MP में परिवहन निगम का पुनर्गठन, अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव होंगे अध्यक्ष
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य परिवहन निगम का पुनर्गठन किया।
- अब अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव इसके अध्यक्ष होंगे।
- परिवहन आयुक्त को प्राधिकरण का सदस्य बनाया गया है।
- पुरानी अध्यक्ष व्यवस्था पर हाई कोर्ट में सवाल उठे थे।
- नया आदेश तत्काल पूरे राज्य में लागू हो गया है।
भोपाल में राज्य सरकार ने परिवहन व्यवस्था से जुड़ा बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने राज्य परिवहन निगम की संरचना बदल दी है। अब परिवहन विभाग का सचिव इसका अध्यक्ष नहीं होगा। यह जिम्मेदारी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को दी जाएगी।
अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव स्तर का अधिकारी अध्यक्ष बनेगा। परिवहन आयुक्त को निगम का सदस्य बनाया गया है। सरकार ने इसके लिए नया आदेश जारी किया है। यह आदेश तत्काल पूरे मध्य प्रदेश में लागू हो गया है।
क्या बदला सरकार ने
राज्य सरकार ने प्राधिकरण के गठन से जुड़ी पुरानी व्यवस्था बदल दी। पुराने आदेश की जगह नई अधिसूचना लागू की गई है। पहले परिवहन विभाग के सचिव के पास अध्यक्ष पद था। अब यह जिम्मेदारी वरिष्ठ अधिकारी संभालेगा। सरकार के आदेश में दो स्तर निर्धारित किए गए हैं। अध्यक्ष अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव स्तर का अधिकारी होगा।
इस बदलाव से अध्यक्ष पद का प्रशासनिक स्तर बढ़ गया है। परिवहन आयुक्त प्राधिकरण में सदस्य की भूमिका निभाएंगे। सरकार ने आदेश का प्रभाव पूरे मध्य प्रदेश में रखा है। इसके लिए अलग क्षेत्रवार व्यवस्था घोषित नहीं हुई है। अधिसूचना में नई संरचना स्पष्ट की गई है। हालांकि, बदलाव के विस्तृत कारण नहीं बताए गए हैं।
कौन होगा नया अध्यक्ष
नई व्यवस्था में अध्यक्ष किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को बनाया जाएगा। अधिकारी परिवहन विभाग से संबंधित जिम्मेदारी संभाल सकता है। आदेश में किसी अधिकारी का नाम घोषित नहीं हुआ है। इसमें केवल पद और अधिकारी स्तर बताया गया है। अध्यक्ष अपर मुख्य सचिव स्तर का अधिकारी हो सकता है। प्रमुख सचिव स्तर का अधिकारी भी जिम्मेदारी संभाल सकता है।
इससे अध्यक्ष पद सीधे विभागीय सचिव के पास नहीं रहेगा। सरकार अलग अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंप सकेगी। यह व्यवस्था प्रशासनिक निगरानी को अलग स्तर देती है। इससे जिम्मेदारियों का बंटवारा भी अधिक स्पष्ट हो सकता है।
अध्यक्ष प्राधिकरण की बैठकों और फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवहन नीतियों से जुड़े विषय भी उसके सामने आते हैं। हालांकि, फैसले केवल अध्यक्ष की इच्छा से नहीं होते। कानून, नियम और निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी रहता है।
आयुक्त को मिली सदस्यता
परिवहन आयुक्त को प्राधिकरण का सदस्य बनाया गया है। आयुक्त राज्य की परिवहन व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी होता है। आयुक्त कार्यालय वाहनों और परिवहन सेवाओं की निगरानी करता है। क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय भी इसी प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।
नई संरचना में आयुक्त का अनुभव प्राधिकरण को उपलब्ध रहेगा। विभागीय मामलों की जानकारी भी फैसलों में उपयोग हो सकेगी। आयुक्त को अध्यक्ष बनाने की व्यवस्था घोषित नहीं हुई है। उन्हें प्राधिकरण का सदस्य बनाया गया है। अध्यक्ष और सदस्य की जिम्मेदारियां अलग होती हैं। दोनों भूमिकाएं कानून और राज्य के नियमों से तय होती हैं।
नई व्यवस्था में वरिष्ठ अध्यक्ष प्रशासनिक नेतृत्व देगा। परिवहन आयुक्त विभागीय जानकारी और अनुभव सामने रख सकेंगे। इस बदलाव का वास्तविक असर बैठकों के बाद दिखेगा। आगामी फैसलों से नई जिम्मेदारियां अधिक स्पष्ट होंगी।
धारा 68 का कानूनी आधार
सरकार ने मोटरयान अधिनियम, 1988 की धारा 68 का उपयोग किया। आदेश में इसकी उपधारा एक और दो का उल्लेख है। धारा 68 परिवहन प्राधिकरणों के गठन से संबंधित है। राज्य सरकार अधिसूचना से प्राधिकरण बना सकती है। राज्य परिवहन प्राधिकरण का कार्यक्षेत्र पूरे प्रदेश तक रहता है। क्षेत्रीय प्राधिकरण सीमित इलाकों के मामले संभालते हैं।
कानून प्राधिकरण की संरचना का आधार भी तय करता है। राज्य सरकार उसी आधार पर नियुक्तियां करती है। प्राधिकरण परिवहन परमिट से जुड़े मामलों में भूमिका निभाता है। कुछ परमिट राज्य या क्षेत्रीय प्राधिकरण जारी करते हैं।
मार्ग, वाहन और सार्वजनिक परिवहन से जुड़े विषय भी महत्वपूर्ण हैं। इनके फैसलों का असर यात्रियों और संचालकों पर पड़ता है। नई अधिसूचना ने पुरानी व्यवस्था की जगह ली है। इसलिए अब सभी कार्रवाई नई संरचना के अनुसार होगी।
हाई कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला
राज्य परिवहन प्राधिकरण के अध्यक्ष की नियुक्ति हाई कोर्ट तक पहुंची थी। नियुक्ति और दूसरे पदों को लेकर सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसपोर्टर अजय नारायण पाठक ने याचिका लगाई थी। याचिका का क्रमांक 36062 बताया गया है।
याचिका में तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था पर आपत्ति जताई गई थी। एक अधिकारी के पास कई जिम्मेदारियां होने का मुद्दा उठा था। मनीष सिंह परिवहन विभाग के सचिव थे। उनके पास दूसरे परिवहन संस्थानों की जिम्मेदारियां भी थीं। वे मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम के प्रबंध संचालक भी थे। राज्य परिवहन प्राधिकरण का अध्यक्ष पद भी उनके पास था।
रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव से जवाब मांगा। अदालत ने संबंधित जिम्मेदारियों की स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। यह नोटिस मामले का अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा। नोटिस के जरिए सरकार का पक्ष मांगा गया था। नई अधिसूचना उसी विवाद के बाद सामने आई है। हालांकि, आदेश में याचिका को कारण नहीं बताया गया है। इसलिए दोनों घटनाओं का सीधा कानूनी संबंध घोषित नहीं हुआ। उपलब्ध घटनाक्रम इनके बीच प्रशासनिक संबंध जरूर दिखाता है।
कई प्रभारों पर उठे सवाल
रिपोर्ट में मनीष सिंह के पास करीब दर्जनभर प्रभार बताए गए। इनमें सात जिम्मेदारियां परिवहन क्षेत्र से संबंधित थीं। वे परिवहन विभाग के सचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनके पास परिवहन निगम का प्रबंधन भी था। मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड का प्रभार भी उनके पास था। वे कंपनी के प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
राज्य परिवहन प्राधिकरण का अध्यक्ष पद भी उन्हें मिला था। इसी पद व्यवस्था को लेकर याचिका में सवाल उठे। एक अधिकारी के कई पद संभालने पर निष्पक्षता महत्वपूर्ण होती है। अलग संस्थानों के हित कभी अलग हो सकते हैं।
ऐसी स्थिति में पारदर्शी जिम्मेदारी तय करना जरूरी रहता है। फैसलों और हितों का टकराव भी जांच का विषय बन सकता है। अदालत से कोई अंतिम निष्कर्ष रिपोर्ट में सामने नहीं आया। सरकार ने इस बीच प्राधिकरण की संरचना बदल दी।
सात क्षेत्रीय कंपनियों की भूमिका
परिवहन विभाग ने सात सहायक क्षेत्रीय कंपनियां बनाई हैं। इनका संबंध सार्वजनिक यात्री परिवहन के नियंत्रण से है। इन कंपनियों के क्षेत्रों का विवरण रिपोर्ट में नहीं दिया गया। उनके कामकाज की विस्तृत प्रक्रिया भी स्पष्ट नहीं है।
मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड मुख्य कंपनी है। इसके प्रबंध संचालक को अतिरिक्त भूमिका भी मिली थी। उन्हें सातों क्षेत्रीय कंपनियों का पदेन अध्यक्ष बनाया गया। यह पद मुख्य जिम्मेदारी के कारण अपने आप मिलता है। इस व्यवस्था से सार्वजनिक परिवहन का संचालन एक नेटवर्क में जुड़ता है। मुख्य कंपनी और क्षेत्रीय कंपनियों में तालमेल जरूरी होगा।
प्राधिकरण के पुनर्गठन का कंपनियों पर तत्काल असर स्पष्ट नहीं है। इसके लिए आगे के सरकारी आदेश देखने होंगे। नई अध्यक्ष व्यवस्था प्रशासनिक निगरानी बदल सकती है। कंपनियों की संचालन व्यवस्था अलग आदेशों से निर्धारित हो सकती है।
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