ESB भर्ती में ST आरक्षण पर विवाद, सिर्फ तीन जनजातियों को मिले लाभ पर बवाल
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला
- गोंड और प्रधान समुदाय के पांच लोगों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की है।
- चुनौती ESB की आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती 2026 के नियमों को दी गई है।
- याचिका में दावा है कि तीन जनजातियों को विशेष लाभ दिया गया है।
- इससे अन्य अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित पद नहीं बचेंगे, ऐसा याचिका में कहा गया है।
- हाई कोर्ट ने सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 17 अगस्त के बाद होगी।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि ESB की प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती 2026 के नियम से सहरिया, बैगा और भारिया को विशेष लाभ मिलेगा। जबकि गोंड, प्रधान समेत अन्य अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित पद प्रभावी रूप से खत्म हो जाएंगे। हाईकोर्ट ने सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।
ESB भर्ती में ST आरक्षण नियम पर खड़ा हुआ विवाद
मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति आरक्षण को लेकर नई कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। कर्मचारी चयन मंडल की आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती परीक्षा 2026 के एक नियम को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इस नियम से कुछ चुनिंदा जनजातियों को सीधा लाभ मिलेगा। वहीं गोंड, प्रधान समेत अन्य जनजातियों के लिए आरक्षण का लाभ लगभग समाप्त हो जाएगा।
मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस विवेक कुमार सिंह की अदालत में हुई। कोर्ट ने राज्य सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। सभी से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा गया है। अब मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी।
गोंड और प्रधान समुदाय के उम्मीदवार पहुंचे कोर्ट
यह याचिका अनुसूचित जनजाति वर्ग के पांच लोगों ने दायर की है। इनमें चार गोंड और एक प्रधान समुदाय से हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस रूपराह ने पक्ष रखा। उनके साथ अधिवक्ता मुस्कान आनंद भी अदालत में उपस्थित रहीं। याचिका में कहा गया है कि सरकार का आदेश एक ही अनुसूचित जनजाति वर्ग के भीतर असमान व्यवहार करता है। इससे बाकी जनजातियों के उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित होंगे।
भर्ती नियम में ऐसा क्या है, जिस पर विवाद हुआ
कर्मचारी चयन मंडल ने 37 ट्रेड में प्रशिक्षण अधिकारी के 1120 पदों पर भर्ती निकाली है। यह भर्ती आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती परीक्षा 2026 के तहत हो रही है।
भर्ती निर्देश के पैरा 4.11 के अनुसार कुछ जिलों के सहरिया, बैगा और भारिया जनजाति के अभ्यर्थियों को न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता होने पर सीधे नियुक्ति दी जाएगी। याचिका के अनुसार उनके लिए सामान्य चयन प्रक्रिया लागू नहीं होगी। यह नियुक्ति अनुसूचित जनजाति के आरक्षित पदों के विरुद्ध ही मानी जाएगी।
किन जनजातियों और जिलों को मिला यह प्रावधान
भर्ती नियम में सहरिया आदिम जाति के लिए श्योपुर, मुरैना, दतिया, भिंड, शिवपुरी, गुना और अशोकनगर जिले शामिल हैं। बैगा आदिम जनजाति के लिए मंडला, डिंडौरी, शहडोल, उमरिया और बालाघाट जिले तय किए गए हैं। भारिया जनजाति के लिए छिंदवाड़ा और सिवनी जिले शामिल किए गए हैं।
याचिका में सबसे बड़ा दावा क्या है
याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि कई ट्रेड में अनुसूचित जनजाति के पद पहले से बहुत कम हैं। COPA में 26 पद हैं। फिटर में 27 पद हैं। वेल्डर में 16 पद हैं। याचिका का दावा है कि यदि इन पदों पर केवल तीन जनजातियों के उम्मीदवार नियुक्त होंगे, तो गोंड, प्रधान और अन्य अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई वास्तविक अवसर नहीं बचेगा। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने इसे भेदभावपूर्ण बताया है।
हाईकोर्ट में ESB के नए नियम को रद्द करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से विवादित प्रावधान को रद्द करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह नियम समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। साथ ही यह अनुसूचित जनजाति वर्ग के भीतर असमान व्यवहार करता है। याचिका में कहा गया है कि इस नियम को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया जाए। ताकि सभी अनुसूचित जनजातियों को समान अवसर मिल सके।
कोर्ट ने नोटिस जारी कर मांगा जवाब
हाई कोर्ट ने नोटिस जारी कर सभी पक्षों से जवाब मांगा है। चार सप्ताह बाद जवाब आने पर मामले की विस्तृत सुनवाई होगी। इसके बाद ही अदालत तय करेगी कि भर्ती नियम संविधान के अनुरूप है या नहीं।
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