एमपी का बड़ा शराब घोटाला : क्या सोम डिस्टिलरी ने लगाया 920 करोड़ का चूना? CBI-ED जांच की मांग
मध्य प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में आजकल एक ही चर्चा है-920 करोड़ का कथित नकली परमिट घोटाला। यह मामला केवल पैसों का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की साख का भी है। देपालपुर की अदालत के एक आदेश ने सोम डिस्टिलरीज के खिलाफ गंभीर आरोपों की परतें खोल दी हैं। शराब के धंधे में टैक्स चोरी कोई नई बात नहीं है। लेकिन यहां आरोप एक-दो करोड़ का नहीं, बल्कि पूरे 920 करोड़ का है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह खेल परमिट के नाम पर खेला गया। हर ट्रक के पीछे हजारों रुपयों की सरकारी ड्यूटी की हेराफेरी की गई। अब सवाल यह है कि आखिर सरकारी खजाने में सेंध लगी कैसे? क्या इसमें आबकारी विभाग के बड़े अफसर भी शामिल थे?
कैसे हुआ 920 करोड़ का यह खेल?
आबकारी विशेषज्ञों ने इस घोटाले की गणित को बहुत बारीकी से समझाया है। उन्होंने एक ट्रक को आधार मानकर पूरी गणना तैयार की है। बताया जा रहा है कि एक परमिट का मतलब एक ट्रक होता है। हर ट्रक में शराब के लगभग 1200 बॉक्स भरे होते हैं। 'ब्लू चिप व्हिस्की' की कीमत के आधार पर टैक्स का हिसाब लगाया गया।
प्रति बॉक्स करीब 893 रुपए की मूल कीमत मानी गई थी। इस पर आयकर, वैट (VAT) और भारी-भरकम ड्यूटी लगनी थी। अगर सरकारी आंकड़ों को देखें, तो प्रति बॉक्स ड्यूटी 3304 रुपए है। इस हिसाब से एक ट्रक पर करीब 40 लाख की ड्यूटी बनती है। ऐसे 2203 परमिटों का इस्तेमाल कथित रूप से गलत तरीके से किया गया। कुल मिलाकर यह राशि 9,20,66,01,360 रुपए यानी करीब 920 करोड़ पहुंचती है।
कथित घोटाला: टैक्स और ड्यूटी की गणना
| मद (Item) | दर (Rate) | प्रति बॉक्स राशि (₹) | प्रति परमिट राशि (1200 बॉक्स) (₹) |
| आयकर (Income Tax) | 2% | ₹17.86 | ₹21,432 |
| परिवहन शुल्क (Transport Fee) | 8% | ₹71.44 | ₹85,728 |
| वैट (VAT) | 10% | ₹89.30 | ₹1,07,160 |
| एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) | — | ₹3,304.00 | ₹39,64,800 |
| कुल योग (Total) | ₹3,482.60 | ₹41,79,120 |
मुख्य बिंदु:
- एक परमिट की कीमत: सरकारी खजाने के हिसाब से एक परमिट (यानी एक ट्रक) पर कुल ₹41,79,120 का राजस्व बनता है।
- कुल घोटाला: इसी गणित के आधार पर 2203 परमिटों का कुल आकलन लगभग 920 करोड़ रुपए लगाया गया है।
जांच के घेरे में बड़े साहब और सरकारी सिस्टम
इतने बड़े घोटाले की खबर आते ही प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। लोग पूछ रहे हैं कि इतने सालों तक विभाग क्या कर रहा था? क्या बड़े आबकारी अफसरों को इस खेल की भनक तक नहीं थी? विशेषज्ञों ने अब तत्कालीन आबकारी आयुक्त और प्रमुख सचिव की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
बिना सरकारी मिलीभगत के इतना बड़ा फर्जीवाड़ा संभव नहीं जान पड़ता है। इसीलिए अब इस मामले में कड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने की मांग है। आम जनता का पैसा इस तरह लुटाया जाना लोकतंत्र के लिए घातक है। अब सबकी नजरें सरकार के अगले कदम और जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।
CBI और ED से जांच की मांग
आबकारी क्षेत्र के जानकारों का एक समूह अब आर-पार की लड़ाई लड़ रहा है। वे जल्द ही दिल्ली जाकर CBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सबूत सौंपेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती। इसलिए केंद्रीय एजेंसियों का दखल देना अब बेहद जरूरी हो गया है।
ED इस बात की जांच करेगी कि यह पैसा कहां गया और कैसे खपाया गया। मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से भी इस केस की जांच की जा सकती है। यदि यह आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह देश का बड़ा घोटाला होगा। इससे कई रसूखदार सफेदपोश नेताओं और अफसरों की नींद उड़ना तय है।
निष्कर्ष: सुशासन की कसौटी पर मध्य प्रदेश सरकार
920 करोड़ का यह घोटाला मध्य प्रदेश की छवि पर एक बड़ा दाग है। प्रशासन को चाहिए कि वह पारदर्शिता के साथ इस मामले की जांच कराए। जब तक बड़े दोषियों को सजा नहीं मिलेगी, सिस्टम में सुधार नहीं आएगा। प्रदेश की जनता चाहती है कि उनके टैक्स का पैसा विकास में लगे। अब देखना होगा कि जांच एजेंसियां इस मकड़जाल को कब तक सुलझा पाती हैं।
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