एमपी में फिर गठित होगा स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल: सरकार ने तैयार किया ड्राफ्ट
पांच पाइंट में समझें पूरा मामला
- मध्य प्रदेश सरकार 23 साल बाद स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल फिर से शुरू कर रही है।
- हाई कोर्ट में पेंडिंग कर्मचारियों के करीब 4.5 लाख मामलों का बोझ कम होगा।
- सरकारी कर्मचारियों को भर्ती, प्रमोशन, वेतन और पेंशन विवाद में जल्दी न्याय मिलेगा।
- जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर में लंबित मामलों की संख्या घटेगी।
- मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की सहमति के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ड्राफ्ट तैयार कर रहा है।
मध्य प्रदेश के सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। प्रदेश में 23 साल बाद फिर से राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (State Administrative Tribunal - SAT) का गठन किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य हाई कोर्ट में लंबित लाखों मामलों को जल्द सुलझाना है। यह ट्रिब्यूनल कर्मचारियों के सेवा संबंधी विवादों का तेजी से निपटारा करेगा।
क्यों लिया सरकार ने यह फैसला?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में कर्मचारियों के साढ़े चार लाख केस लंबित हैं। यह एक बहुत बड़ी संख्या है। इन मामलों के कारण हाई कोर्ट पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। न्यायाधीशों की संख्या कम होने से फैसलों में देरी होती है। इस समस्या को देखते हुए मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव ने चर्चा की। उन्होंने ट्रिब्यूनल को फिर से शुरू करने पर सहमति जताई। इससे कर्मचारियों को त्वरित न्याय मिलने की उम्मीद जगी है।
क्या करेगा यह ट्रिब्यूनल?
यह ट्रिब्यूनल राज्य सरकार के कर्मचारियों की भर्ती से जुड़े मामलों की सुनवाई करेगा। इसके अलावा, वेतन, पदोन्नति, पेंशन और सेवा शर्तों से संबंधित विवादों को भी सुलझाएगा। अभी तक ये सभी मामले सीधे हाई कोर्ट में जाते थे। ट्रिब्यूनल के गठन के बाद, ये शिकायतें पहले ट्रिब्यूनल में सुनी जाएंगी। ट्रिब्यूनल का फैसला आने के बाद ही हाई कोर्ट में अपील की जा सकेगी।
ट्रिब्यूनल का सफर: स्थापना से खात्मे और अब वापसी तक
इस कहानी की शुरुआत बहुत पुरानी है। मध्य प्रदेश में राज्य प्रशासनिक अधिकरण (MPAT) की स्थापना 29 जून 1988 को की गई थी। केंद्र सरकार ने प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 के तहत इसकी मंजूरी दी थी। यह ट्रिब्यूनल कर्मचारियों को सेवा मामलों में सस्ता और त्वरित न्याय दिलाने के लिए बनाया गया था।
दिग्विजय सरकार ने क्यों किया था बंद?
वर्ष 2001 में, तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने इस अधिकरण को बंद करने का निर्णय लिया। इसके पीछे मध्य प्रदेश का पुनर्गठन और प्रशासनिक कारणों को बताया गया था। तब छत्तीसगढ़ राज्य बना था। सरकार ने इसके बाद भारत सरकार से इसे समाप्त करने का आग्रह किया था।
13 साल के काम का लेखा-जोखा
केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के अनुरोध पर एक अधिसूचना जारी की। 17 अप्रैल 2003 को आधिकारिक रूप से इस ट्रिब्यूनल को समाप्त कर दिया गया। इस ट्रिब्यूनल ने लगभग 13 साल तक काम किया। जब इसे बंद किया गया, तब कर्मचारियों के करीब 30,000 लंबित मामले थे। इन सभी मामलों को बाद में हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया था।
कैसे बनेगा नया ट्रिब्यूनल? सरकार की क्या तैयारी?
मोहन यादव सरकार अब इसे फिर से शुरू करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) इसका एक विस्तृत खाका तैयार कर रहा है। मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की मंजूरी मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जा रही है। सरकार इस बार इसे और बेहतर बनाना चाहती है।
दूसरे राज्यों की स्टडी और नया ड्राफ्ट
सरकार दूसरे राज्यों में चल रहे ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली का अध्ययन करेगी। वे यह देखेंगे कि वहां ये संस्थाएं कैसे काम कर रही हैं। वक्त के हिसाब से वहां क्या बदलाव किए गए हैं, इसकी भी स्टडी होगी। इसके बाद ही एमपी के मौजूदा हालात के अनुसार एक प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। इस प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी के लिए रखा जाएगा। अंत में विधानसभा में विधेयक लाकर इसे कानूनी रूप दिया जाएगा।
निष्कर्ष
23 साल बाद मध्य प्रदेश राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का पुनर्गठन एक ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल हाई कोर्ट का बोझ कम करेगा, बल्कि लाखों सरकारी कर्मचारियों को राहत भी देगा। मोहन यादव सरकार का यह फैसला प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में एक सकारात्मक बदलाव लाएगा।
FAQ
- 1. मध्य प्रदेश राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (SAT) का मुख्य कार्य क्या है और इससे क्या फायदा होगा?
मध्य प्रदेश राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का मुख्य कार्य राज्य सरकार के कर्मचारियों की भर्ती, वेतन, पदोन्नति, पेंशन और सेवा शर्तों से जुड़े विवादों और शिकायतों की सुनवाई करना है। इससे कर्मचारियों को फायदा यह होगा उन्हें अब सीधे हाई कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। - एमपी में ट्रिब्यूनल को क्यों बंद किया गया था और अब इसे फिर से शुरू करने की क्या आवश्यकता पड़ी?
एमपी में ट्रिब्यूनल को 2001 में मध्य प्रदेश के पुनर्गठन और प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर बंद किया गया था। अब इसे फिर से शुरू करने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि एमपी हाई कोर्ट में कर्मचारियों के सेवा संबंधी करीब साढ़े चार लाख केस लंबित हैं, जिससे अदालतों पर बोझ बहुत बढ़ गया है और फैसलों में देरी हो रही है। - क्या ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जा सकती है?
हां, ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ अपील की जा सकती है। जब यह ट्रिब्यूनल पहले काम कर रहा था, तब भी व्यवस्था थी कि ट्रिब्यूनल के निर्णयों के खिलाफ सीधे हाई कोर्ट में अपील की जा सकती थी। नई व्यवस्था में भी, ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद ही कर्मचारी हाई कोर्ट में अपील कर सकेंगे।
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