एमपी में स्कूली शिक्षा का हाल: कहीं एक टीचर के भरोसे पूरा स्कूल, तो कहीं 10वीं के बाद बच्चे गायब
नीति आयोग की रिपोर्ट स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया में मध्य प्रदेश की स्कूली शिक्षा की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आई हैं।
एक तरफ जहां मध्यप्रदेश ने पिछले 10 सालों में प्राथमिक स्तर पर बच्चों की ड्रॉपआउट दर 10.14% से घटाकर अब पूरी तरह से शून्य कर दी है। वहीं दूसरी ओर सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को 12वीं तक स्कूल में बनाए रखना है।
इस समस्या के तीन मुख्य संकेत सामने आए हैं।
- 9वीं-10वीं में ड्रॉपआउट दर 16.8% है। यानी हर 100 में से 17 बच्चे 10वीं से पहले पढ़ाई छोड़ देते हैं। ये आंकड़ा देश के सबसे खराब राज्यों में 8वें स्थान पर है।
- 10वीं के बाद 31% बच्चे 11वीं तक नहीं पहुंच पाते हैं। राज्य की ट्रांजिशन दर 68.9% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 75.1% है। ये सबसे खराब राज्यों में 9वें स्थान पर है।
- मध्यप्रदेश का जीईआर सिर्फ 45% है। मतलब कि 11वीं-12वीं की उम्र वाले हर 100 बच्चों में से सिर्फ 45 बच्चे ही स्कूल में नामांकित हैं।
शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की बड़ी कमी
मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की बड़ी कमी देखने को मिली है। राज्य के सरकारी स्कूलों में कुल 52 हजार 19 पद खाली हैं। इनमें से 47 हजार 122 पद सिर्फ प्राथमिक स्कूलों के हैं। यानी रिक्तियों का करीब 90% हिस्सा प्राइमरी स्कूलों में है।
शिक्षक की कमी के मामले में मध्यप्रदेश, बिहार (दो लाख 77 हजार ), झारखंड (99 हजार 565) और पश्चिम बंगाल (77 हजार 798) के बाद चौथे नंबर पर है।
एक शिक्षक चला रहा हजारों स्कूल
प्रदेश में सात हजार 217 ऐसे स्कूल हैं जहां पूरा स्कूल सिर्फ एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहा है। इन स्कूलों में दो लाख 29 हजार से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ 463 ऐसे स्कूल हैं जहां एक भी छात्र नहीं है, लेकिन वहां 223 शिक्षक तैनात हैं।
दूसरे राज्यों के मुकाबले एमपी में शिक्षक संकट ज्यादा गंभीर है। महाराष्ट्र में कुल आठ हजार 979 पद खाली हैं। उच्च माध्यमिक स्तर पर सिर्फ 65 पद रिक्त हैं। हरियाणा और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी रिक्तियां एमपी से काफी कम हैं।
वहीं राजस्थान में कुल रिक्तियां कम हैं, लेकिन उच्च माध्यमिक स्तर पर 14 हजार 949 पद खाली हैं। यानी वहां विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी ज्यादा है।
स्कूली शिक्षा की दो बड़ी कमजोरियां
नीति आयोग की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश की स्कूली शिक्षा की दो बड़ी कमजोरियां सामने आई हैं।
- बच्चों की सीखने की क्षमता बड़ी कक्षाओं तक पहुंचते-पहुंचते घट रही है।
- शिक्षकों की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।
2024 के अनुसार तीसरी कक्षा के 66% बच्चे भाषा सही तरीके से समझ पा रहे हैं, जो राष्ट्रीय औसत 64% से बेहतर है। गणित में भी बच्चों ने 62% अंक हासिल किए हैं।
जैसे-जैसे बच्चे 9वीं तक पहुंचते हैं स्थिति बिगड़ने लगती है। भाषा समझने वाले बच्चों का प्रतिशत घटकर 52% हो जाता है। गणित में सिर्फ 36% बच्चे ही दक्ष पाए जाते हैं। यानी 64% बच्चे बुनियादी सवाल हल करने में कमजोर हैं।
डिजिटल सुविधाओं की कमी भी एक बड़ी वजह है। प्रदेश के सिर्फ 45.7% स्कूलों में इंटरनेट और 19.6% स्कूलों में स्मार्ट क्लास की सुविधा है। स्मार्ट क्लास का राष्ट्रीय औसत 30.6% है।
शिक्षकों की गुणवत्ता पर उठ रहे सवा
रिपोर्ट में शिक्षकों की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता जताई गई है। साथ-ई प्रोजेक्ट (SATH-E (Sustainable Action for Transforming Human Capital-Education) के तहत मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के कई शिक्षक अपने ही विषयों के टेस्ट में 60-70% अंक भी नहीं ला सके।
इसका कारण शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों में सुविधाओं की कमी, बीएड में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग का अभाव और नियमित ट्रेनिंग न मिलना है। शिक्षक अपने ड्यूटी के 14% हिस्से को गैर-शैक्षिक कामों जैसे चुनाव, सर्वे, रिकॉर्ड और मिड-डे मील में खर्च करते हैं।
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