मिलिट्री वाले कंप्यूटर पैनल क्यों चाहते हैं MP के विभाग ? टेंडर में क्या मिलीभगत?

Atul Dwivedi | Sept 17, 2026, 18:19 IST
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मध्यप्रदेश के दो सरकारी विभागों के टेंडर में मिलिट्री ग्रेड शर्तें जोड़ने का आरोप। कांग्रेस नेता ने एक कंपनी को फायदा पहुंचाने का दावा किया। सरकार को करोड़ों के नुकसान का आरोप।

मध्यप्रदेश के सरकारी विभागों को ऐसे कंप्यूटर और कंप्यूटर पैनल क्यों चाहिए जो बमबारी के बीच भी चल सकें ? बमबारी के झटकों को सह सकें ? ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि एक विभाग है, जिसका नाम है आदिम जाति कल्याण विभाग यानी ट्राइबल डिपार्टमेंट। ट्राइबल विभाग के तहत आने वाले सांदीपनी स्कूलों में स्मार्ट क्लास और कंप्यूटर्स के लिए टेंडर हुए। लेकिन आरोप है कि विभाग की मेहरबानी कुछ खास लोगों पर बनी हुई है।



विभाग ने टेंडर की शर्तों में मिलिट्री ग्रेड ओपीएस की शर्त जोड़ी है। ऐसा दावा किया जा रहा है। और आरोप है कि ये शर्त कुछ खास लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए जोड़ी गई। इसके अलावा उच्च शिक्षा विभाग के टेंडर्स पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। विभाग जिस तरह टेंडर को निकालने के बाद रद्द कर रहा है, उनसे विपक्ष को सवाल उठाने का मौका दे दिया है।



मामला क्या है ?

मामला प्रदेश के सरकारी विभागों में की जा रही आईटी और तकनीकी सामनों की खरीद से जुड़ा है। आरोप है कि इन सॉफ्टवेयर और सामनों को खरीदने के लिए टेंडर की शर्तों में जमकर हेरफेर की गई है। आदिम जाति कल्याण विभाग और उच्च शिक्षा विभाग में सबसे ज्यादा फर्जीवाड़े के आरोप लग रहे हैं।



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कांग्रेस नेता केके मिश्रा का आरोप है कि इंदौर की किसी, पेगासस रिटेल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को फायदा पहुंचाने के लिए ये खेल हो रहा है। मिश्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कई पोस्ट करते हुए दूसरे आरोप भी लगाए हैं। मिश्रा ने आरोप लगाया कि पेगासस ने सिर्फ 7 महीने में ही 350 करोड़ के काम ले लिए।



मिश्रा का आरोप है कि पेगासस को फायदा पहुंचाने, टेंडर में मिलिट्री ग्रेड ओपीएस की शर्तें जोड़ दी गईं। मिलिट्री ग्रेड OPS का मतलब OPS के सिस्टम सर्टिफिकेशन से है, जो ऐसी जगह पर इस्तेमाल होता है जहां पर बमबारी की वजह से झटके उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा इसका इस्तेमाल मिलिट्री इक्विपमेंट में होता है। जिससे कि युद्ध के दौरान लगने वाले झटकों से डिवाइस खराब ना हो।



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आदिम जाति विभाग पर क्या आरोप ?

आरोप है कि विभाग ने सांदीपनी स्कूलों के लिए कंप्यूटर लैब और स्मार्ट क्लास की खरीदी का टेंडर निकाला। इस टेंडर में उबंटू सर्टिफाइड सर्टिफिकेशन की शर्त रखी गई। इसके विरोध में एसर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी ने, विभाग को लैटर लिखा और उबंटू की शर्त हटाने की मांग की।



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हालांकि विभाग ने इस शर्त को नहीं हटाया। आरोप है कि विभाग ने इसके बाद टेंडर में मांगे गए सामान के लिए प्रति यूनिट 59 हजार रुपए ज्यादा भुगतान किया। यानी जो सामान 1 लाख 8 हजार रुपए प्रति यूनिट था। विभाग की शर्त की वजह से उसकी कीमत 1 लाख 67 हजार 900 रुपए प्रति यूनिट तक पहुंच गई।



इतना ही नहीं आरोप तो ये भी है कि विभाग ने 98 हजार रुपए प्रति यूनिट का सामान भी 1 लाख 56 हजार 900 रुपए में खरीदा। जिससे सरकार को 59 हजार 900 रुपए प्रति यूनिट का नुकसान हुआ। दावा है कि इस टेंडर से सरकार को करीब 31 करोड़ का नुकसान हुआ। विभाग की आईटी खरीदी में कथित Cartel Formation से जुड़ा विवाद भी सामने आ रहा है। कार्टेल का मतलब है कंपनियों के बीच आपसी सांठगांठ। जिसके बाद कंपनियां ये तय कर लेती हैं कि वो किसी निश्चित उत्पाद या सेवा को एक फिक्स कीमत पर ही बेचेंगी।



व्यूसोनिक नाम की एक दूसरी कंपनी ने भी, ट्राइबल विभाग के टेंडर की शर्तों पर आपत्ति जताई। कंपनी ने तत्कालीन मुख्य सचिव अनुराग जैन को शिकायती लैटर भेजा। कंपनी ने दावा किया कि विभाग ने टेंडर में जानबूझकर ऐसी शर्तें रखी जिन्हें कोई दूसरी कंपनी पूरा नहीं कर सकती। आरोप लगाया गया कि इलेक्ट्रॉनिक सामान के लिए सेना के स्तर का खास सर्टिफिकेट MIL 810-STD H Military Standard) मांगा गया।



इतना ही नहीं टेंडर में मध्यप्रदेश के कम से कम 50 फीसदी जिलों में कंपनी का एक साल पुराना सर्विस सेंटर भी मांगा गया। कंपनी ने मांग की थी कि नियमों को आसान बनाया जाए, ताकि ज्यादा कंपनियां टेंडर में भाग ले सकें। लेकिन विभाग की जिद की वजह से सरकार को 64 करोड़ से ज्यादा के नुकसान का दावा किया गया।



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उच्च शिक्षा विभाग पर क्या आरोप ?

उच्च शिक्षा विभाग पर आरोप है कि विभाग ने पहले एक टेंडर जारी किया। जिसका निविदा रिफ्रेंस नंबर 49/SPD/RFB/2022-23 था। इस टेंडर में 49 करोड़ के टर्नओवर की शर्त कंपनी के लिए रखी गई थी। लेकिन दावा है कि पेगासस की आपत्ति के बाद विभाग ने Corrigendum-4 जारी कर टर्नओवर की शर्त घटाकर ₹25 करोड़ कर दी। ऐसा नहीं है कि उच्च शिक्षा विभाग पर सिर्फ टर्नओवर की रकम कम करने का आरोप है। दावा है कि साल 2025 में विभाग ने एक टेंडर जारी किया। जिसका रिफ्रेंस नंबर 101/SPD/RFP/2025 था। इसके लिए विभाग ने 40 करोड़ का टर्नओवर तय किया। लेकिन आरोप है कि पेगासस की आपत्ति के बाद विभाग ने, Corrigendum-2 जारी कर टर्नओवर सीमा को ₹52 करोड़ कर दिया



आरोप तो ये भी हैं कि उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत SPD-RUSA ने 108 और 323 कॉलेजों के लिए कंप्यूटर लैब (ICT) से जुड़ी निविदाएं (टेंडर्स) निकाले। आरोप है कि इन टेंडर्स के नियमों, शर्तों और तकनीकी योग्यताओं में जानबूझकर ऐसे बदलाव किए गए, जिससे किसी खास कंपनी या प्रभावशाली व्यक्ति को फायदा पहुँचाया जा सके।





EOW में हुई शिकायत

जनजातीय कार्य विभाग में स्मार्ट क्लास फेसिलिटिस के टेंडर की शिकायत EOW में भी कई गई थी। आरोप था कि टेंडर में मध्यप्रदेश स्टोर परचेज एवं प्रोक्योरमेंट नियम 2015 का उल्लंघन हुआ है। आरोप लगे कि टेंडर की शर्तें इस तरह की बनाई गई, जिसमें सीमित कंपनियों को ही फायदा मिले। शिकायत में टेंडर को रोकने की भी मांग की गई थी। अब जांच कहां तक पहुंची ये बड़ा सवाल है ?



मामले में केके मिश्रा का कहना है कि अगर EOW को वाकई ऐसी शिकायत मिली थी। या फिर मुख्य सचिव तक शिकायत पहुंची, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई ? जांच किस स्तर पर की गई ? इसकी समीक्षा की जानी चाहिए।



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जिम्मेदार क्या बोले ?

मामले में जानकारी के लिए द सूत्र ने मंत्री विजय शाह से संपर्क किया। हमने उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका है। मामले में जैसे ही उनका पक्ष पता चलेगा, उसे भी बताया जाएगा। इधर इस मामले में उच्च शिक्षामंत्री इंदर सिंह परमार से भी संपर्क किया गया, लेकिन कोई अधिकारिक जबाव नहीं मिल सका।



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