आखिर कैसे खत्म हुआ नरसिंहपुर का सालों पुराना जल संकट? पीएम भी कर चुके तारीफ
समझें क्या है पूरा मामला...
- नर्मदा किनारे बसे नरसिंहपुर में गिरते जलस्तर की बड़ी समस्या थी।
- जिले में 63 अमृत सरोवर तालाब बनाए गए हैं।
- इनमें करीब 70 करोड़ लीटर बारिश का पानी जमा होता है।
- पीएम मोदी ने मन की बात में इस मॉडल की तारीफ की।
गर्मी में पानी की समस्या
मध्य प्रदेश का नरसिंहपुर जिला नर्मदा नदी के किनारे बसा है। इसके बावजूद यहां अंधाधुंध बोरवेल खनन से जलस्तर लगातार गिर रहा था।
सबसे ज्यादा परेशानी वनांचल के पथरीली जमीन वाले गांवों में देखी गई थी। मुंगवानी से लगे कई गांवों में गर्मी के मौसम में यह संकट और गहरा जाता था।
पथरीली जमीन होने की वजह से यहां बारिश का पानी टिकता नहीं था। जमीन जल्दी सूख जाती और कुएं-ट्यूबवेल दम तोड़ देते थे।
इसी वजह से खेती भी सीमित फसलों तक सिमट गई थी। किसान सिर्फ सामा और कोदो-कुटकी जैसी परंपरागत फसलें ही उगा पाते थे।
कैसे हुई बदलाव की शुरुआत
इसके बाद इस गंभीर समस्या को हल करने के लिए एक बड़ी मुहिम शुरू की गई। लिघारी ग्राम पंचायत के जेरा गांव समेत कई पथरीले इलाकों में तालाब खोदे जाने लगे। इन तालाबों को अमृत सरोवर नाम दिया गया। यह काम एक दिन में नहीं हुआ।
धीरे-धीरे एक के बाद एक तालाब खोदे गए। समाज, सरकार और प्रशासन ने कदम से कदम मिलाकर इस मुहिम को आगे बढ़ाया। समय के साथ इन गांवों की तस्वीर बदलने लगी। साथ ही यहां रहने वाले लोगों की जिंदगी में भी सुधार दिखने लगा।
63 तालाबों की कहानी
बता दें कि आज नरसिंहपुर जिले में ऐसे 63 अमृत सरोवर तालाब मौजूद हैं। इनमें बारिश के मौसम में करीब 60 से 70 करोड़ लीटर पानी जमा होता है।
आंकड़ों में देखें तो यह करीब 6 से 7 लाख घनमीटर पानी है। यह पानी साल भर जिले के भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद करता है।
पहले जो इलाके गर्मी शुरू होते ही सूखने लगते थे, वहां अब स्थिति अलग है। तालाबों में जमा पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसता है।
इससे आसपास के कुओं और ट्यूबवेल का जलस्तर भी बना रहता है। यही वजह है कि जिले के कई गांवों का जल संकट अब काफी हद तक दूर हो गया है।
अब खेतों में लहलहाती फसलें
इन तालाबों का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिला है। पहले जो ट्यूबवेल सिर्फ तीन से चार महीने ही चलते थे, अब उनमें लंबे समय तक पानी बना रहता है। कुओं के जलस्तर में भी साफ सुधार देखा गया है।
जिन खेतों में पहले सिर्फ सामा और कोदो-कुटकी जैसी फसलें उगती थीं, वहां अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। अब वहां गेहूं और चना समेत कई फसलें साल भर लहलहाती हैं। किसानों के लिए यह बदलाव किसी सपने के सच होने जैसा है। खेती अब सिर्फ बारिश के भरोसे नहीं रही।
पीएम मोदी ने की तारीफ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 जुलाई 2026 को मन की बात कार्यक्रम में नरसिंहपुर के इस मॉडल की सराहना की। उन्होंने कैच द रेन अभियान के तहत पानी बचाने की अपील भी दोहराई। इसके बाद नरसिंहपुर का यह जल संरक्षण मॉडल देशभर में चर्चा का विषय बन गया।
जमीनी हकीकत क्या कहती है
जानकारी के अनुसार ग्रामीण बताते हैं कि इन तालाबों ने उनकी खेती और रोजमर्रा की जिंदगी दोनों बदल दी है।
पानी की चिंता अब पहले जितनी बड़ी नहीं रही है। यह बदलाव धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से आया है। गांव वालों का कहना है कि सही जगह पर तालाब बनने से ही यह सफलता मिल पाई।
नरसिंहपुर का यह मॉडल दिखाता है कि छोटे स्तर के जल संरक्षण कदम भी बड़ा असर डाल सकते हैं। सही योजना और सामूहिक भागीदारी से पथरीली और सूखाग्रस्त जमीन भी उपजाऊ बनाई जा सकती है। यही वजह है कि अब यह मॉडल पूरे देश के लिए एक मिसाल बन गया है।
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