प्राथमिक शिक्षक भर्ती 2025 में हुआ बड़ा घोटाला? बिना RCI रजिस्ट्रेशन 15 हजार ने ले लिया बोनस
News in short
- 13,089 पदों की प्राथमिक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया विवादों में
- हजारों अपात्र अभ्यर्थियों को मिला 5% बोनस
- RCI पोर्टल के आंकड़े और दावों में भारी अंतर
- बिना सत्यापन सॉफ्टवेयर से दिए गए अंक
- हाईकोर्ट का आदेश सुरक्षित, दोबारा मेरिट लिस्ट बनाने के दिए संकेत
Intro
प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2025 की मेरिट लिस्ट पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि हजारों अपात्र उम्मीदवारों को 5% बोनस अंक दे दिए गए, जबकि उनके पास वैध RCI प्रमाणपत्र नहीं था। हाईकोर्ट ने अंतिम सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। लेकिन कोर्ट ने यह संकेत भी दे दिया है कि मेरिट लिस्ट दोबारा बनाए जाने के आदेश कोर्ट देने वाला है।
News in Detail
मध्य प्रदेश की प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2025 की मेरिट लिस्ट विवादों में फंस गई है। इस भर्ती प्रक्रिया में 13,089 पदों के लिए जारी की गई मेरिट लिस्ट को जबलपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। नरसिंहपुर निवासी सोनम अगरैया सहित अन्य दो अभ्यर्थियों ने याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आलोक वागरेचा और अधिवक्ता विशाल बघेल पैरवी कर रहे हैं। बुधवार 6 मई को मामले की सुनवाई जस्टिस विशाल धगट की सिंगल बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए। सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने फिलहाल अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। लेकिन DPI सहित सरकार को कड़े शब्दों में यह संकेत दे दिया है कि वह मेरिट लिस्ट को दोबारा बनाने का आदेश जारी करेंगे।
5% बोनस अंक की शर्त और उसी में सबसे बड़ा खेल
भर्ती नियमों के अनुसार केवल उन उम्मीदवारों को 5% बोनस अंक दिए जाने थे, जिनके पास विशेष शिक्षा में भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) से मान्यता प्राप्त डिप्लोमा हो। यह प्रावधान विशेष रूप से दिव्यांग बच्चों की शिक्षा से जुड़े प्रशिक्षित शिक्षकों को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से बनाया गया था। लेकिन याचिका में आरोप लगाया गया कि इसी प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया। कई उम्मीदवारों ने बिना पात्रता के खुद को योग्य बताते हुए बोनस अंक हासिल कर लिए, जिससे पूरी मेरिट लिस्ट प्रभावित हो गई और वास्तविक योग्य उम्मीदवार पीछे छूट गए।
15 हजार RCI रजिस्ट्रेशन का दावा, असल संख्या बेहद कम
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विशाल बघेल ने कोर्ट में जो आंकड़े पेश किए वह हैरान करने वाले हैं। मेरिट लिस्ट में लगभग 14,964 उम्मीदवारों ने खुद को RCI से मान्यता प्राप्त बताया और 5% बोनस अंक प्राप्त कर लिए। जबकि RCI के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार पूरे मध्य प्रदेश में केवल 2,194 कार्मिक और 3,077 पेशेवर ही पंजीकृत हैं। यानी कुल मिलाकर वास्तविक प्रमाणित लोगों की संख्या उस दावे के आसपास भी नहीं पहुंचती, जो भर्ती प्रक्रिया में सामने आया। यह अंतर इतना बड़ा है कि पहली नजर में ही फर्जीवाड़े की आशंका को मजबूत करता है और यही बिंदु कोर्ट में बहस का मुख्य आधार बना।
सिर्फ ‘हां’ टिक करते ही मिल गए अंक
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह सामने आया कि पूरी प्रक्रिया में किसी भी उम्मीदवार से RCI का रजिस्ट्रेशन नंबर या प्रमाणपत्र अपलोड कराने की अनिवार्यता नहीं रखी गई। उम्मीदवारों ने ऑनलाइन आवेदन के दौरान केवल एक विकल्प में ‘हां’ का चयन किया और उसी के आधार पर उन्हें सॉफ्टवेयर के जरिए सीधे 5% बोनस अंक दे दिए गए। इस तरह की प्रक्रिया ने न केवल नियमों की अनदेखी की, बल्कि पूरी चयन प्रणाली को संदेह के घेरे में ला दिया। इसका सीधा नुकसान उन उम्मीदवारों को हुआ जो वास्तव में पात्र थे, लेकिन फर्जी दावों के कारण मेरिट में पीछे चले गए।
विभाग को पहले से था संदेह, फिर भी नहीं हुई सख्ती
याचिका में यह भी बताया गया कि लोक शिक्षण संचालनालय ने जनवरी 2026 में ही इस असामान्य स्थिति को लेकर चिंता जताई थी। लगभग 18,000 उम्मीदवारों द्वारा ‘हाँ’ का विकल्प चुने जाने को संदिग्ध बताया गया था और इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत बताई गई थी। इसके बावजूद, जब सुधार के लिए पोर्टल दोबारा खोला गया, तब भी किसी प्रकार की कठोर सत्यापन प्रक्रिया लागू नहीं की गई। न तो दस्तावेज मांगे गए और न ही दावों की जांच की गई, जिससे यह पूरी मेरिट लिस्ट ही विवादों में घिर गई।
सिर्फ एक सुधार से सुधर सकती थी गलती
याचिकार्ताओं की ओर से अधिवक्ता आलोक वागरेचा ने कोर्ट को बताया कि यदि फॉर्म भरते समय RCI का रजिस्ट्रेशन नंबर डालना मैंडेट कर दिया गए होता, तो यह स्थिति ही पैदा नहीं होती। उन्होंने कोर्ट को बताया कि RCI रजिस्ट्रेशन नंबर आसानी से जांचा जा सकता है और यदि वेबसाइट में इसका ऑप्शन दिया जाता तो इतनी बड़ी गफलत नहीं हो पाती।
कोर्ट में झूठी जानकारी देने की बात स्वीकार करने वाले भी पहुंचे
इस मामले का एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला पहलू यह भी सामने आया कि कुछ अभ्यर्थी स्वयं कोर्ट पहुंचे और उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनके पास RCI से संबंधित कोई वैध प्रमाणपत्र नहीं था, फिर भी उन्होंने गलती या जल्दबाजी में बोनस अंक का लाभ ले लिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने ऐसी याचिकाओं को सख्ती से खारिज कर दिया।
मेरिट लिस्ट रद्द करने और नई सूची जारी करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि 27 फरवरी 2026 को जारी की गई कथित रूप से दोषपूर्ण मेरिट लिस्ट को पूरी तरह रद्द किया जाए। साथ ही यह निर्देश दिए जाएं कि केवल उन्हीं उम्मीदवारों को बोनस अंक दिया जाए, जिनके पास वास्तविक और वैध RCI प्रमाणपत्र हो। इसके आधार पर नई मेरिट लिस्ट तैयार की जाए ताकि योग्य अभ्यर्थियों के साथ न्याय हो सके और भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता बहाल हो।
शासकीय अधिवक्ता को कोर्ट की फटकार
इस मामले में मेरिट लिस्ट के सुधार पर जब चर्चा चल रही थी तो DPI और सरकार के अधिवक्ताओ का तर्क था कि यह मेरिट लिस्ट सरकार को दी जा चुकी है। कोर्ट ने कहा कि हम आदेश करेंगे कि सरकार के द्वारा यह मेरिट लिस्ट वापस डीपीआई को दी जाए और इसमें सुधार हो। इस पर सरकार की ओर से अधिवक्ता ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता जिस पर कोर्ट नाराज हो गया। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि जब हम कह रहे हैं कि हम आदेश देंगे तो आप इसका विरोध कैसे कर सकते हैं। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि दोबारा ऐसी गलती हुई तो आपके ऊपर कंटेंप्ट आफ कोर्ट लगेगा। कोर्ट ने इसके बाद कड़ी मौखिक टिप्पणी करते हुए शासकीय अधिवक्ता से कहा कि अब हम आपको नहीं सुनना चाहते आप बैठ जाइए।
फैसले से तय होगा भविष्य, भर्ती प्रक्रिया पर उठे बड़े सवाल
इस पूरे विवाद ने न केवल एक भर्ती प्रक्रिया बल्कि सरकारी चयन प्रणाली की पारदर्शिता पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब हाईकोर्ट ने जो मौखिक संकेत दिए हैं उससे यह साफ है आदेश आने के बाद यह मेरिट लिस्ट नए सिरे से दोबारा बनानी पड़ेगी। हजारों अभ्यर्थी, जो इस भर्ती से अपने करियर की उम्मीद लगाए बैठे हैं, अब न्यायालय के अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहे हैं।
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