एमपी में 95 से ज्यादा गांवो में शादी पर बैन! अपने ही घर में फेरे नहीं ले पा रहीं बेटियां
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश के टकनेरी गांव में डेढ़ साल से बेटी की शादी अपने से नहीं हुई है।
- गांव की अनूठी परंपरा के कारण ऐसा हुआ है।
- करीब डेढ़ साल पहले गांव में एक महिला की हत्या हुई थी।
- इसके बाद से पूरे गांव में शादियों पर कर्फ्यू लगा हुआ है।
- मजबूरी में गांव की सीमा से बाहर जाकर शादियां करनी पड़ रही हैं।
शादी-ब्याह का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में ढोल-नगाड़े, शहनाई की गूंज- गूंजने लगती है। लेकिन मध्य प्रदेश के एक गांव में पिछले डेढ़ साल से एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है।
यहां किसी भी घर में खुशियों के गीत नहीं गाए जा रहे हैं। अशोकनगर शहर से सटे इस टकनेरी गांव में किसी भी बेटी की डोली उसके अपने आंगन से नहीं उठ पा रही है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसके पीछे की वजह कोई पैसों की तंगी नहीं है। इसकी वजह एक बेहद अजीबोगरीब और रूढ़िवादी परंपरा है। इस अनोखी परंपराने पूरे गांव की खुशियों पर जैसे ताला लगा दिया है।
क्या है यह अजीबोगरीब परंपरा?
दरअसल, इस आदिवासी बाहुल्य गांव में बरसों से एक परंपरा चली आ रही है। नियम यह है कि यदि गांव के भीतर कोई हत्या या कोई भी अप्रिय घटना हो जाती है, तो पूरे गांव में तब तक कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किया जा सकता, जब तक कि आरोपी पक्ष के परिवार में कोई शादी न हो जाए।
डेढ़ साल पहले गांव में एक महिला की हत्या हुई थी। बस तभी से इस पूरे गांव में शहनाई बजना ही बंद हो गई।
गरीब परिवारों के लिए बनी समस्या
इस गांव में ब्राह्मण, रघुवंशी, यादव और अहिरवार समाज के लोग तो रहते ही हैं, साथ ही यहां आदिवासियों की संख्या भी अच्छी-खासी है। ऐसे में यह परंपरा अब एक बड़ी सामाजिक समस्या बन चुकी है।
जो परिवार संपन्न हैं और जिनके पास पैसा है, वे तो शहरों में जाकर मैरिज गार्डन या हॉल बुक कर लेते हैं।
असली मुसीबत तो उन गरीब परिवारों की है, जिनके पास न तो मैरिज गार्डन बुक करने के पैसे हैं और न ही बाहर से आने वाले मेहमानों को ठहराने का कोई इंतजाम है।
इन परिवारों को मजबूरन गांव की सीमा से बाहर जाकर आयोजन करने पड़ रहे हैं।
अपने ही घर से विदा नहीं हो सकी बेटी
इस प्रथा का सबसे ताजा दर्द मेहरबान सिंह के परिवार को झेलना पड़ा है। जानकारी के अनुसार सोमवार को मेहरबान सिंह की बेटी की शादी थी।
हर पिता की तरह उनके भी अरमान थे कि वे अपनी बेटी को अपने ही आंगन से विदा करेंगे। लेकिन गांव की इस सख्त परंपरा के आगे उनके पिता की भावनाएं हार गईं।
मजबूरी में उन्हें गांव की सीमा लांघनी पड़ी और पंवारगढ़ में जाकर अपनी बेटी के हाथ पीले करने पड़े। अकेले मेहरबान सिंह ही नहीं, गांव के करीब 9 से 10 परिवारों को इसी तरह गांव से बाहर जाकर अपने बच्चों की शादियां रचानी पड़ी हैं।
100 से ज्यादा गांवों में बंद है शहनाई
यह परेशानी सिर्फ अकेले टकनेरी गांव की नहीं है। इस जिले में करीब एक हजार छोटे-बड़े गांव आते हैं। इनमें से 100 से ज्यादा गांव ऐसे हैं जो आज भी इसी तरह की परंपरा का दंश झेल रहे हैं।
इन गांवों में बरसों से कोई मांगलिक कार्य नहीं हुआ है। कोई भी अप्रिय घटना होने के बाद यहां के लोग अपने बच्चों की शादी के लिए दूसरे गांवों, शहरों और धर्मशालाओं के चक्कर काटने को पूरी तरह मजबूर हैं।
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