टाइगर स्टेट में चार दशकों से फाइनल नोटिफिकेशन के इंतजार में संकटग्रस्त अभयारण्य
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- MP के 24 अभयारण्यों को फाइनल नोटिफिकेशन नहीं हुआ जारी।
- जिला प्रशासन और वन विभाग की सुस्ती में अटका अंतिम नोटिफिकेशन।
- जमीनी विवादों का निपटारा न होने से ईको सेंसटिव जोन पर असर।
- अभयारण्य क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण के कानूनी प्रावधान हो रहे कमजोर।
- वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की सीमाओं में बाहरी दखल से सुरक्षा में सेंध ।
टाइगर, चीता, तेंदुआ और भेड़िया स्टेट का रुतबा रखने वाले मध्य प्रदेश के वन्य जीव अभयारण्य अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। अभयारण्य की सीमाओं का निर्धारण अब भी अंतिम नोटिफिकेशन के इंतजार में अटका हुआ है।
इस वजह से संरक्षित बताए जाने वाले इन अभयारण्यों में अब भी बाहरी दखल पर रोक नहीं लग पा रही है। प्रदेश के 22 अभयारण्यों को जमीनी विवाद के निपटारे और फाइनल नोटिफिकेशन का इंतजार है।
यह नोटिफिकेशन तीन से चार दशक से केवल जिला प्रशासन, राजस्व और वन विभाग के बीच सामंजस्य की कमी से अटका हुआ है। अधिकारियों की यही बेरुखी प्रदेश में वन्य जीव संरक्षण के लिए खतरे की घंटी बन गई है।
सीएस तक पहुंची शिकायत
मध्य प्रदेश की 22 वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के फाइनल नोटिफिकेशन का मामला मुख्य सचिव अनुराग जैन तक पहुंचा है। वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे ने सीएस को दस्तावेजों के साथ शिकायत कर अभयारण्यों में वन्य प्राणियों की सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं।
दुबे की शिकायत के अनुसार 22 अभयारण्य अंतिम अधिसूचना के बिना है। जबकि इन्हें तीन से चार दशक पहले ही संरक्षित घोषित किया जा चुका है।
प्रारंभिक अधिसूचना से अस्तित्व में आए इन अभयारण्यों की सीमाओं का निर्धारण और वन्य जीवों को संरक्षण देने के लिए अंतिम अधिसूचना जरूरी है। ऐसा न होने से अभयारण्यों के ईको सेंसटिव जोन का निर्धारण भी अधूरा है।
40 साल से उदासीनता का शिकार
मध्यप्रदेश के अधिकांश अभयारण्य तीन से चार दशक से प्रशासनिक उदासीनता का शिकार हैं। अभयारण्यों के फाइनल नोटिफिकेशन की जिम्मेदारी संबंधित जिलों के कलेक्टर, राजस्व अधिकारी और वन विभाग की है।
प्रदेश का रातापानी अभयारण्य और सिंघोरी अभयारण्य की प्रारंभिक अधिसूचना 1976 में जारी की गई थी। अब इसे 48 साल बीत चुके हैं लेकिन अंतिम नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया।
चंबल अंचल में घाटीगांव और केन घड़ियाल सेंचुरी 1981 से फाइनल नोटिफिकेशन का इंतजार कर रही है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को 1982 में अधिसूचना के बाद से अंतिम नोटिफिकेशन का इंतजार है। इन सभी अभयारण्यों की अंतिम सूचना वन विभाग के रिकॉर्ड से गायब है।
जिम्मेदार ही भूल गए दायित्व
वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने अभयारण्य क्षेत्र के जिला कलेक्टर, राजस्व और वन विभाग के जिम्मेदारों पर निष्क्रियता का आरोप लगाया है। उनका कहना है वन्यजीव अधिनियम के तहत जिला कलेक्टर वन बंदोबस्त अधिकारी होते हैं।
उन्हें भूमि और सामुदायिक अधिकारों की जांच करनी होती है। राज्य सरकार धारा 26A में उनकी रिपोर्ट के आधार पर अंतिम अधिसूचना जारी करती है।
दशकों से यह काम अधूरा है क्योंकि कलेक्टरों ने मौजूदा अधिकारों का निपटारा नहीं किया है। इसी कारण अभयारण्य कानूनी अनिश्चितता में फंसे हैं।
चार अभयारण्य पूरी तरह अधिसूचित
प्रदेश के 26 से ज्यादा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी हैं लेकिन पूरी तरह अधूसूचित श्रेणी में केवल चार ही शामिल हैं। देवास के खिवनी अभयारण्य की प्रारंभिक अधिसूचना 1982 में हुई थी और अंतिम अधिसूचना 2006 में जारी हुई।
सिवनी के पेंच मोगली अभयारण्य की प्रथम अधिसूचना 1977 में जारी हुई जबकि अंतिम अधिसूचना 1996 में आई। इंदौर के रालामंडल अभयारण्य को 1989 में प्राथमिक जबकि अंतिम अधिसूचना 1998 में जारी की गई। जबकि दमोह की वीरांगना दुर्गावती सेंचुरी की अंतिम अधिसूचना 1997 में जारी हुई थी।
इसके अलावा सिंगरौली के बगदरा, सीधी के संजय दुबरी, पन्ना के गंगऊ, ग्वालियर के घाटीगांव, सिवनी के करमझिरी, पन्ना के केन घड़ियाल, राजगढ़ की नरसिंहगढ़ सेंचुरी, मुरैना का राष्ट्रीय घड़ियाल अभयारण्य, सागर का नौरादेही, टीकमगढ़ का ओरछा, होशंगाबाद का पचमढ़ी, उमरिया का पनपठा, रायसेन का रातापानी, रतलाम का सैलाना, धार का सरदारपुर, रायसेन का सिंघोरी, सीधी-शहडोल- सतना के बीच सोन घड़ियाल सेंचुरी, सागर का डॉ.भीमराव अंबेडकर अभयारण्य और श्योपुर का जहांगढ़ अभयारण्य अंतिम नोटिफिकेशन का इंतजार कर रहे हैं।
खतरे से घिरे ईको सेंसटिव जोन
अंतिम अधिसूचना न होने से इको-सेंसिटिव जोन नहीं बन पाए हैं। इनके बिना अभयारण्यों के आसपास निर्माण पर पाबंदी लगाने में वन विभाग कानूनी उलझनों में फंसा हुआ है। खनन और उद्योगिक गतिविधियों पर भी नियंत्रण नहीं लगा पा रहा है।
यह स्थिति तब है जबकि सुप्रीम कोर्ट भी अभयारण्य क्षेत्रों के लिए ईको सेंसटिव जोन (ESZ) की अनिवार्यता बता चुका है। इसके बाद भी मध्य प्रदेश में इस पर अमल नहीं हो रहा।
इस वजह से भोपाल के नजदीक रातापानी, प्रदेश के इकलौते हिल स्टेशन पचमढ़ी में अभयारण्य क्षेत्र चुनौतियों का शिकार है। पचमढ़ी में मानवीय हलचल के साथ ही कस्बे का गंदा पानी संरक्षित क्षेत्र के नालों को प्रदूषित कर रहा है। इससे वन्यजीवों में बीमारी का खतरा बढ़ा है।
FAQ
- MP के कितने अभयारण्य अंतिम अधिसूचना के बिना हैं?
मध्यप्रदेश के 26 में से 24 वन्यजीव अभयारण्य अभी भी अंतिम अधिसूचना के बिना हैं। इनमें रातापानी, सिंघोरी, घाटीगांव, केन घड़ियाल और राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य शामिल हैं। कई को संरक्षित क्षेत्र घोषित हुए 40 साल से ज्यादा हो चुके हैं। ये सभी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत प्रारंभिक अधिसूचना में फंसे हैं। - अभयारण्यों को अंतिम अधिसूचना क्यों नहीं मिल पा रही है?
शिकायत के अनुसार जिला प्रशासन की निष्क्रियता वजह है। जिला कलेक्टर वन बंदोबस्त अधिकारी होते हैं। उन्हें भूमि और सामुदायिक अधिकारों का निपटारा करना होता है। इसके बाद ही राज्य सरकार धारा 26A के तहत अंतिम अधिसूचना जारी करती है। दशकों से यह काम लंबित है। खिवनी को भी 24 साल बाद अधिसूचना मिली थी। - अंतिम अधिसूचना न मिलने से क्या नुकसान हो रहा है?
कानूनी अनिश्चितता से संरक्षण उपाय कमजोर हो रहे हैं। इको-सेंसिटिव जोन लागू नहीं हो पा रहे हैं। इससे अभयारण्यों के आसपास निर्माण और खनन नहीं रुक रहा। पचमढ़ी में सीवेज से जल स्रोत दूषित हो रहे हैं। बाघों समेत वन्यजीवों को बीमारी का खतरा है। गिर में 2018 में ऐसी ही महामारी से 20 शेर मरे थे।
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