मध्यप्रदेश में पेयजल पर संकट, ओंकारेश्वर बांध में 10 साल में सबसे कम पानी, मालवा-निमाड़ के बांध 26 से 73% खाली
ओंकारेश्वर बांध की हालत
खंडवा जिले का Omkareshwar Dam इस बार सबसे बड़ी चिंता है। पिछले एक दशक में इसमें सबसे कम पानी है। यह बांध अपनी कुल क्षमता का सिर्फ 26.78 फीसदी भर सका है।
पिछले साल इसी अवधि में यह बांध करीब 85 से 90 फीसदी भरा था। यानी इस बार फर्क बहुत बड़ा है। तालिका के मुताबिक एफटीएल (Full Tank Level) 196.60 मीटर है। मौजूदा जलस्तर 194.46 मीटर है। बांध करीब 2.14 मीटर खाली है।
कम बारिश के साथ एक और वजह बताई गई है। इस बार इंदिरा सागर के गेट नहीं खुले थे। इसलिए ओंकारेश्वर में पानी कम आया है।
इंदिरा सागर और गांधी सागर
देश में सबसे ज्यादा जल भंडारण क्षमता वाला बांध इंदिरा सागर है। Indira Sagar Dam इस बार 90.85 फीसदी भरा है। इसमें उपयोग लायक 9282 एमसीएम (Million Cubic Metres) पानी जमा हो सकता है। इस साल 8433 एमसीएम पानी ही उपलब्ध रहेगा। यानी करीब 849 एमसीएम कम।
मंदसौर का गांधी सागर बांध भी अधूरा रहा। यह बांध हर साल कई बार छलकता है। लेकिन इस बार इसके गेट भी नहीं खुले थे। बांध सिर्फ 74.09 फीसदी भर सका है। पिछले साल यह लगभग पूरी क्षमता तक भर गया था।
एफटीएल 399.90 मीटर है, जबकि जलस्तर 396.97 मीटर है। इसका असर राजस्थान में भी दिखेगा। इस बांध का आधा पानी राजस्थान को मिलता है।
रायसेन के बांधों का हाल
रायसेन जिले के बारना बांध में इस बार 80.39 फीसदी पानी है। पिछले साल यहां 95 फीसदी से ज्यादा पानी था। तालिका में बारना 19.61 फीसदी खाली दिखता है।
दाहोद बांध 33.61 फीसदी खाली है। पिछले साल यह बांध 90 से 100 फीसदी भरा था। यानी मध्य क्षेत्र में भी बांधों की हालत पूरी तरह एक जैसी नहीं है।
पूर्वी क्षेत्र के बांध लबालब
पूर्वी क्षेत्र की तस्वीर बिल्कुल अलग है। शहडोल का बाणसागर सिर्फ 1.85 फीसदी खाली है। टीकमगढ़ का बानसुजारा 1.86 फीसदी खाली है। जबलपुर का बरगी और सिवनी का संजय सरोवर पूरी तरह भरे हैं।
इस तरह एक ही प्रदेश में दो अलग तस्वीरें दिखती हैं। पूर्व में पानी भरपूर है। पश्चिम में पानी कम है।
जल मंत्री का बयान
जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट का कहना है कि प्रदेश में 13 फीसदी कम बारिश हुई है। उनके मुताबिक इस साल जल प्रबंधन एक चुनौती है। खासकर मालवा क्षेत्र में पानी कम खर्च करने की रणनीति अपनाई जाएगी।
पेयजल आपूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके बाद किसानों की जरूरत पूरी की जाएगी। फिर उद्योगों को पानी मिलेगा।
रबी में सिंचाई पर असर
गेहूं और चना जैसी रबी फसलों को आम तौर पर चार से पांच सिंचाई चाहिए। कम स्टोरेज के कारण नहरों के अंतिम छोर तक पानी पहुंचाना मुश्किल होगा। ऐसे में किसान दो से तीन सिंचाई तक सीमित रह सकते हैं।
ओंकारेश्वर की नहरों पर खंडवा, खरगोन, धार और बड़वानी के करीब दो लाख किसान निर्भर हैं। गांधी सागर की नहर प्रणाली से मप्र और राजस्थान के बड़े कृषि क्षेत्र जुड़े हैं। बारना से रायसेन और सीहोर के करीब 80 हजार किसानों की सिंचाई होती है।
गर्मियों में पेयजल का खतरा
इन बांधों से कई शहरों को पानी की सप्लाई होती है। ग्रामीण जल योजनाएं और औद्योगिक क्षेत्र भी इन पर निर्भर हैं। कम पानी का दबाव इन सब पर पड़ सकता है।
इसका असर इंदौर, उज्जैन, खंडवा, देवास, पीथमपुर और ओबेदुल्लागंज पर पड़ सकता है। आसपास के इलाके भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए गर्मियों के लिए पीने का पानी अभी से बचाना होगा।
ग्वालियर-चंबल में राहत
उत्तरी मध्य प्रदेश की स्थिति संतोषजनक बताई गई है। यमुना बेसिन की नदियों के लगभग सभी प्रमुख जलाशय मजबूत भराव में हैं। अशोकनगर का राजघाट बांध 100 फीसदी क्षमता पर है। ग्वालियर का एक और जलाशय भी 100 फीसदी भरा है।
शिवपुरी का मड़ीखेड़ा 99.17 फीसदी भरा है। मुरैना का पगारा बांध 95.86 फीसदी भरा है। ग्वालियर शहर की जलापूर्ति का मुख्य स्रोत तिघरा बांध है। वह 94.38 फीसदी भरा है। यानी शहर की जलापूर्ति पर खास असर नहीं पड़ेगा।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल मालवा-निमाड़ में पानी का हिसाब बनाना जरूरी है। नहरों में पानी छोड़ने का कार्यक्रम तय करना होगा। किसानों को फसल का चुनाव सोच-समझकर करना होगा। पेयजल की जरूरत का हिसाब सबसे पहले लगाना होगा।
मान लीजिए गर्मी में बारिश देर से आए। तब बांधों में बचा पानी और कीमती हो जाएगा। इसलिए अभी से बचत की योजना जरूरी है। सरकार की रणनीति का असर आने वाले महीनों में दिखेगा।
FAQs
- ओंकारेश्वर बांध की वर्तमान स्थिति क्या है?
ओंकारेश्वर बांध में पानी की स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि यह इस बार अपनी कुल क्षमता का सिर्फ 26.78 फीसदी भरा है, जो पिछले साल की तुलना में काफी कम है। - मध्यप्रदेश में कम पानी होने से किस-किस क्षेत्र पर असर पड़ेगा?
कम पानी की वजह से खंडवा, खरगोन, धार और बड़वानी क्षेत्रों के करीब दो लाख किसान प्रभावित होंगे। इसके अलावा, इंदौर, उज्जैन, खंडवा जैसी शहरों में पेयजल की सप्लाई पर भी दबाव पड़ेगा। - कम बारिश का मध्यप्रदेश में क्या प्रभाव पड़ेगा?
कम बारिश के चलते जल प्रबंधन एक चुनौती बन जाएगा। किसानों को फसल का चुनाव सोच-समझकर करना होगा और पेयजल की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे रबी फसलों की सिंचाई में भी समस्या आ सकती है।