जीते-जी अपनी तेरहवीं कर रहा बुजुर्ग, कार्ड पर लिखा- हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से एक ऐसी खबर आई है जिसे सुनकर हर कोई दंग है। आमतौर पर हम सुनते हैं कि किसी इंसान की मौत के बाद उसकी मृत्यु भोज या तेरहवीं का आयोजन होगा है।
वहीं शिवपुरी के करैरा क्षेत्र में एक बुजुर्ग ने इस परंपरा को ही पलट दिया है। यहां के हाजीनगर गांव में रहने वाले कल्याण सिंह पाल अपनी मौत से पहले ही अपनी तेरहवीं मना रहे हैं।
कल्याण सिंह ने बाकायदा इसके लिए निमंत्रण पत्र छपवाए हैं। साथ ही उन्हें अपने रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों में बांट दिया है। यह मामला अब सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है।
कार्ड पर लिखा अपना दर्द
कल्याण सिंह ने जो कार्ड छपवाया है, उसकी शुरुआत में ही उन्होंने अपनी आपबीती बयां कर दी है। उन्होंने कार्ड पर मशहूर फिल्मी पंक्तियां लिखवाई हैं।
ये शब्द साफ बताते हैं कि बुजुर्ग का मन अपने परिवार से पूरी तरह टूट चुका है। किसी व्यक्ति को सबसे ज्यादा अपनों के सहारे की जरूरत होती है। इसके बाद भी यदि सिर्फ बेरुखी मिलती है तो आदमी ऐसे ही कदम उठाने पर मजबूर हो जाता है।
आखिर क्यों लिया इतना बड़ा फैसला?
जब लोगों ने कल्याण सिंह से पूछा कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, तो उनका जवाब सुनकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं। उन्होंने बेबसी और नाराजगी के साथ कहा कि अब इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है।
बुजुर्ग का मानना है कि जिस परिवार ने जीते-जी उनकी देखभाल नहीं की, वे उनके मरने के बाद उनकी अंतिम रस्में या तेरहवीं क्या ही करेंगे। उन्हें डर है कि उनकी मौत के बाद शायद कोई उन्हें याद भी न करे।
इसके अलावा उनकी आत्मा की शांति के लिए कोई भोज न या नदे। इसलिए उन्होंने तय किया कि वे अपने सामने ही अपनी समाज बिरादरी को खाना खिलाएंगे और विदा लेंगे।
पारिवारिक कलह और अकेलेपन की मार
गांव के लोगों का कहना है कि कल्याण सिंह पाल काफी समय से अपने परिवार के झगड़ों और अपनों के खराब व्यवहार से परेशान थे। उनके बच्चे या परिजन उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं कर रहे थे।
इसी बढ़ती दूरी और अकेलेपन की वजह से उन्होंने यह कठोर फैसला लिया है। पूरे गांव में इस जीवित तेरहवीं को लेकर चर्चा भी है। वहीं लोग दुखी भी हैं कि एक बुजुर्ग को ऐसा रास्ता चुनना पड़ा है।
समाज की गिरती संवेदनाओं पर एक सवाल
यह मामला सिर्फ एक बुजुर्ग के व्यक्तिगत फैसले का नहीं है। यह हमारे समाज के बदलते नजरिए पर भी एक बड़ा सवाल है।
- क्या हम अपने बुजुर्गों को वह मान-सम्मान दे पा रहे हैं जिसके वे हकदार हैं?
- क्या आज के दौर में रिश्ते सिर्फ मतलब के रह गए हैं?
- कल्याण सिंह का यह कदम बताता है कि आज के समय में बुजुर्ग अपने ही घर में कितने अकेले और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
ये खबर क्यों जरूरी है?
इस घटना का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। यह खबर उन परिवारों के लिए एक आईना है जो अपने बुजुर्गों को बोझ समझते हैं। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि यदि एक पिता या दादा को जीते-जी अपनी तेरहवीं करनी पड़ रही है, तो कहीं न कहीं हमारी सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक संस्कार हो रहे हैं।
इससे लोगों में बुजुर्गों की देखभाल के प्रति जागरूकता बढ़ सकती है। साथ ही यह प्रशासन के लिए भी एक संकेत है कि सीनियर सिटीजन्स की मानसिक स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है।
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