बच्चों के भोजन का अधिकार: राष्ट्रीय अधिवेशन भोपाल में उठा कुपोषण और बाल अधिकारों का सवाल
बच्चों को पूरा पोषण नहीं मिल
भारत में बच्चों को पोषण पूरा नहीं मिल पा रहा। उनके अधिकार भी अधूरे हैं। असमानता, लैंगिक भेदभाव और जातीय व्यवस्था इसके रास्ते में बड़ी बाधा हैं। यह बात बच्चों के भोजन का अधिकार पर तीसरे अधिवेशन में उठी। तीसरा राष्ट्रीय अधिवेशन भोपाल के आइकफ आश्रम में शुक्रवार से शुरू हुआ। तीन दिवसीय आयोजन में देशभर से 400 से अधिक कार्यकर्ता और प्रतिनिधि शामिल हुए हैं। यहां बच्चों का पोषण, भोजन और अधिकारों पर चर्चा हो रही है।
राइट टू फूड पर जुटे कार्यकर्ता
अंग्रेजी में इस मुद्दे को Right to Food कहा जाता है। अधिवेशन में यह बहस बच्चों के हिस्से के भोजन तक पहुंची है। मंच पर अर्थशास्त्री, संगठनों के पदाधिकारी और सरपंच अपनी बात रख रहे हैं।
400 से अधिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी इस आयोजन को खास बनाती है। देशभर से आए प्रतिनिधि अपने इलाके के अनुभव साथ लाए हैं।
पहले दिन समानांतर सत्र हुए। इनमें कुपोषण, निजीकरण, भेदभाव और बहिष्कार, डिजिटलीकरण तथा विस्थापन पर चर्चा हुई। शाम को सांस्कृतिक संध्या हुई।
बच्चों के भविष्य की चिंता : आशा मिश्रा
"आज सबसे बड़ी जरूरत बच्चों और उनके भविष्य के बारे में सोचने की है।"
– आशा मिश्रा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भारत ज्ञान विज्ञान समिति
मिश्रा ने कहा कि देश में आज भी एक तबका है। उसके पास घर और पहचान नहीं है। वह शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य से भी दूर है।
बाल अधिकारों की राह में तीन बाधाएं
अधिवेशन में तीन बाधाएं गिनाई गईं। पहली असमानता, दूसरी लैंगिक भेदभाव और तीसरी जातीय व्यवस्था। वक्ताओं ने इनके खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष की जरूरत बताई।बाल अधिकार को अंग्रेजी में Child Rights कहा जाता है। यह लड़ाई अब सिर्फ भोजन तक सीमित नहीं है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और पहचान के सवाल भी जुड़ गए हैं।
असमानता का सीधा असर: ज्यां द्रेज
"असमानता, लैंगिक असमानता और जातीय व्यवस्था का सीधा असर बच्चों के भोजन के अधिकार पर पड़ता है।"
ज्यां द्रेज, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री
द्रेज ने कहा कि पिछले 25 वर्षों में भारत का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। लेकिन मजदूरी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। सवाल सीधा है। उत्पादन बढ़ा, तो मजदूरी क्यों नहीं बढ़ी?
महिलाओं के पोषण का मुद्दा भी उठा। सोचिए एक बार, जो महिलाएं खुद कुपोषित हैं, उनके बच्चों को कितना पोषण मिलेगा? जातीय व्यवस्था से बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होती है। द्रेज ने इसे शोषण की गंभीर व्यवस्था बताया।
पोषण ट्रैकर के बावजूद बढ़े वंचित बच्चे
सीटू (CITU – Centre of Indian Trade Unions) की महासचिव सिंधु ने सवाल उठाए। Poshan Tracker का उद्देश्य हर बच्चे के पोषण की निगरानी करना था। मकसद यह था कि कोई बच्चा वंचित न रहे।
सिंधु: सभी अधिकारों के लिए संघर्ष
"एक अधिकार दूसरे अधिकार से जुड़ा है। इसलिए सभी अधिकारों के लिए मिलकर संघर्ष करना होगा।"
– कॉमरेड सिंधु, महासचिव, सीटू
सिंधु ने कहा कि जमीनी अनुभव अलग तस्वीर दिखाते हैं। पोषण ट्रैकर के बाद भी पोषण से वंचित बच्चों की संख्या बढ़ी है।
अधिवेशन के दूसरे दिन क्या होगा
दूसरे दिन चर्चा आगे बढ़ेगी। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना से जुड़े अध्ययन की प्रस्तुति होगी। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, पीएम पोषण (प्रधानमंत्री पोषण) और क्रेच योजना पर भी सत्र हैं।
कृषि, पोषण और विकसित भारत के शोर के बीच भूख पर भी बात होगी। बाल अधिकारों से जुड़े विषयों पर जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रियाओं का सत्र भी रखा गया है। देखना होगा कि इन सत्रों से बच्चों के लिए क्या ठोस रास्ता निकलता है।