कहना है कि प्रदेश में 79 हजार प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय हैं। विभाग में लगातार सुधार का काम चलता रहता है। इसलिए आंकड़े हर महीने बदलते रहते हैं। जो भवन पहले खराब थे, उनमें सुधार कराया गया है। अब जो नए मामले सामने आ रहे हैं उनमें भी काम कराया जाएगा।



पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार को घेरा

इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा है कि मेरी मांग है कि लीपापोती करने की जगह स्कूलों की हालत में तुरंत सुधार किया जाए। साथ ही बच्चों के जीवन की रक्षा की जाए।



एमपी में कागजों पर सुधर गए पांच हजार स्कूल, जमीनी हकीकत ने खोली मंत्री के दावों की पोल
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